निदा की यादों में जगजीत सिंह

Monday, February 8, 2016

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निदा फ़ाज़ली

नई दिल्ली | संवाददाता: निदा फाजली का उस दिन निधन हुआ, जिस दिन जगजीत सिंह का जन्मदिन था. अब न जगजीत सिंह हैं और ना निदा. बस यादें बची हुई हैं. 2007 में बीबीसी हिंदी की पत्रिका के लिये निदा फाजली हर सप्ताह लिखा करते थे. जगजीत सिंह तब जिंदा थे. निदा साहब का यह आलेख बीबीसी से साभार.

ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह से मेरी दोस्ती की उम्र उतनी ही है जितनी कि मेरी ग़ज़ल, “दुनिया जिसे कहते हैं, बच्चों का खिलौना है. मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’’ की. इस ग़ज़ल को किसी महफिल में जगजीत सिंह ने गाया था और मुझे बिना सूचित किए. उन्होंने इसे चित्रा सिंह के साथ ‘दो गान’ के रूप में रिकॉर्ड कर लिया था.

मुझे इसकी सूचना मिलती भी कैसे, उस समय मेरा पता था, न ठिकाना. मुझे इसके रिकॉर्ड हो जाने की ख़बर उस वक़्त मिली जब एचएमवी का चेक कई ठिकानों से घूम-फिरकर मुझ तक पहुँचा था.

यह ग़ज़ल उनके एलबम ‘कम अलाइव’ में शामिल है, जो लंदन में उनके एक कॉन्सर्ट की लाइव रिकार्डिंग पर आधारित है. इस एलबम की शुरूआत जगजीत के बोले हुए जुमलों से होती है. उनकी आवाज़ में जो वाक्य शामिल है वे यूँ है…हम आज शाम की शुरूआत निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल से कर रहे हैं.

इस रिकॉर्ड में मेरे अलावा और भी कई शायरों की रचनाएँ थीं, लेकिन नाम सिर्फ़ मेरा लिया गया था, इसकी वजह से अच्छी-बुरी सारी ग़ज़लों की बदनामी और नेकनामी मेरे खाते में लिख दी गई.

पाकिस्तान के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम का एक शेर है-

दिल अभी अच्छी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए…

गायकी और ग़ज़ल

गायकी और ग़ज़ल का रिश्ता यूँ तो बहुत पुराना है, लेकिन बेग़म अख़्तर और मेहदी हसन का दौर इसकी बुलंदी का जमाना है. मेहदी हसन की लयकारी ने इस विधा में ऐसे चार चाँद लगाए कि ग़ज़ल गायकी का एक अटूट अंग बन गई.

फ़िल्मी गीतों में शब्दों का अनादर भी सुनने वालों में इसके आदर का कारण बना. सजे-धजे ड्राइंग रूम्स और फाइव स्टार से लेकर बड़ी-बड़ी महफ़िलों तक हर तरफ़ इसकी गूँज सुनाई देने लगी.

सुरीली गायकी-रागों पर आधारित धुनों और स्तरीय चयन ने बहुत, जल्द मेहदी हसन को एक लीजेंड बना दिया. वह ग़ज़ल गायकी का एक स्कूल बनकर उभरे और भारत-पाकिस्तान के नए गायक इससे जुड़ते गए और देखते-देखते ग़ज़ल गायकों की गिनती बढ़ती गई.

ग़ज़ल की लोकप्रियता ने क़व्वाली कल्चर को पीछे धकेल दिया. बड़े-बड़े क़व्वाल या तो घर में खाली बैठ गए या उनमें से अधिकतर ने ग़ज़ल को अपनाना ही मुनासिब समझा.

ग़ज़ल एक काव्य विधा है, प्राचीन भारत के इतिहास में यूँ तो इसके निशानात पहले भी देखे जा सकते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी भाषा में पूरे तौर पर इस विधा का दीदार अलाउद्दीन ख़िलज़ी के युग में सूफ़ी निज़ामुद्दीन के आँगन में दिल्ली में होता है. जहाँ अमीर ख़ुसरो ने उसे देखा और अपनाया. ख़ुसरो फ़ारसी के शायर थे.

