इन सवालों पर मन का मौन

Saturday, January 4, 2014

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मनमोहन सिंह -पूर्व प्रधानमंत्री

सुदीप ठाकुर
अभी डेढ़ साल पहले तक मनमोहन सिंह सरकार के लिए माओवादी हिंसा देश की सबसे बड़ी समस्या थी. लेकिन चूंकि गृहमंत्री बदल गया है, सरकार का फ़ोकस बदल गया है. अब प्रधानमंत्री को सवा घंटे की प्रेस कांफ्रेंस में न तो इस समस्या की याद आती है न पत्रकारों की ओर से कोई सवाल आता है.

यही हाल किसानों की बदहाली का है. एक समय था जब राहुल गांधी के लिए संसद में उठाने के लिए सबसे अहम सवाल किसानों की आत्महत्या था. कलावती का ज़िक्र भी उसी की वजह से आया था. लेकिन आज प्रधानमंत्री को एक बार भी उनकी याद नहीं आई.

यही नहीं, यूपीए सरकार के साढे नौ वर्ष के कार्यकाल के दौरान गरीबी की रेखा की परिभाषा को लेकर भी विवाद रहा. सक्सेना कमेटी, तेंदुलकर कमेटी, अभिजीत सेन कमेटी, योजना आयोग और न जाने सरकार की कितनी एजेंसियां इस बात पर उलझी रही हैं कि आखिर किन्हें गरीबी की रेखा के नीचे माना जाए. अलग अलग राज्यों और केंद्र की योजनाओं के लाभार्थियों के लिहाज से भी देखें तो गरीबों की संख्या को लेकर गड़बड़ियां हैं. मगर न तो प्रधानमंत्री ने इस पर एक शब्द कहा और न ही किसी पत्रकार ने उनसे इस पर कोई सवाल किया.

प्रेस कांफ्रेंस में तकरीबन सारे सवाल प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी, उनके साढ़े नौ वर्ष की उपलब्धियों, या उनकी नाकामियों. नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के उभार, अर्थनीति, निवेश और राहुल आदि पर केंद्रित थे. यूपीए के साढ़े नौ वर्ष के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह ने कई बार माओवादी हिंसा को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था. अफसोस की बात है कि देश की आबादी में आठ फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले आदिवासियों के बारे में देश के एक भी पत्रकार ने प्रधानमंत्री से कोई सवाल करने की जरूरत नहीं समझी.

इसकी वजह शायद यही है कि जुलाई, 2012 के बाद से देश में गृहमंत्री बदल गया है और उसकी प्राथमिकताएं दूसरी हैं. पी चिदंबरम के गृहमंत्री रहते न केवल माओवादी हिंसा देश की सबसे बड़ी समस्या थी, उससे निपटने की कार्ययोजना बनाना भी देश की सबसे बड़ी चुनौती थी. वही दौर था जब यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के नेता छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के नेतृत्व में चल रहे कथित जनांदोलन सलवा जुड़ूम में सरकार के साथ थे.

या तो जंगलों के भीतर वह सब हो चुका जो सरकार चाहती थी. गृहमंत्री बदला तो प्राथमिकताएं बदल गईं. सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद सलवा जुड़ूम बंद हो गया. हर ज़िले को 200 करोड़ रुपए की विशेष सहायता की घोषणा हो गई. अब न भाजपा को याद है न सरकार को. पत्रकारों के लिए तो खैर आदिवासी उनके सरोकारों का हिस्सा थे ही नहीं.

यही नहीं, जमीन के अधिग्रहण और किसानों से जुड़े सवाल भी हमारे पत्रकारों की चिंता में शामिल नहीं हैं. जबकि देश के ढाई लाख से भी अधिक किसान बदहाली के चलते खुदकुशी कर चुके हैं. उनसे उन करोड़ों लोगों के बारे में भी कोई सवाल नहीं किया गया जिनके लिए एफडीआई और नई आर्थिक नीति के कारण रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है. आज देश की राजनीति को बदलने की बातें हो रही हैं, क्या देश के मीडिया को भी बदलने की जरूरत नहीं है?

खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने साढ़े नौ वर्ष के कार्यकाल की इस तीसरी और आखिरी प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत करते हुए अपने आरंभिक उद्बोधन में अपनी सरकार की उपलब्धियों को तो गिनाया, मगर इन मुद्दों पर एक लफ्ज तक नहीं कहा.

सवाल यह नही है कि 2014 में यूपीए की सरकार बनेगी या मोदी की सरकार बनेगी या तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी. क्या प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछा जाना चाहिए था कि जब आप माओवादी हिंसा को सबसे बड़ा खतरा बताते हैं तो आपने इसे रोकने के लिए साढ़े नौ साल में किया क्या? आदिवासी आज भी मानव विकास सूचकांक में सबसे नीचे क्यों है?

देश का किसान आश्वस्त क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी चीजों के जरिये ही देश के कामगार और गरीब तबके को लुभाया जाएगा और उनके रोजगार की कोई टिकाऊ व्यवस्था नहीं की जाएगी? सांप्रदायिक राजनीति खत्म क्यों नहीं हो रही है?

आखिर क्यों राजधानी से सवा सौ किमी दूर सैकड़ों लोगों को मुजफ्फरनगर और शामली के शिविरों में ठिठुरती ठंड और बदहाली में रहना पड़ रहा है? प्रधानमंत्री ने क्या इस बात का संज्ञान लिया है? क्या राज्य सरकार जहां नाकाम हो जाए वहां केंद्र को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ?

*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और अमर उजाला से संबद्ध हैं.

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