चूहे कर रहे रेलगाड़ियों में सफर

Wednesday, December 18, 2013

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रेलवे

रायपुर | एजेंसी: आमतौर पर रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म पर या पटरियों के बीच चूहों को उछलते-कूदते देखना आम बात है, लेकिन वही चूहे अगर रेल के डिब्बों में दौड़ते दिखें, तो कुछ अजीब-सा लगता है! मगर ऐसा ही हो रहा है.

छत्तीसगढ़ में इन दिनों फसलों की कटाई हो जाने के बाद से रेल लाइन किनारे के खेतों के चूहे ट्रेनों में पहुंच रहे हैं और ज्यादातर लंबी दूरी की रेलगाड़ियों के वातानुकूलित और शयनयान श्रेणी में उछल-कूद मचाते देखे जा रहे हैं.

यूं तो चूहों का बसेरा सबसे ज्यादा खेत और खलिहानों में ही होता है. धान के पौधों में बालियां लगने के दौरान चूहे खेतों में पहुंचते हैं और वहीं डेरा डालकर बिल बना लेते हैं. बालियां लगने और फसल कटने तक उनका वहीं बसेरा रहता है. चूंकि अब अधिकांश फसलों की कटाई हो चुकी है और किसान फसलों को खलिहानों में ले आए हैं, इसलिए अब चूहों को अपना बसेरा बदलना पड़ रहा है.

ज्यादातर चूहे फसलों के साथ खलिहानों में पहुंच गए हैं और जो खलिहान नहीं पहुंच पाए वे आसपास के घरों में घुस गए, मगर रेललाइन के किनारे के खेतों के चूहे स्टेशनों पर पहुंचकर रेल में सवार हो रहे हैं.

सूबे में रेल पटरियों के किनारे राजनांदगांव से लेकर बिलासपुर रायगढ़ तक विभिन्न स्टेशनों से होकर गुजरनी वाली ज्यादातर रेलगाड़ियों में चूहों की उछल-कूद साफ दिखाई दे रही है.

रायपुर स्टेशन से गुजरने वाली लिंक एक्सप्रेस, साउथ बिहार एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, इंटरसिटी, हावड़ा-अहमदाबाद सुपरफास्ट, अमरकंटक सुपरफास्ट, सारनाथ एक्सप्रेस, शिवनाथ एक्सप्रेस आदि रेलगाड़ियों की बोगियों में छोटे-बड़े चूहों को उछलते-कूदते देखा जा सकता है.

रोजाना रायपुर से तिल्दा आने-जाने वाले रामानंद वर्मा ने बताया कि सबसे ज्यादा चूहे साउथ बिहार एक्सप्रेस और छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में दिखते हैं. चूंकि ये रेलगाड़ियां लंबी दूरी तक चलती हैं, इसलिए इनमें चूहों को खाने के लिए ज्यादा सामग्री मिलती है.

बिलासपुर से रायपुर रोजाना आने-जाने वाले आलोक तिवारी ने बताया कि लिंक एक्सप्रेस में भी चूहों को वह रोजाना कूदते देखते हैं. दुर्ग-रायपुर और राजनांदगांव के मध्य हर दूसरे दिन यात्रा करने वाले राजू क्षत्रिय का कहना है कि चूहों से अभी तक उन्हें कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा है, पर पहले की अपेक्षा अब चूहे ज्यादा संख्या में देखे जा रहे हैं.

बताया जाता है कि चूहों के कारण यात्रियों को कोई खास परेशानी नहीं होती, इसलिए रेल प्रबंधन से कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं करते. यात्री अपने कपड़े और खाने-पीने का सामान अटैची और बैग में रखते हैं, जिसे चूहे नुकसान नहीं पहुंचा सकते. चूहे केवल सीटों के नीचे गिरी खाद्य सामग्री को खाकर अपना पेट भर लेते हैं.

सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह है कि चूहे लोकल और पैसेंजर रेलगाड़ियों में नहीं चढ़ते, बल्कि एक्सप्रेस और सुपरफास्ट गाड़ियों में ही चढ़ते हैं. वह भी वातानुकूलित और शयनयान बोगियों में. धुर आम सवारी वाले सामान्य श्रेणी की तरफ उनका ध्यान नहीं जाता है.

इसके पीछे कुछ खास कारण हैं, लोकल और पैसेंजर रेलगाड़ियों तथा सामान्य श्रेणी की बोगियों में यात्रियों की भीड़ के कारण चूहों को स्वतंत्र रूप से कूदने-फांदने की जगह नहीं मिलती. चूंकि शयनयान और वातानुकूलित श्रेणी में अपेक्षाकृत कम भीड़ रहती है, साथ ही इनमें लंबी दूरी के यात्री ज्यादा रहते हैं, जो अपने साथ खाद्य सामग्री लेकर चलते हैं, इसलिए इन बोगियों में चूहों को पेटभर भोजन और स्वच्छंद रूप से भागने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है.

इस मामले में रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी रतन बसाक का कहना है कि यात्रियों को अपने सामान की सुरक्षा व देखभाल खुद करनी होती है. पार्सल इत्यादि में जाने वाले सामान की सुरक्षा रेलवे करता है. रही बात चूहों की तो यह उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी बताई जाती है. इस सीजन में चूहे खाने-पीने की लालच में रेल के डिब्बों में पहुंच जाते हैं.

वैसे अभी तक चूहों ने किसी भी यात्री को नुकसान नहीं पहुंचाया है, लेकिन यदि यात्रियों को नुकसान पहुंचा तो चूहे रेलवे प्रबंधन के लिए सिरदर्द साबित होंगे.

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