हिंदुस्तानी जुबान में उनकी पहली ग़ज़ल, जो उनके नाम से जुड़ी है उसका मुखड़ा यूँ है…

जो यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर

यह विधा कई देशों और संस्कृतियों से गुज़र के भारत आई थी, इसीलिए वह एक साथ सूफ़ियाना भी है, रिन्दाना भी है और आशिक़ाना भी है. वह अधर्मी तो नहीं है, लेकिन उसका धर्म मुल्ला-पंडित के दायरों से बाहर होकर ज़मीनों-आसमान के रिश्ते को तलाश करता है.

बहुआयामी गायक

जगजीत सिंह भी इसी बहुआयामी विधा के गायक हैं वह राजस्थान के श्रीगंगानगर में उस्ताद जमाल सेन से संगीत की शिक्षा और जालंधर से कॉलेज की तालीम लेकर बम्बई आए थे. संगीत से उनकी दोस्ती 1948 के आसपास उन फ़िल्मी गीतों की देन है जो वह घर में रेडियो से सुनते थे और सुनकर गुनगुनाते थे.

सरदार अमर सिंह (जगजीत के पिता) ने उन्हें एक दिन दूर से गाते हुए सुना, और सात बहन-भाइयों के परिवार में एक में वह सपना जागता हुआ देखा, जो कभी उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में देखा था और वो पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के कारण अधूरा रह गया था. अपने अधूरे सपने को, जगजीत सिंह में पूरा करने के लिए वह उन्हें एक ब्लाइंड संगीत शिक्षक प. छगन लाल शर्मा के पास ले गए.

उस समय वह लगभग 12 बरस के थे. उसके बाद वह उस्ताद जमाल खान के शागिर्द हो गए. गुरू-शिष्य की इस परंपरा के अनुसार जगजीत सिंह का रिश्ता कई पीढ़ियाँ दूर जाकर तानसेन से मिलता है.

तानसेन से मेरा रिश्ता यूँ है, कि मैं जहाँ का हूँ, वहाँ की धरती के एक कोने में इमली की छाँव तले संगीत सम्राट तानसेन का मज़ार है.जगजीत से मेरी दोस्ती में मेरी ग़ज़लों के अलावा मेरे हमवतन तानसेन घराने से उनके संबंध के रोल से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

भविष्यवाणी

जगजीत सिंह, जगजीत का दूसरा नाम है. पिता ने उनके जन्म पर जो नाम दिया था वह जगमोहन था, लेकिन कुछ वर्षों तक इसी नाम से पुकारे जाने के बाद, एक दिन, परिवार के नामधारी गुरू आए और उनके आदेश से जगमोहन हमेशा के लिए जगजीत बन गए.

नाम की तब्दीली के साथ उनकी भविष्यवाणी थी कि यह जग को जीतेगा…! इस भविष्यवाणी का चमत्कार उस समय सामने आता नज़र आया जब वह नवीं क्लास के स्टूडेंट थे. अवसर गुरूपर्व का था.

15-20 जाने माने कलाकारों के बीच अपनी बारी पर जब उन्होंने पंजाबी का गीत ‘कि तेरा एतिबार ओर राहिया’ छेड़ा और सारी महफ़िल झूमने लगी, उस स्टेज से उन्हें एक की जगह और भी कई गीत गाने पड़े. नामों से किस्मत को जोड़ने का फै़शन फ़िल्मी दुनिया में अक्सर नज़र आता है.

