प्रचंड की आश्चर्यजनक हार

Thursday, November 21, 2013

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प्रचंड नेपाल के माओवादी नेता.

काठमांडू | एजेंसी: नेपाल के माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ऊर्फ प्रचंड को संविधान सभा के चुनाव में गुरुवार को आश्चर्जनक रूप से हार का सामना करना पड़ा है. गौर तलब है कि प्रचंड को नेपाल के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में जाना जाता है. वह नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राजन के.सी के खिलाफ काठमांडू के निर्वाचन क्षेत्र संख्या-10 से चुनावी मैदान में उतरे थे.

मतदान के पश्चात् से ही लाखों नेपाली नागरिक बेसब्री से चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहे हैं. संविधानसभा के चुनाव में मंगलवार को 70 फीसदी मतदान हुआ था. नेपाल निर्वाचन आयोग ने इस बार के मतदान को ऐतिहासिक करार दिया है.

नेपाल की पहली संविधानसभा का चुनाव 2008 में हुआ था, देश के नए संविधान का निर्माण करने में असफल रही थी.

पूर्व चुनाव में 54 राजनीतिक पार्टियों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से 25 पार्टियां 601 सदस्यीय संविधानसभा में प्रतिनिधत्व हासिल करने में कामयाब रही थीं. लेकिन पिछले साल संविधानसभा भंग कर दी गई थी.

पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’

11 दिसंबर 1954 को जन्मे पुष्पकमल दहल जिन्हें नेपाली राजनीति में प्रचंड नाम से संबोधित किया जाता है,नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी, माओवादी के नेता हैं. वे इसी पार्टी के शसस्त्र अंग जनमुक्ति सेना के भी शीर्ष नेता हैं. उन्हें नेपाल की राजनीति में 13 फरवरी 1996 से नेपाली जनयुद्ध शुरु करने के लिए जाना जाता है जिसमें लगभग 13.000 नेपाली नागरिकों की हत्या होने का अनुमान लगाया जाता है . प्रचंड द्वारा मार्क्सवाद, लेनिनवाद एवं माओवाद के मिले जुले स्वरूप को नेपाल की परिस्थितियों मे व्याख्यित करने को नेपाल में प्रचंडवाद के नाम से पुकारा जाने लगा है.

1990 में नेपाल में लोकतंत्र की वापसी के बाद भी श्री प्रचंड भूमिगत रहे. इस समय तक उन्हें नेपाली राजनीति में ज्यादा पहचान हासिल नहीं हुई थी और पार्टी द्वारा होनेवाले कार्यो का श्रेय पार्टी के एक अन्य नेता डॉक्टर बाबुराम भट्टराई को मिलता रहा. परंतु प्रचंड वैश्विक रूप से तब सुर्खियों में आये जब 1996 में वे पार्टी के सशस्त्र विंग के सर्वेसर्वा बने.

प्रचंड को नेपाली कांग्रेस के कम प्रसिद्ध नेता राजन के.सी ने 8,000 मतों के बड़े अंतर से काठमांडू के निर्वाचन क्षेत्र संख्या-10 से हराया.

रोचक बात यह है कि 2008 के चुनाव में प्रचंड, राजन को 11,000 मतों के अंतर से हरा कर देश के प्रधानमंत्री बने थे.

नेपाल में दशक तक चले माओवादी आंदोलन के मुख्य अगुआ रहे प्रचंड देश और इससे बाहर अपने करिश्माई व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं और 2006 से नेपाल की राजनीति में उनका दबदबा है.

दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र और माओवादी पार्टी से पूर्व सांसद रहे प्रचंड के करीबी सहयोगी हरी रोका ने आईएएनएस को बताया, “इसने यह दिखाया है कि लोग माओवादी पार्टी के एजेंडे से नाखुश हैं. लोग माओवादियों द्वारा लाए जा रहे मौलिक और प्रगतिशील एजेंडे पर सहमत नहीं हैं.”

प्रचंड सिराहा-5 निर्वाचन क्षेत्र से भी मैदान में है, जो कि भारत की सीमा से सटा हुआ इलाका है. अभी इस क्षेत्र का परिणाम सामने नहीं आया है, लेकिन शुरुआती रुझान में उनके यहां से जीतने की उम्मीद है, जो उनके लिए सांत्वना की तरह होगी.

प्रचंड की प्रतिष्ठा के लिए काठमाडू-10 की सीट काफी मायने रखती है और इसके पीछे इसके राजधानी के अंतर्गत स्थित होने तथा कई राजनीतिक महत्व रखने के साथ अन्य वजह हैं. इस बार प्रचंड संविधान सभा में दूसरा स्थान भी नहीं बचा पाएंगे.

निर्वाचन आयोग द्वारा आईएएनएस को उपलब्ध कराए गए आंकड़े के मुताबिक, रंजन के.सी को 20,393 जबकि कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्‍सिस्ट लेनिनिस्ट) (सीपीएन-यूएमल) के सुरेंद्र मनाधर को 13,615 जबकि प्रचंड को 12,852 मत प्राप्त हुए हैं.

अपने मुख्य विरोधी प्रचंड को हराने के बाद राजन ने संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने काठमांडू से माओवादियों के गढ़ को सफलतापूर्वक ध्वस्त कर दिया है, जो कि उनके कर्म का फल है. नेपाली कांग्रेस को इस चुनाव में बड़ी जीत मिलने की संभावना है.

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