अल्पसंख्यक होने का मतलब

Wednesday, January 29, 2014

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अल्पसंख्यक

सुभाष गाताडे
जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय का दरजा देने पर अंतत: केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में मुहर लगा दी गयी. इस तरह पहले से चले आ रहे पांच अल्पसंख्यक समुदायों – मुसलिम, ईसाई, सिख, बौद्घ और पारसी- की कतार में जैन समुदाय के भी शामिल होने का रास्ता सुगम हो गया है. कैबिनेट द्वारा प्रसारित नोट के मुताबिक जैन को नेशनल कमीशन फॉर माइनारिटीज एक्ट (एनसीएम) 1992 की धारा-2 में शामिल किया जायेगा. फिलहाल 12 राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, दिल्ली, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और असम- में जैन समुदाय को यह दरजा पहले से हासिल है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान खान के मुताबिक जल्द ही इसकी अधिसूचना जारी होगी.

कुछ समय पहले जब जैन समुदाय का शिष्टमंडल केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन के नेतृत्व में राहुल गांधी से मिला था और उसके बाद उसी शिष्टमंडल ने राहुल के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी, उसी वक्त से इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि लंबे समय से चली आ रही जैन समुदाय की यह मांग पूरी होगी. हालांकि केंद्रीय कैबिनेट के इस महत्वपूर्ण निर्णय पर अंतिम मुहर तभी लग सकेगी, जब इस मसले पर अदालत में विलंबित मसलों पर निर्णय आयेगा.

अगर अदालती फैसले जैन समुदाय के पक्ष में तय होंगे, तो जैन समुदाय भारत के छठवें चिह्नंकित अल्पसंख्यक समुदाय में शुमार हो जायेगा. ध्यान रहे कि 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने जैन समाज को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक दरजा देने के लिए की गयी अपील, जिसे जैनियों के वकील बाल पाटील ने दायर किया था और जो आज उन्हीं के नाम से जानी जाती है, को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि सर्वोच्च अदालत ने टीएमए पई केस में ही यह निर्देश दिया गया था कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को तय करने का आधार राज्य ही होगा. इस निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा डाली गयी याचिका आज भी लंबित है.

जैसा कि पहले से स्पष्ट है कि यह दरजा मिलने के बाद अन्य पांच अल्पसंख्यक समुदायों की तरह जैन को भी अपनी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक संस्थाएं खोलने में आसानी होगी और उन्हें स्वतंत्र रूप से चलाने का अधिकार मिल जायेगा, उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान को बल मिलेगा और उन्हें विशेष संवैधानिक संरक्षण मिलेगा. संविधान की धारा 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थाओं को स्थापित करने और चलाने का अधिकार दिया गया है.

यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि संविधान कुछ धाराओं में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल करता है, मगर उसे परिभाषित नहीं करता. क्या यही वह अस्पष्टता रही है जिसके चलते जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दरजा देने में इतना विलंब हुआ? या जैन समुदाय की आर्थिक-सामाजिक स्थिति को देखते हुए विलंब हुआ, क्योंकि अपनी उद्यमशीलता तथा अंतरसामुदायिक संबंधों की घनिष्ठता के चलते इस समुदाय ने आजादी के बाद काफी तरक्की की है. देश के कई अग्रणी औद्योगिक/व्यापारिक घराने या मीडिया मालिकों के रूप में जैन दिखते हैं. इस समुदाय के 90 फीसदी लोग साक्षर हैं और इन पर किसी किस्म का सामाजिक उत्पीड़न होने की स्थिति कहीं पनपी नहीं दिखती.

वैसे कांग्रेसनीत यूपीए सरकार द्वारा यह दरजा इस वक्त देने के पीछे चुनावी लाभ की बात को भी आसानी से समझा जा सकता है. जैन को अल्पसंख्यक श्रेणी में शामिल करने के बाद एक बार फिर पूरे देश में इसी बहाने दी जा रही सहूलियतों एवं विशेषाधिकारों पर नये सिरे से बहस खड़ी होती दिख रही है. एक तबका यह भी कह सकता है कि आजादी के बाद भी कितने वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहेगा?

वहीं कुछ अन्य जरूरी सवालों पर भी विचार जरूरी हैं. जैसे अपने अलग संस्थान बनाने हेतु दी जा रही सहूलियतों को कई हिस्सों में बांटा जा सकता है: भौतिक सुविधाएं- सस्ती जमीन, कर्जे उपलब्ध कराना तथा संस्थाओं के संचालन में अपने नियम बनाने का अधिकार. अपने यहां कार्यरत कर्मचारियों की सेवाशर्तो को तय करने का अधिकार. शिक्षा संस्थानों से लेकर अन्य कार्यस्थलों को जेंडर हिंसा से मुक्त कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनायी गयी गाइडलाइंस या नियमों को मानने या अपने हिसाब से संशोधित करने का अधिकार.

इसे देखते हुए कि लंबे समय तक ऐसे संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों को समुदाय को मिले विशेषाधिकार के तहत कभी भी निकाला जा सकता है और अदालतें भी इसकी सुनवाई नहीं करतीं, यह वक्त सोचने का है कि ऐसे अधिकार क्या संस्थाओं को देने चाहिए या उन्हें सिर्फ भौतिक सुविधाओं तक सीमित करना चाहिए?

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