कभी-कभी इस तब्दीली का साथ किस्मत ने दिया भी है. यूसुफ़ ख़ान ने दिलीप कुमार होने और इंदौर के बदरुद्दीन के जानी वॉकर होने से उनकी सफलताएँ ज़रूर जुड़ी हुई हैं. इस पहली सफलता ने युवा जगजीत को भी हमेशा के लिए संगीत से जोड़ दिया. और इस फ़ैसले ने उनका साथ यूँ निभाया कि वह जहाँ भी गए, इसी के द्वारा यश भी पाया, नाम भी कमाया.
मेरा एक शेर है,

कोशिश भी कर, उम्मीद भी रख, रास्ता भी चुन
फिर उसके बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

यह सही है कि सिर्फ़ नाम की तब्दीली से कुछ नहीं होता. नाम के साथ कोशिश, उम्मीद और रास्ते का चयन भी बहुत ज़रूरी है. जगजीत ने केवल भविष्यवाणी पर भरोसा नहीं किया, ख्वाब को हकीक़त बनाने में लगातार मेहनत से भी काम लिया, उनकी सुबह तानपुरे से शुरू होती है और रात भी रागाभ्यास के साथ सोती है.

इन सुबहों और रातों के बीच उनकी जीवन कथा नए-नए रंग बदलती रही है. उनके संगीत का सफ़र तलत महमूद और मेहदी हसन की गाई हुई ग़ज़लों को दोहराने से प्रारंभ हुआ.वह जब बम्बई आए थे, तो सर पर पगड़ी और चेहरे पर दाढ़ी थी, बम्बई में जब उनका पहला ईपी बना और उसकी लोकप्रियता देखकर जब एचएमवी ने उनसे कवर पर छापने के लिए तस्वीर माँगी तो उनका चेहरा दाढ़ी से और सर पगड़ी से आज़ाद हो गया.

बिना दाढ़ी और पगड़ी के चेहरे को देखकर मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह को उनके चेहरे में दिलीप कुमार की छवि नज़र आई.कहते हैं कामयाब मर्द की कामयाबी के पीछे किसी औरत का हाथ होता है. किसी और के साथ यह सच हो न हो, लेकिन जगजीत सिंह के रहन सहन, उनके रिकार्डों के अंग्रेज़ी नाम और स्टेज पर चित्रा सिंह की भागीदारी ने भी जगजीत की इमेज बनाने में ज़रूर विशेष भूमिका निभाई है.

चित्राजी के नाम के साथ सिंह जुड़ने से पहले ‘दत्ता’ लगा हुआ था. चित्रा और दत्ता के मतभेदों ने चित्रा को अकेला कर दिया था. जगजीत सिंह उनके इस एकांत के साथी बने.

उतार-चढाव
जगजीत ने मेरी एक ग़ज़ल गाई है इसका पहला शेर है,

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम है…!

यह ग़ज़ल सैलाब नामक सीरियल में उनकी आवाज़ में थी जो बाद में ‘मिराज़’ में शामिल की गई. बच्चों का एक खेल है, सांप-सीढ़ी. इसमें एक छोटे से पांसे के सहारे हार-जीत होती है. पांसा कई सीढ़ियाँ चढ़ाता है, और फिर अचानक सांप के फन से उसे डस लिया जाता है.

जगजीत भी चित्रा के साथ कई कामयाबियों के जीने चढ़े, वे जिधर भी बढ़े…आगे और आगे बढ़ते रहे…मगर पांसा तो कुदरत के हाथ का खेल होता है. जगजीत ने ‘इन साइट’ में मेरा एक गीत गाया था,

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है.

जगजीत की शख्सियत भी हँसने और रोने के मिलाप का नमूना है. उनके घर पुष्प विला में एक कमरा है. वह कमरा जैसा कई साल पहले था आज भी वैसा ही है. हर सुबह पाबंदी से यह खुलता है और अगरबत्तियों की सुगंध से महकाया जाता है. उसमें हर चीज़ उसी तरह से रखी है, जैसे कई साल पहले उनका इकलौता बेटा विवेक छोड़ के गया था और फिर कभी नहीं लौटा. भगवान ने जगजीत से विवेक को भले ही छीन लिया हो मगर जगजीत उसे आजतक जीवित रखे हुए हैं. उस कमरे में, अपने गायन में, अपने अंदाज़ में अपनी आवाज़ में.

तुम ये कैसे जुदा हो गए
हर तरफ हर जगह हो गए

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