ब्याज दरों में कमी क्यों?

Monday, March 21, 2016

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ब्याज दरों में कमी

जेके कर:
केन्द्र सरकार का हालिया कदम शेयर बाजार के तेजड़ियों को काफी रास आया है. हाल ही में केन्द्र सरकार ने विभिन्न छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दर घटा दी है. जाहिर है कि मोदी सरकार के इस कदम से लोग बैंकों तथा पोस्ट ऑफिस में बचत करने के बजाये म्युचल फंड के माध्यम से शेयर बाजार में ज्यादा रिटर्न की उम्मीद में निवेश करने को बाध्य होंगे.

मोदी सरकार ने पीपीएफ की दर 8.7 फीसदी से घटाकर 8.1 फीसदी कर दी है, नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेटट की दर 8.5 फीसदी से घटाकर 8.1 फीसदी कर दी है, किसान विकास पत्र की दर 8.7 फीसदी से घटाकर 7.8 फीसदी कर दी है, पांच साल की रिकरिंग जमा की दर 8.4 फीसदी से 7.4 फीसदी की है. यहां तक कि बालिका योजना ‘सुकन्या समृद्धि खाता’ की दर भी 9.2 फीसदी से घटाकर 8.2 फीसदी कर दी गई है.

याद कीजिये आज से करीब 15 साल पहले बचत पर अच्छी खासी रिटर्न मिल जाया करती थी तथा लोग बैंक व पोस्ट ऑफिस में पैसे जमा कराते रहते थे. भारतीय मध्यम वर्ग की इस आदत ने ही अमरीकी तथा यूरोपीय बाजार में आये भारी भूचाल के समय भी देश की अर्थव्यवस्था को थामे रखा था.

एक जमाना था जब लोग रिटायर होने के बाद अपनी पीएफ तथा ग्रेच्युटी का पैसा बैंकों में जमा करा देते थे तथा उन्हें साल में उस पर 12 फीसदी ब्याज मिला करता था. उदाहरण के तौर पर यदि रिटायरमेंट के समय 10 लाख रुपये मिले होते तो उसे बैंक में फिक्स करा देने से माह में करीब 10 हजार रुपये मिल जाया करते थे. इससे लोगों का रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी आराम से कट जाया करती थी.

परन्तु उदार तथा खुलेपन वाली अर्थव्यवस्था ने इस पर लगाम लगा दी तथा जमा पर ब्याज क्रमशः कम होता गया. इससे लोगों को अपना धन शेयर बाजार के हवाले करके रोज सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव देखने के लिये मजबूर कर दिया. कहने का अर्थ है कि इसकी पूर्ववर्ती सरकारें भी धीरे-धीरे यही काम कर रही थी. अब मोदी सरकार रहीसही कसर को भी निकाले दे रही है. इसी कारण से शेयर बाजार तथा नई उदार नीति के पैरोकार इससे काफी खुश हैं.

मुंबई की कंपनी फायनेंशियल फ्रीडम गोल्डेन प्रैक्टिसेज की भुवना श्रीराम ने कहा, “छोटी बचत योजना की दर में कटौती उतनी भी बुरी नहीं है. बचतकर्ता अब अपनी कुछ बचत राशि शेयर बाजारों, म्यूचुअल फंडों तथा अन्य ऐसी योजनाओं में निवेश कर सकते हैं, जहां अधिक रिटर्न मिलता है.”

श्रीराम ने कहा, “पीपीएफ की दर पहले 15 साल में 12 फीसदी तक थी. आखिरी 15 साल में यह घटकर करीब 8.5 फीसदी पर आ गई है. (इस आखिरी 15 साल में) देश की जीडीपी और उससे भी अधिक प्रति व्यक्ति आय के साथ क्या हुआ?”

श्रीराम ने कहा, “ऐतिहासिक रूप से गत 35 साल के अच्छे और बुरे दिनों के बाद भी शेयर बाजारों ने सालाना औसत 17 फीसदी रिटर्न दिया है, जो छोटी बचत योजनाओं की करीब ढाई गुनी है.”

शेयर बाजार के पैरोकारों के उपरोक्त दावों में कितनी सच्चाई है इसे इसी से आसानी से समझा जा सकता है कि जिसने भी शेयर में पैसे लगाये उसकी रातों की नींद हराम हो गई.

जाहिर है कि मोदी सरकार के हालिया रुख से कोष की कमी से जूझ रहे शेयर बाजार को कुछ ऑक्सीजन मिल जायेगा.

उल्लेखनीय है कि नेशनल सेविंग इंस्टीट्यूट के साल 2014-15 के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सकल संग्रह 2,88,747.64 करोड़ रुपये तथा शुद्ध संग्रह 40,080.16 करोड़ रुपये का था. जाहिर है कि यह रकम इतनी बड़ी है कि शेयर बाजार के तेजड़िये इसे समेटने को आतुर होंगे तथा चाहेंगे कि यह रकम उनके शेयरों में लगा दी जाये.

कभी इसी तरह से अमरीका तथा यूरोप के धन्ना सेठों का मन भी डोला होगा.

कुल मिलाकर मोदी सरकार के हालिया कदम से जिसे लाभ होने जा रहा है वह है शेयर बाजार तथा जिसे नुकसान होने वाला है वह है भारत की आम जनता. (एजेंसी इनपुट के साथ)

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