नीतीश के निहितार्थ

Wednesday, June 19, 2013

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नीतीश कुमार-पूर्व मुख्यमंत्री

सत्येंद्र रंजन
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार को ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेता कहा तो उसके निहितार्थ को समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं था. साफ तौर पर यह जनता दल (यूनाइटेड) को कांग्रेस का न्योता है, जिसने नरेंद्र मोदी की ‘लोगों को बांटनेवाली राजनीति’ के विरोध में भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया है.

बहरहाल, मनमोहन सिंह सरकार बिहार के मुख्यमंत्री की मांगों पर पिछले कुछ समय से जिस तरह से मेहरबान रही है, ताजा परोक्ष आमंत्रण उस सिलसिले की अगली कड़ी भर है. यानी नीतीश कुमार को गले लगाने के लिए कांग्रेस पलक-पांवड़े बिछाये हुए है. जद-यू की गणना में कांग्रेस कितनी अहम है, यह अभी साफ नहीं है. मगर यहां कुछ बातें गौरतलब हैं. भाजपा नेतृत्ववाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन (एनडीए) से अलग होकर नीतीश कुमार ने एक बड़ा दावं खेला है. नीतीश कुमार ने साढ़े सात वर्ष के अपने शासनकाल में अपना खास जनाधार बनाया, यह निर्विवाद है.

लेकिन यह आधार अगले चुनावों में उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है, इसकी परीक्षा अभी होनी है. नीतीश कुमार की आरंभिक ताकत लालू विरोधी ध्रुवीकरण के नेता के रूप में बनी थी. बिहार की सियासत मंडल विवाद के दिनों से लालू समर्थन और विरोध की धुरियों पर केंद्रित रही है. लालू-राबड़ी के शासन से नाराज मतदाता नीतीश के साथ गोलबंद हुए. इनमें बिहार के सवर्ण और हिंदुत्व समर्थक समूह थे, तो वे पिछड़ी और दलित जातियां भी थीं, जो लालू राज में परेशान थीं. बाद में नीतीश मुसलमानों के एक बड़े हिस्से का भरोसा जीतने में भी कामयाब रहे.

अब भाजपा से अलग होकर नीतीश कुमार ने उपरोक्त ध्रुवीकरण को तोड़ दिया है. इससे बिहार में बिल्कुल नयी स्थिति बनी है. नये हालात में नीतीश सिर्फ एक धुरी हैं, जिसके खिलाफ भाजपा भी लामबंद है. उधर हाल में संकेत मिले हैं कि लालू प्रसाद ने अपनी जमीन कुछ हद तक वापस पा ली है. ऐसे में कांग्रेस की बिहार में ताकत भले नगण्य हो, लेकिन लोकसभा चुनाव में वह किससे गंठबंधन करती है, इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकता है. तो अब यह नीतीश कुमार को तय करना है कि उनके लिए यह मनोवैज्ञानिक लाभ कितना कीमती है? फिलहाल नीतीश कुमार की इस बात पर सहज भरोसा किया जा सकता है कि उन्हें भाजपा ने एनडीए से अलग होने के लिए मजबूर किया.

हर व्यावहारिक रूप में नरेंद्र मोदी के भाजपा का नेता बन जाने के बाद ऐसी मजबूरी उन तमाम दलों के सामने है, जिनका भविष्य हिंदुत्व की परियोजना के साथ नहीं जुड़ा है.
बिहार की राजनीतिक परिस्थिति में भाजपा का साथ उनके लिए तभी तक फायदेमंद था, जब तक इस परियोजना पर परदा डालनेवाला मुखौटा मौजूद था. पहले अटल बिहारी वाजपेयी की आड़ थी. बाद में लालकृष्ण आडवाणी ने अपना मेकओवर करते हुए यह सुविधा दी. लेकिन नरेंद्र मोदी हिंदुत्व की राजनीति खुलेआम करते हैं.

दरअसल, उन्होंने एक अल्पसंख्यक (मुसलिम) समुदाय को सीधे निशाने पर लेते हुए चुनावी बहुमत तैयार करने के उस फॉमूर्ले पर सफलता से अमल किया है, जिसका सपना भारतीय जनसंघ के नेता देखते थे. इसके साथ मुक्त बाजार और पूंजी के लिए निर्बाध स्थितियां पैदा कर उन्होंने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसकी तरफ कॉरपोरेट सेक्टर और सवर्ण मध्य वर्ग का स्वाभाविक झुकाव बनता है.

इसीलिए यह कहना बिल्कुल सटीक है कि मोदी को नेता चुन कर भाजपा अपनी जड़ों की तरफ लौटी है. उसने खुद को भारतीय जनसंघ की मूल विरासत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खालिस विचारों से जोड़ा है. इसीलिए पिछले छह महीनों के घटनाक्रम से बनी स्थिति के बीच नीतीश कुमार के सामने दो ही रास्ते बचे- पहला यह कि भाजपा के साथ रहते हुए धीरे-धीरे वे अपने स्वतंत्र जनाधार को क्षीण हो जाने दें, या फिर अकेले चलने का जुआ खेलें. उन्होंने दूसरा विकल्प चुना है.

इस घटनाक्रम से भाजपा के फिर से उन्हीं संकरी गलियों में पहुंच जाने की स्थिति बनती जा रही है, जहां 1974 के जेपी आंदोलन और इमरजेंसी के पहले वह विचरती थी. नरेंद्र मोदी देश की राजनीति में नये ध्रुवीकरण की वजह बनते दिखते हैं. इससे एक तरफ वे संघ की विचारधारा के समर्थकों को उत्साहित कर रहे हैं, दूसरी तरफ इसकी प्रतिक्रिया में इस विचार के विरोधियों के गोलबंद होने की भी सूरत पैदा हो रही है. अकाली दल और शिवसेना के लिए- जो खुद सांप्रदायिक या क्षेत्रीय अस्मिता की प्रतिनिधि पार्टियां हैं- नयी स्थिति में भी भाजपा के साथ बने रहने में कोई समस्या नहीं होगी, मगर जिन पार्टियों का राजनीतिक हित सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता या समावेशी विकास के मुद्दों से जुड़ा है, उनके लिए नरेंद्रभाई के कारवां में शामिल दिखना मुफीद नहीं दिखता.

नीतीश कुमार ने इसी बात को समझते हुए ही इतना बड़ा दावं खेला है. अब आगे पासों को अपने पक्ष में करने के लिए क्या उचित है यह उन्हें तय करना है. इसमें एक विकल्प कांग्रेस से हाथ मिलाने का भी है, जिससे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर समर्थन जुटाना उनके लिए आसान होगा और साथ ही कांग्रेस को उनकी कथित सुशासन की छवि का लाभ मिलेगा. फिलहाल, ये कयास की बातें हैं. अभी जो हकीकत है वह यही कि मोदी मार्ग पर चलती भाजपा का अकेलापन बढ़ने वाला है.