दत्तक पुत्रों से सरकारी कमीज अब भी दूर

Saturday, September 21, 2013

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कोरवा जनजाति

कोरबा । अब्दुल असलम: 200 पांचवी व आठवी पास पहाड़ी कोरवा को है नौकरी का इंतजार है. राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोगो को मुख्यधारा जोडऩे के लिए शासन द्वारा करोड़ो खर्च किया जा रहा है यहाँ तक की शासन ने आठवीं पास कोरवाओ को नौकरी देने का आदेश दिया है लेकिन जिले के अधिकारयो की उदासीनता का ही ये नतीजा है की कोरबा जिले के पढ़े लिखे होने के बावजूद 200 पहाड़ी कोरवाओं को अब भी सरकारी नौकरी का इंतजार है.

मजदूरी करने को मजबूर पहाड़ी कोरवा आज भी मदद की उम्मीद में सरकार की ओर नजरे टिकाये बेठे है लेकिन सरकारी मदद पहाड़ी कोरवाओ की पहुच से कोसो दूर नजऱ आ रहा है. पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के ग्राम लालपुर ग्राम पंचायत के ठिर्री आमा गांव जहा राष्ट्रपति के दतक पुत्र कहे जाने वाले पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोगो को जीवन की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए पहाड़ो से लाकर गाव में बसाया गया है.

यहां शासन द्वारा करोड़ो खर्च कर उन्हें विस्थापित भी किया गया है. वही शासन द्वारा आठवी और पॉचवी पास पहाड़ी कोरवा जनजाति को नौकरी देने का प्रावधान भी रखा है ताकि वे अपना जीवन सुधार सके लेकिन ग्राम लालपुर के पढ़े लिखे कोरवा जनजाति के लोगो को आजतक नौकरी नहीं मिल पाई है.

मजबूरन उन्हें मजदूरी कर परिवार चलाना पड़ रहा है. पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोगो की माने तो उनहोने अपना आवेदन आदिवासी विभाग में जमा करवाया है लेकिन साल भर गुजरने के बाद भी उनकी नौकरी नहीं लगी है. कोरबा जिले में पहाड़ी कोरवाओं की जनसंख्या 2400 के करीब है. जिसमें अधिकांश कोरवा आठवीं के दहलीज से आगे की पढ़ाई गरीबी और परिवारिक परेशानियों के कारण नहीं कर पा रहे. और न ही केन्द्र शासन द्वारा चलाए जा रहे राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया जा रहा .

कोरवा जाति के लोगो को नौकरी दिए जाने के मामले में आदिवासी विभाग के अधिकारी दलील देते है कि ‘‘ अब तक विभाग ने 37 कोरवा जनजाति के लोगो को नौकरी दी है और जबकि विभाग के पास अब भी 200 लोगो ने नौकरी के लिए आवेदन जमा है. जल्द ही विज्ञापन निकाल पहाड़ी कोरवाओ को नौकरी की कवायद शुरू की जाएगी साथ ही उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाएगा’’. यह कहना है श्री कान्त दुबे, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग, कोरबा का.

पहाड़ी कोरवा रतनु, ठिर्रीआमा निवासी का कहना है कि पांच साल पहले आठवी कक्षा पास करने के बाद से सरकारी नौकरी के लिए कई बार आवेदन किया जा चुका है. इसके पहले दो कलेक्टरों से नौकरी की मांग को लेकर मुलाकात किया था. आज पर्यंत नौकरी नहीं मिली.

रायसिंह, ठिर्री आमा निवासी ने बताया कि गांव में आठवीं के बाद स्कूल नहीं है. मजबूरन परिवार चलाने के लिए नौकरी करने के लिए आगे आना पड़ रहा है. कृष्णा, दुधीटागर निवासी ने बताया कि आगे पढ़ाई करने करने की इच्छा है. मगर उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने के चलते आधे में ही पढ़ाई छोडऩी पड़ी.

गौर तलब है कि पहाड़ी कोरवा राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र है साथ ही देश के अतिविशेष संरक्षित जाती के अंतर्गत शामिल किए गए है. सरकारी तंत्र कागजों में इन पहाड़ी कोरवाओं के विकास को दिखाने इन्हें चपरासी व भृत्य के पदों पर नियुक्ति कर एक प्रकार से इनका अपमान कर रही है.

विडंबना ही कहें कि ऊर्जाधानी कहलाने वाले कोरबा जिले में एक भी पहाड़ी कोरवा ने कॉलेज की दहलीज में पांव तक नहीं रखा है. राज्य सरकार कौशल विकास उन्नयन केन्द्र का ठिठोरा पिट रही है. पर ये कौशल पहाड़ी कोरवाओं के विकास पर नहीं उतर सका.

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