जीतन मांझी होने का मतलब

Wednesday, May 21, 2014

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जीतन राम मांझी

पटना | मनीष शांडिल्य: सत्तर वर्षीय जीतन राम मांझी ने बिहार की कमान संभाल ली है. बिहार के तेईसवें मुख्यमंत्री के रुप में शपथ लेने वाले जीतन के लिए इस पद तक पहुंचने का सफर बहुत रोचक है.

इस मायने में कि जब 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता दूसरी बार संभाली थी तो जीतन को भी अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. लेकिन तब चैबीस घंटे के अंदर भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था.

तब यह बात सामने आई थी कि शिक्षा विभाग से जुड़े एक कथित घोटाले में निगरानी विभाग उनके खिलाफ जांच कर रही है. बाद में 2008 में इस मामले में आरोपमुक्त किए जाने के बाद उन्हें फिर से नीतीश सरकार में शामिल किया गया. उसके बाद से वे लगातार सरकार का हिस्सा हैं और निवर्तमान नीतीश सरकार के सबसे गरीब मंत्री भी हैं.

हालांकि 2005 के पहले भी जीतन तीन मुख्यमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे. 1983 में वे पहली बार चंद्रशेखर सिंह की सरकार में समाज कल्याण विभाग में उपमंत्री बनाए गए थे. इसके बाद उन्होंने बिंदेश्वरी दूबे और राबड़ी देवी की सरकार में भी मंत्रीपद संभाला.

अनोखे अंदाज में मिली खुशखबरी
जीतन राम मांझी को विधायक दल का नेता चुने जाने की सूचना अनोखे अंदाज में मिली. इस संबंध में उन्होंने मीडिया को बताया कि विधायक दल की बैठक के बाद वे अपने क्षेत्र गया जाने वाले थे. तभी मुझे फोन पर कार्यवाहक मुख्यमंत्री ने अपने आवास पर बुलाया और कहा कि आइये अब ये घर आपका है. फिर उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि आपको विधायक दल का नेता चुना गया है.

सत्रह मई को नीतीश कुमार द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कई नाम शामिल थे लेकिन जीतन बिना दौड़ में शामिल हुए ही मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच गए.

राजनीतिक विश्लेषक मांझी के चयन को दो तरीके से देख रहे हैं. पहला नजरिया यह है कि चूंकि जदयू में नीतीश और शरद गुट के पसंदीदा उम्मीदवारों में से किसी नाम पर सहमति नहीं बनी तो जीतन को नेता के रुप में चुना गया.

हालांकि नेता चुने जाने के बाद उन्होंने साफ किया है कि वे नीतीश कुमार के करीबी हैं और विश्वस्त में से भी हैं. लेकिन ‘यस मैन’ नहीं हैं. इशारों में अपनी वरीयता के संबंध में उन्होंने कहा कि वे 1980 में विधायक बने जबकि नीतीश 1985 में.

दूसरी ओर विश्लेषक इसे जदयू द्वारा दलित या कहें कि महादलित समुदाय में अपने आधार को और मजबूत करने के लिए उठाए गए कदम के तौर पर भी देख रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि आम चुनाव में महादलितों ने बड़े पैमाने पर जदयू का साथ दिया है.

गौरतलब है कि दलितों में पासवान जाति को छोड़ बाकी सभी जातियों को बिहार में महादलित का दर्जा दिया और नीतीश सरकार द्वारा उनके लिए कई योजनाएं शुरु की गईं. इन योजनाओं को जीतन के मंत्रालय यानी की अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्रालय के जरिए ही जमीन पर उतारा गया. ऐसा माना जाता है कि इस योजना ने एक हद तक दलितों के बड़े समुदाय के सशक्तीकरण और विकास में भूमिका निभाई है.

तीसरे दलित मुख्यमंत्री
बिहार में मंगलवार को चौंतीस सालों बाद दलित समाज को कोई नेता मुख्यमंत्री की जिम्मेवारी संभालेगा. जीतन के पहले दलित समाज से मुख्यमंत्री बनने वालों में कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री और जनता पार्टी के रामसुदंर दास शामिल हैं.

इनमें से रामसुदंर दास वर्तमान में जदयू के ही नेता है. हालिया आम चुनाव में हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से वे लोजपा नेता रामविलास पासवान के मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहे थे.

हालिया संपन्न हुए आम चुनाव की बात करें तो जीतन भी अभी गया सिटी पर मिली करारी हार से उबर ही रहे थे कि उन्हें मुख्यमंत्री पद की जिम्मेवारी और सम्मान मिल गया. गया सीट पर वे जदयू के दूसरे तीस से अधिक उम्मीदवारों की तरह मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहे थे और लगभग दो लाख मतों से चुनाव हारे थे.

क्लर्क की नौकरी
सन 1944 में जीतन का जन्म गया जिले के महकरा में छह अक्तूबर को हुआ था. उनके पिता स्वर्गीय रातजीत मांझी एक खेतिहर मजदूर थे और उन्हें भी होश संभालने के बाद रोटी की जुगाड़ में गांव के बड़े किसानों के यहां मजदूरी करनी पड़ी था.

गौरतलब है कि मांझी दलितों में जिस मुसहर समाज से आते हैं, उनमें से दो-तिहाई से ज्यादा आबादी आज भी भूमिहीन है.

स्नातक जीतन ने राजनीति में आने से पहले डाक और संचर विभाग में क्लर्क की नौकरी भी की है. वे 1980 के दशक में राजनीति में तब आए जब देश की राजनीति में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को बुलायेंगे’का नारा बुलंद हो रहा था.

कांग्रेस के रास्ते राजनीति शुरु करने वाले जीतन अब तक तीन दलों में रह चुके हैं. वे चार विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए अब तक छह बार विधायक चुने गए हैं. वर्तमान में वह जहानाबाद जिले के मखदुमपुर सुरक्षित सीट से विधायक हैं. मांझी पहली बार 1980 में कांग्रेस के टिकट पर गया जिले के फतेहपुर सुरक्षित सीट से विधायक चुने गए थे.

यह भी दिलचस्प है कि वे परिवाद से इतर परिवार के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं. उनके पुत्र संतोष मांझी भाजपा कार्यकर्ता हैं.

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