कन्हर बांध से उपजे सवाल

Thursday, May 7, 2015

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कनहर बांध-विरोध

संजय पराते

कन्हर बांध से छत्तीसगढ़ के 27 गांव डूब जाने वाले हैं जिनकी आबादी 50 हजार है. छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से सटे उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले में कन्हर बांध के निर्माण से छत्तीसगढ़ के इस जिले के रामचंद्रपुर ब्लाक से 19 गांव पूर्णतः तथा 8 गांव आंशिक रुप से डुबान में आ रहे हैं. इन 27 गांवों की सम्मिलित आबादी लगभग 50 हजार है और इसमें लगभग दो तिहाई आदिवासी-दलित हैं. इस बांध निर्माण का विरोध न केवल उत्तरप्रदेश में हो रहा है, बल्कि छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है और अभी हाल ही में विभिन्न जनसंगठनों व वामपंथी पार्टियों के विरोध के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपनी आपत्ति दर्ज करा दी है (लेकिन 5 माह बाद!!) . इस बांध निर्माण ने विकास के कार्पोरेट परस्त उस मॉडल पर फिर बहस करने का मौका दिया है, जिसे मोदी सरकार आगे बढ़ाना चाह रही है.

दरअसल, इस बांध निर्माण की पूरी योजना 1976 में परिकल्पित की गई थी और तब से अब तक कन्हर नदी में काफी पानी बह चुका है इस परियोजना की कल्पना मुख्यतः किसानों के खेतों को सिंचाई हेतु पानी देने के लिए की गई थी इसके लिए उत्तरप्रदेश के 11 गांव विस्थापन की पीड़ा झेलने के लिए तैयार थे. शायद सभी ने देश के विकास के लिए अपनी ‘कुर्बानी’ देना स्वीकार कर लिया था और लगभग 2700 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा भी ले लिया था. तब पर्यावरण, विस्थापन, भूमि अधिग्रहण के सवाल इतने प्रखर रुप में मौजूद नहीं थे, जैसे कि आज हैं. तब न पेसा कानून था, न आदिवासी वनाधिकार कानून और न ही वन संरक्षण कानून.

लेकिन उस समय भी जनता और किसानों के हितों की चिंता ‘सरकारी चिंता’ नहीं थी. यदि होती तो बांध कब का बन जाता. नहीं थी, इसलिए यह परियोजना पूरे 38 सालों से लटकी पड़ी रही. सरकार ने इस अधिग्रहीत भूमि पर अपना कब्जा तक नहीं जमाया और भूस्वामी इस जमीन पर काबिज रहे, खेती-बाड़ी करते रहे. इस बीच नया भूमि अधिग्रहण कानून बन गया, जो यह कहता है कि अधिग्रहीत भूमि का 5 साल तक उपयोग न हो, तो इसे मूल भूस्वामी को लौटा दिया जाये और अधिग्रहण की प्रक्रिया नये सिरे से, नई मुआवजा दरों व पुनर्वास प्रावधानों के अनुसार की जाये. इससे पहले आदिवासी वनाधिकार कानून भी अस्तित्व में आ गया था, जिसके अनुसार विस्थापन से पूर्व वन भूमि पर काबिज आदिवासियों के वनाधिकारों की स्थापना जरूरी है. पेसा कानून भी बन गया, जो विकास कार्यों के नाम पर भूमि अधिग्रहण के लिए ‘ग्राम सभा की सहमति या असहमति’ को सर्वोच्च वरीयता देता है. पर्यावरण व वन संरक्षण कानून भी बन गया, जो जैव विविधता की कीमत पर विकास की इजाजत नहीं देता.

ये सब कानून जनविरोधी नहीं हैं, विकास विरोधी तो कतई नहीं. हां, अंधाधुंध पूंजीवादी विकास, जिसका धन कुबेरों की तिजोरी भरना ही लक्ष्य रहा है, कि प्रक्रिया में उन चिंताओं -चुनौतियां का समाधान पेश करने की कोशिश जरूर करते हैं, जो मानव जाति के अस्तित्व और मानव सभ्यता के सामने उपस्थित हुई है और काफी प्रखरता के साथ उपस्थित हुई है.

लेकिन आज कन्हर बांध का निर्माण इन तमाम कानूनों को धता बताकर, पुरानी पर्यावरणीय स्वीकृतियों के आधार पर किया जा रहा है, तो यह स्पष्ट है कि पानी किसानों के खेतों को सींचने के लिए नहीं, उद्योगपतियों के उद्योगों को सींचने और उनकी तिजोरियों को भरने के लिए दिया जाने वाला है. प्राकृतिक संपदा की हड़प इसी तरह होती है- जिसके केन्द्र में आज जल, जंगल, जमीन और खनिज ही है. यह ‘हड़प’ स्थानीय समुदायों का पुनर्वास नहीं करती, बल्कि उसका कत्लेआम करती है. इसका एक नजारा तो 14 अप्रैल को दिखा, जहां बांध निर्माण का विरोध कर रहे स्थानीय वाशिंदों पर पीएसी ने गोलियां चलाई और एक को मार डाला, 39 को घायल कर दिया. लगभग 1000 लोगों पर फर्जी मुकदमें गढ़े गये हैं, ताकि विरोध की आवाज को कुचला जा सके. यह ‘हड़प’ बंदूक की नोक पर लोगों को अपने अधिकारों को त्यागकर विस्थापन के लिए ‘सहमत’ करती है. उत्तरप्रदेश सरकार और सोनभद्र का स्थानीय प्रशासन इसी प्रकार की सहमति को तैयार करने के खेल में लगा हुआ है.

