सैकड़ों चैनलों पर एक सी बहस

Friday, May 2, 2014

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अनिल चमड़िया
1971 में समाचार पत्रों पर कुछ खास घरानों के एकाधिकार को लेकर बहस चली थी. लेकिन उस बहस से एक सिरा गायब था कि एक खास तरह के समूहों के जरिये कैसे समाचार माध्यम खास तरह के विचारों या नजरिये के पक्ष में लोगों को तैयार करते हैं. जब आपातकाल लगा तो उस समय देश में एक मात्र टेलीविजन चैनल दूरदर्शन था. दूरदर्शन के स्टुडिय़ों में कुछ खास तरह के लोगों को ही बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाता था. मीडिया स्टडीज ग्रुप ने आपातकाल में आकाशवाणी और दूरदर्शन पर बुलाए जाने वाले मेहमानों की सूची का एक अध्ययन किया.

यह अध्ययन बताता है कि दूरदर्शन के दिल्ली, अमृतसर, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, लखनऊ और श्रीनगर केंद्र से मार्च 1975 से 1977 के बीच प्रसारित विभिन्न कार्यक्रमों में 128 पत्रकार 400 बार बुलाए गए. इन कार्यक्रमों में 32 प्रतिशत लोगों ने 100 प्रतिशत लोगों की जगह ली. इसमें दिल्ली केंद्र से 33 पत्रकारों को 187 बार बुलाया गया. सभी केन्द्रों में यह संख्या सर्वाधिक है.

कश्मीर में श्रीनगर केंद्र से 13 पत्रकारों को 50 बार बुलाया गया. अमृतसर केंद्र से 25 पत्रकारों को 55 बार बुलाया गया. बॉम्बे केंद्र से 23 पत्रकारों को 53 बार बुलाया गया. बॉम्बे केंद्र से प्रसारित होने वाले धारावाहिक कार्यक्रमों के लिए ‘नवभारत टाइम्स’ के महावीर अधिकारी और ‘सारिका’ के कमलेश्वर को लगातार बुलाया जाता रहा. कलकत्ता से 14 पत्रकारों को 26 बार बुलाया गया. लखनऊ केंद्र से 11 पत्रकारों को 20 बार बुलाया गया.

भाषाई आधार पर भी देखें तो 56 पत्रकार अंग्रेजी के अखबारों से थे. 47 पत्रकार हिंदी सहित विभिन्न भाषाई अखबारों के थे. 128 पत्रकारों में मात्र 6 महिला पत्रकार शामिल थीं. इसके साथ एक मजे की बात यह भी जुड़ी हुई है कि कई ऐसे मेहमान थे जो दिल्ली, अमृतसर और श्रीनगर धूम धूमकर कथित बहस करने के लिए दूरदर्शन के खर्चे पर आमंत्रित किए जाते थे. जिन लोगों को दूरदर्शन पर आमंत्रिक किया जाता था उनमें लगभग लोग आपातकाल के समर्थक थे और उन्हें इस तरह की बहसों में भाग लेने के कई तरह के लाभ भी मिले.

अब लगता है कि आपातकाल वाली स्थिति खत्म हो गई है क्योंकि टेलीविजन की दुनिया में केवल दूरदर्शन के जरिये सरकार का एकाधिकार नहीं रहा. सैकड़ों की संख्या में निजी पूंजी वाले टेलीविजन चैनल आ गए हैं. दरअसल किसी भी बहस को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है, यह किसी बहस के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू होता है. क्या पीपीपी ( पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप) की नीति के दौर में सरकार और निजी पूंजी का एक खास तरह के विचारों के पक्ष में जनमत तैयार करने की स्थिति तैयार नहीं की सकती है. एक से ज्यादा संख्या और निजी पूंजी और सार्वजनिक पूंजी इस बात को सुनिश्चित नहीं कर सकता है कि वहां विचारों में विविधता की गुंजाइश हो.

इस समय देश में दूरदर्शन के अलावा सैकड़ों की संख्या में चैनल हैं लेकिन जब मीडिया स्टडीज ग्रुप ने चैनलों पर होने वाली कथित बहसों में हिस्सा लेने वालों के बीच दो और अध्ययन किए तो स्थिति आपातकाल वाली स्थिति से बेहतर नहीं मिलती है. एक अध्ययन सेना के लिए खरीददारी में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 26 मार्च से 2 अप्रैल 2012 के बीच 6 निजी समाचार चैनलों पर प्रसारित 24 कार्यक्रमों के आधार पर किया गया.

