मेजर ध्यानचंद ने दी भारत में खेल को दिशा

Thursday, August 29, 2013

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मेजर ध्यानचंद

नई दिल्ली | एजेंसी: एक समय था, जब बच्चों से कहा जाता था कि ‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब’, लेकिन आज वक्त बदल चुका है. आज खेल के क्षेत्र में युवा वो तमाम उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, जो अन्य क्षेत्रों के लोग हासिल करते रहे हैं. कई युवा तो बहुत कम उम्र में ही इतना नाम कमा चुके हैं कि आज हर माता-पिता अपने बच्चे को एक सफल खिलाड़ी बनाने का सपना संजोने लगे हैं.

वक्त के साथ लोगों की सोच बदली है. इसमें कोई शक नहीं. इसमें खेलों की लोकप्रियता और उससे उससे अर्जित होने वाला धन मायने रखता है. इसी कारण लोग आज खेलों की ओर तेजी से अग्रसर हुए हैं. कई खिलाड़ी चंद वर्षो में खाक से आसमान पर पहुंच गए और कई भारतीय खेल जगत के पोस्टर-ब्वाय बन गए.

इस सोच को बदलने में भारतीय खेलों के पितामह माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद का नाम अव्वल है. ध्यानचंद ने लगभग आठ दशक पहले ही लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि खेलों में कदम रखना गलत नहीं है. ध्यानचंद की ही देन है कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है और उनका जन्मदिन (29 अगस्त) राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है.

ध्यानचंद ने देश को हॉकी में वह उपलब्धि हासिल करवाई जिसके कारण आजादी के बाद देश ने बड़े गर्व के साथ हॉकी को अपना राष्ट्रीय खेल की तरह अपनाया. हॉकी में ध्यानचंद की अहमियत को इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्हें फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है. इस महान सपूत को सम्मान देते हुए राष्ट्रपति खेल सम्मान से खिलाड़ियों को सम्मानित करते हैं. इस दिन खेल रत्न, अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार वितरित किए जाते हैं.

ध्यानचंद ने देश को लगातार तीन ओलपिंक (1928, 1932, 1936) में देश को हॉकी में विश्व का सिरमौर बनाए रखा. ध्यानचंद ने 16 वर्ष की आयु में हॉकी खेलना शुरू किया और अपनी सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी की प्रतिष्ठा अर्जित की.

ध्यानचंद ने ओलम्पिक खेलों में 101 गोल और अंतर्राष्ट्रीय खेलों में 300 गोल दाग कर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया है. एम्सटरडम हॉकी ओलम्पिक मैच में 28 गोल किए गए जिनमें से ग्यारह गोल अकेले ध्यानचंद ने ही किए थे. तीनों ओलपिंक में ध्यानचंद सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी रहे.

मेजर ध्यानचंद सिंह को वर्ष 1956 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. मेजर ध्यानचंद के करीबी दोस्त और साथी खिलाड़ी उन्हें चंद कहकर पुकारते थे, जिसका अर्थ है अंधेरी रात में रोशनी बिखेरने वाला चांद.

जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने भी ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर उन्हें जर्मन आर्मी में उच्च अधिकारी बनाने की पेशकश की लेकिन ध्यानचंद ने अपनी सभ्यता और नम्र व्यवहार का परिचय देते हुए इस ओहदे के लिए मना कर दिया. बहुत कम लोगों को पता है कि मेजर ध्यानचंद ने अपनी जीवनी और महत्वपूर्ण घटना वृतांतों को अपने प्रशंसकों के लिए अपनी आत्मकथा ‘गोल’ में प्रस्तुत किया है. खेलों में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए उनका जीवन और खेल दोनों ही एक मिसाल हैं.

गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं. यहां तक कि हॉलैंड (इस समय नीदरलैंड्स) में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर जांच की गई थी. जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई. ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों.

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना कायल बना दिया था. यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंतर पर पड़ता है.

दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है. ब्रैडमैन ने एक बार यह जानकर कि ध्यानचंद ने तब तक 48 मैच में कुल 201 गोल दागे हैं तो उनकी टिप्पणी थी, “यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने.”

यह ध्यानचंद जैसे सर्वकालिक खिलाड़ियों की ही देन है कि आज देश का कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को खेल के प्रति हतोत्साहित नहीं बल्कि प्रोत्साहित करता है.

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