लेकिन विकास के इस बुल्डोजर के नीचे अब किसी एक राज्य की कोई एक स्थानीय आबादी ही नहीं आती, पड़ोसी राज्यों के लोग भी इसका शिकार होते हैं. जिस तरह आंध्र का पोलावरम बांध दक्षिण छत्तीसगढ़, उसी प्रकार कन्हर का बांध उत्तर छत्तीसगढ़ (और झारखंड) के लोगों को विस्थापित करने जा रहा है. छत्तीसगढ़ का जल संसाधन विभाग 27 गांवों के पूर्णतः या आंशिक डूबत की बात स्वीकार कर रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार अभी भी केवल 268 हेक्टेयर भूमि के डूबने की बात कर रहा है. प्रश्न यही है कि उत्तरप्रदेश में बन रहे बांध का खामियाजा छत्तीसगढ़ की जनता क्यों भुगते? उत्तर भी बहुत सीधा-सा है कि वित्तीय पूंजी राष्ट्रों की सीमाओं का अतिक्रमण करती है, तो कार्पोरेट विकास भी राज्यों की सीमाओं को नहीं देखते. उसे न उत्तरप्रदेश के लोगों के अधिकारों की चिंता होती है और न ही छत्तीसगढ़ के लोगों की. उसकी चिंता केवल यही होती है कि अपना मुनाफा किस तरह बढ़ाया जाये. इस मुनाफे की आड़ में आने वाली हर दीवार को वह गिरा देना चाहती है.

यही कारण है कि 5 साल तक छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार एक लंबित चुप्पी साधे रही. वर्ष 2010 में उसने उत्तरप्रदेश सरकार को इस बांध निर्माण के लिए अपनी सहमति प्रदान की, लेकिन इससे प्रभावित होने वाले 27 गांवों के लोगों के हितों की चिंता उसने कभी नहीं की. यदि की होती, तो नये कानूनों के प्रावधानों के अनुसार पुनर्वास और मुआवजे की कोई कार्ययोजना उसके हाथों में होती. अभी तो यही स्पष्ट नहीं है कि बांध निर्माण के लिए सहमति उसने किन शर्तों पर दी है और उसका आज तक कितना पालन हुआ है.

स्पष्ट है कि वनाधिकार कानूनों की स्थापना किये बिना, जिस पर इस क्षेत्र में अमल ही नहीं हुआ है, आदिवासियों को भू अधिग्रहण का कोई लाभ नहीं मिलने वाला है. बिना भूमि अधिग्रहण के किसी मुआवजे व पुनर्वास योजना के लिए भी सरकार बाध्य नहीं है. फिर पेसा कानून के तहत स्थानीय समुदाय की सहमति का सवाल ही कहां खड़ा होता है? यह हड़प नीति साफ है कि बिना कुछ दिये आदिवासी व किसानों से उसकी जमीन ले लो, विस्थापन की उस बर्बर प्रक्रिया में उसे धकेल दो, जहां उसका अस्तित्व भी शायद ही बचे. छत्तीसगढ़ सरकार का ऐसा रुख आश्चर्यजनक नहीं है. आखिर मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार से वह पीछे क्यों रहेगी, जहां लोग अपनी जमीन बचाने के लिए पिछले एक माह से जल सत्याग्रह कर रहे हैं, अपने शरीर को गला रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें मानवीय जीवन के लिए जमीन देने के लिए तैयार नहीं है. आज की सरकारें कार्पोरेटों के लिए जमीन छीन सकती हैं, आम जनता को जीने के लिए जमीन दे नहीं सकती. वो दिन गए, जब भूमि सुधारों की बात होती थी, भाषणों में ही सही.

कन्हर बांध निर्माण का मामला इस देश में कार्पोरेटी विकास का जो मॉडल अपनाया जा रहा है, उसका विशिष्ट उदाहरण है. इस प्रकरण में वे तमाम चीजें एक साथ देखने को मिलेंगी, जिसे मोदी सरकार लागू करना चाहती है, आम जनता के जनतांत्रिक अधिकारों व तमाम नियम-कायदों को रौंदकर. भूमि अधिग्रहण कानून अध्यादेश के ‘जनहितैषी’ होने के पक्ष में भाजपा जो ढिंढोरा पीट रही है, उसका वास्तविक नग्न स्वरूप इस मामले में देखने को मिल रहा है. यही मामला यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि जिस वनाधिकार कानून का संप्रग राज में भाजपा ने समर्थन किया था, भाजपा शासित राज्यों में उसको लागू क्यों नहीं किया गया?

अब जनता को तय करना है कि वह ‘भूमि हड़प कार्पोरेट विकास’ के पक्ष में है या कार्पोरेट मुनाफे को मात देने के लिए अपनी भूमि और संपत्ति बचाने के पक्ष में? जनता का बहुत ही स्पष्ट जवाब है, जो पूरे देश में गूंज रहा है– विस्थापन की कब्र पर विकास की बातें नहीं चलेगी. क्या आम जनता की नुमाइंदगी का दावा करने वाली राजनैतिक पार्टियां इस आवाज को सुनने के लिए तैयार हैं?

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