नर्मदा नदी बन रही नाला: जलपुरुष राजेंद्र

Friday, March 13, 2015

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राजेंद्र सिंह- 'पानी वाले बाबा'

भोपाल | एजेंसी: नर्मदा नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर मैगसेसे पुरस्कार विजेता ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह चिंतित हैं. उनका कहना है कि नर्मदा अब गंदे नाले में तब्दील होने लगी है. इसमें मिलने वाली छोटी नदियां दम तोड़ रही हैं. कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा तथा तटीय शहरों के गंदे नाले इसकी सेहत बिगाड़ रहे हैं.

नर्मदा को लेकर आयोजित ‘मंथन’ में हिस्सा लेने मध्यप्रदेश आए राजेंद्र सिंह ने कहा कि कभी यह नदी सबसे कम प्रदूषित नदियों में शुमार थी. लेकिन वर्तमान में यह अपनी दुर्गति पर आंसू बहा रही है. तटीय शहरों की गंदे नाले इसमें मिल रहे हैं. रही-सही कसर औद्योगिक ईकाइयों के कचरों ने पूरी कर दी है. इसके अलावा इस नदी के प्रवाह को बढ़ाने में सहायक दो से 50 किलोमीटर लंबी अधिकांश नदियां या तो मृतप्राय हो चुकी हैं या सूख गई हैं.

राजेंद्र नर्मदा की इस हालत के लिए रासायनिक उर्वरकों को भी जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन कहते हैं कि इससे ज्यादा खतरनाक रासायनिक कचरा है, जो लगातार इस नदी में मिल रहा है. उनका कहना है कि इसे रोका जाना चाहिए .

नर्मदा के तट पर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चल रही कोशिशों के सवाल पर वह कहते हैं कि पर्यटन में अनुशासन जरूरी है, यह तभी संभव है जब प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण मुक्त हो.

नर्मदा का अस्तित्व बना रहे इसके लिए वह इसकी सेहत में सुधार लाने पर जोर देते हैं. उन्होंने कहा कि नर्मदा का स्वास्थ्य तभी ठीक होगा, जब उसके दोनों किनारों पर हरियाली बढ़ाई जाए, कटाव रोका जाए, नालों को नदी में न मिलने दिया जाए साथ ही भूजल पुन:भरण पर जोर दिया जाए. इसके अलावा नर्मदा में मिलने वाली छोटी नदियों को पुन:जीवित किया जाए, जिससे नदी का प्रवाह बढ़े.

राजेंद्र ने कहा कि वे उत्तर और दक्षिण भारत की 100 से ज्यादा नदियां देख चुके हैं, मगर कोई भी ऐसी नहीं है जिसके शहरी तट के पानी को पिया जा सके.

वह कहते हैं कि जब भी कोई नदी किसी शहर के करीब पहुंचती है तो उसमें नालों का पानी मिलता नजर आता है. नदियों में सीवर मिल रहे हैं. ऐसे में नदी, नदी नहीं बचती.

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