हिन्दी चैनलों के नौ कार्यक्रमों को शामिल किया गया है, जबकि अंग्रेजी के 15 कार्यक्रमों को शामिल किया गया है. इन बहसों में कुल 54 लोगों ने हिस्सा लिया. इसमें 5 महिलाओं की हिस्सेदारी थी. इन बहसों और विमर्शों में कुल 17 सैन्य अधिकारियों ने हिस्सा लिया. उनकी हिस्सेदारी 31 प्रतिशत रही. एक सैन्य अधिकारी ने 6 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. उनकी कुल कार्यक्रमों में पच्चीस प्रतिशत और हिस्सेदारों में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी रही. तीन सैन्य अधिकारियों ने 4 – 4 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. इस तरह केवल चार अधिकारियों ने 75 प्रतिशत कार्यक्रमों में हिस्सेदारी की. तीन सैन्य अधिकारियों ने 3-3 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. इस तरह 24 कार्यक्रमों में 7 सैन्य अधिकारी ऐसे थे, जो किसी ना किसी एक बहस में उपस्थित रहे. बहस में शामिल सैन्य अधिकारियों में एक भी महिला नहीं है.

राजनीतिक दलों के कुल 17 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. उनकी हिस्सेदारी 31 प्रतिशत रही. सभी प्रतिनिधि पांच राजनीतिक दलों से थे. इन कार्यक्रमों में कांग्रेस के 8 और भाजपा के 6 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. कुल राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों में इन दोनों दलों की हिस्सेदारी 82 फीसद रही. कुल 7 नौकरशाहों की उपस्थिति अंग्रेजी के दो चैनलों में थी. 3 नौकरशाह 2-2 कार्यक्रम में उपस्थित थे.

दूसरा सर्वे लोकसभा टीवी पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने वालों पर आधारित है. लोकसभा टीवी चैनल पर वर्ष 2011 में कुल 3,431 प्रतिभागियों को बुलाया गया. प्रत्येक प्रतिभागी को इसके लिए 2,500 रुपये का भुगतान किया गया. भुगतान निजी चैनल वाले भी करते हैं.

सर्वे में 1 जनवरी से 27 जुलाई 2011 के बीच, पहले 2000 प्रतिनिधियों को नमूने के सर्वे में शामिल किया गया. ज्यादातर लोगों की भाषा अंग्रेजी है. कार्यक्रमों में 11 प्रतिभागी ऐसे थे, जो इन महीनों के दौरान 167 बार लोकसभा टीवी पर आए. सर्वे में शामिल प्रतिभागियों में से ये लोग करीब आधे प्रतिशत (0.55 प्रतिशत) थे, लेकिन इनकी हिस्सेदारी करीब 8.35 प्रतिशत रही. 22 प्रतिभागी 10 से ज्यादा बार कुल 300 बार कार्यक्रमों में बुलाए गए.

इसमें से 19 पत्रकार हैं, जिसमें से 15 अंग्रेजी भाषा के हैं. संसद सदस्यों में कुछ खास सदस्य ही ज्यादातर कार्यक्रमों में शामिल हुए. भाषा भी एक राजनीतिक औजार है. वर्चस्व और सहमति में भाषा की बड़ी भूमिका होती है. आपातकाल में अंग्रेजी का जिस तरह से सहमति के निर्माण में वर्चस्व दिखाई देता है वह यथावत बना हुआ है. लिंग भेद की स्थिति भी यथावत है. लैंगिग गैर बराबरी वर्चस्व की संस्कृति और विचार को कायम रखती है.

टेलीविजन की तरह आकाशावाणी की भी ऐसी ही स्थिति है. वहां होने वाले कार्यक्रमों और बहसों का भी मीडिया स्टड़ीज ग्रुप ने अध्ययन किया है. यदि समाचार पत्रों के लेखकों, ऑल इंडिया रेडियों, टेलीविजन चैनलों के जरिये किसी विषय या मुद्दे पर सहमति निर्माण में लगे समूहों का विश्लेषण करें तो तमाम माध्यमों में बेहद छोटा सा समूह दिखाई देता है. यह मीडिया पर विचारों के मलिकों का एकाधिकार है. ये सर्वे बताते हैं कि चैनलों या माध्यमों के विस्तार के साथ ही विचारों की वर्चस्वता घनीभूत हुई है. संख्या को विचारों की विविधता का एक भ्रम खड़ा हुआ है. चैनल वाले अपने विचारों के पक्ष में ही बोलने के लिए विशेषज्ञों को आमंत्रित करते है और अपने विचारों की पुष्टि करवाते हैं.

*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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