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Friday, October 18, 2013

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द लंच बॉक्स

नई दिल्ली | एजेंसी: नए निर्देशकों की गैर परंपरागत और आसाधारण प्रेम कहानियां बॉक्स ऑफिस पर पुराने निर्देशकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रही हैं. इस समय एक ओर जहां ‘बेशरम’ और ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा’ जैसी परंपरागत मसाला फिल्में दर्शकों को आकर्षित करने में असफल रहीं वहीं दूसरी ओर ‘शिप ऑफ थीसियस’ और ‘द लंचबॉक्स’ जैसी असाधारण कहानी वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छी साबित हुई हैं.

नया सिनेमा ठेठ व्यवसायिक मसाला फिल्मों के साथ अपनी मौजूदगी बरकरार रखे है, यह कहना है दोनों तरह की फिल्मों में सफलता पा चुके अभिनेता आर.माधवन का.

माधवन ने बताया, “हमने दर्शकों को इस तरह की फिल्में नहीं दी, लेकिन भारतीय दर्शक बहुत बुद्धिमान हैं. उनमें किसी भी चीज को संभालने की क्षमता और समझ है. एक समय जब ‘दबंग’ जैसी फिल्में हिट होती हैं,उसी समय ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी फिल्में भी सफल होती हैं. ये बहुत अच्छे संकेत हैं.”

गैर परंपरागत फिल्मों की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि वे न सिर्फ फिल्मोत्सवों में बल्कि व्यावसायिक रूप से भी टिक सकने वाली हैं.

नवोदित निर्देशक आनंद गांधी के निर्देशन में 2.5 करोड़ रुपये की लागत से बनी उनकी पहली फिल्म ‘शिप ऑफ थीसियस’ ने बहुतों का दिल जीता, वहीं रितिश बत्रा की असाधारण प्रेम कहानी ‘द लंचबॉक्स’ भी दर्शकों को पसंद आई. 10 करोड़ रुपये के बजट से बनी इस फिल्म ने पहले दिन 1.25 करोड़ रुपये की कमाई की.

व्यापार विश्लेषक कोमल नाथ इसका श्रेय रचनात्मकता दिखाने वाले विभिन्न मंचों को देती हैं.

कोमल ने बताया, “सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स और व्यापार मॉडल्स बदल रहे हैं. हर तरह की फिल्में चल रही हैं क्योंकि छोटे-छोटे मल्टीप्लेक्स हैं.”

वह दर्शकों को भी इसका श्रेय देती हैं.

उन्होंने कहा, “दर्शक अच्छी फिल्में देखना चाहते है. विपणन के रूपों में आए बदलवों के कारण लोग फिल्में देख पा रहे हैं.”

कोमल ने कहा, “यहां एक कमरा ‘राउडी राठौर’ के लिए है तो दूसरी तरफ ‘रामलीला’ और ‘द लंच बॉक्स’ हैं.”

‘वार छोड़ ना यार’ से अपनी शुरुआत करने वाले फराज हैदर का कहना है “नया निर्देशक होने के कारण आपको निर्माता और कलाकार मिलने मुश्किल होते हैं. आधारभूत चीज है अनोखा विचार. यह विचार सबसे अलग होना चाहिए.”

कई लोग मानते हैं कि 2006 में आई ‘खोसला का घोसला’ ने ऐसी फिल्मों के लिए रास्ता बनाया है.

बाद में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ को ‘देव डी’ के रूप में लाकर अनुराग कश्यप ने भी ऐसी फिल्मों को बढ़ावा दिया.

फिल्म के प्रदर्शन के बाद बहुतों ने इस नएपन का अनुगमन किया.

उदाहरण के लिए हबीब फैजल की ‘दो दूनी चार’, अभिषेक चौबे की ‘इश्किया’, विक्रमादित्य मोटवानी की ‘उड़ान’ जैसी फिल्मों की असाधारण और नई कहानियां दर्शकों ने पसंद कीं.

‘धोबी घाट’ के साथ किरण राव ने भी इसे साबित किया है.

दिवंगत अधिवक्ता शाहिद के जीवन पर आधारित ‘शाहिद’ के निर्देशक हंसल मेहता का कहना है, “माहौल अनुकूल हो रहा है. कहीं न कहीं अनुराग की फिल्मों और सामान्य दर्शकों द्वारा इन्हें पसंद करने से निर्माताओं की निडर नस्ल को बढ़ावा दिया है.”

कुछ निर्माता इस चलन को आगे तक ले जाने के प्रयास में शामिल है. ‘रज्जो’ के निर्देशक विश्वास पाटिल, ‘गुलाब गैंग’ के नवागत निर्देशक सौमिक सेन और ‘डेढ इश्किया’ के अभिषेक चौबे ऐसे ही निर्माताओं में शामिल हैं.

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