किसानों की आत्महत्या पर सवाल

Wednesday, June 10, 2015

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आत्महत्या

देविंदर शर्मा
पिछले कुछ दशकों में किसानों की आत्महत्याओं पर 53 विशेषज्ञ समितियों ने रिपोर्टे सौंपी हैं, लेकिन मौतों की श्रृंखला बिना रुके जारी है. इतने विशेषज्ञों की सलाह के बावजूद पिछले बीस साल में करीब तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है.

इस हिसाब से देश के किसी न किसी हिस्से में हर घंटे दो किसान खुदकुशी कर लेते हैं. इस मुद्दे पर और न जाने कितनी समितियां गठित की जाएंगी, लेकिन इस बीच यह तो साफ होता जा रहा है कि इन विशेषज्ञों ने भी अपने हाथ खड़े करने शुरू कर दिए हैं. लगातार जारी और गहराते जा रहे कृषि संकट को दूर करने के लिए कुछ नए तरीके खोजने के लिए पंजाब किसान आयोग द्वारा आयोजित विचार-विमर्श भी किसी ‘अलग तरीके का’ समाधान निकालने में विफल रहा. कुछ रूटीन सलाहों के अतिरिक्त उनके पास देने को कुछ नहीं था.

इससे मुझे कुछ हफ्ते पहले की एक खबर का ध्यान आता है जिसमें कहा गया था कि महाराष्ट्र के कृषि मंत्री एकनाथ खडसे ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि राज्य सरकार को इस बारे में रास्ता नहीं सूझ रहा कि वह विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या किस तरह रोके. इस तरह की मायूसी का भाव ऐसे वक्त में है जब नीति आयोग ने कृषि पर एक टास्क फोर्स का गठन किया है और राज्य सरकारों को भी इसी तरह के टास्क फोर्स बनाने के निर्देश दिए हैं.

मैं नहीं जानता कि कृषि पर टास्क फोर्स की क्या जरूरत है जब नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अरविंद पानगड़िया ने नीति आयोग की वेबसाइट पर अपने शुरुआती उद्बोधन में कृषि संकट के समाधान को लेकर अपने विचार पहले ही व्यक्त कर दिए हैं. वह चाहते हैं कि किसानी करने वाली आबादी के बड़े हिस्से को कृषि कार्य से बाहर कर दिया जाना चाहिए. चाहे वह कितना भी गलत हो, लेकिन रोडमैप बना लिया गया है और ऐसे में मुङो ताज्जुब है कि केंद्रीय और राज्य स्तरों पर बनाए जाने वाले अनगिनत टास्क फोर्स से क्या हासिल करने की अपेक्षा की जा रही है.

यह पहला मौका नहीं है जब कृषि संकट का समाधान ढूंढ़ने के प्रयास किए जा रहे हैं. पहले भी और पूर्ववर्ती योजना आयोग ने कई साल अनगिनत विशेषज्ञ समितियों का गठन किया. इसी तरह पंजाब समेत कई राज्य सरकारों ने विशेषज्ञों से विचार-विमर्श की श्रृंखला के बाद कृषि नीति दस्तावेज तैयार किए. 2वीं योजना के दस्तावेज की तैयारी में भी दीर्घकालिक कृषि, तकनालॉजी, पानी और मार्केटिंग पर कई टास्क फोर्स और समितियों ने अपनी रिपोर्ट्स दी हैं. इस बीच कृषि संकट का और गंभीर होना जारी ही रहा. संकट के लिए जिम्मेदार लोगों से ही किसी विश्वसनीय समाधान की अपेक्षा नहीं की जा सकती.

ज्यादातर विश्वसनीय समितियों और पैनलों में वरिष्ठ नौकरशाह, कृषि वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और वरिष्ठ कृषि अधिकारी होते हैं जो किसी न किसी तरह उस व्यवस्था के हिस्से होते हैं जिसने संकट इस हद तक उत्पन्न किया है. इसलिए उनसे ‘अलग हटकर’ समाधान देने की अपेक्षा व्यर्थ की आशा करना है. अगर 53 विशेषज्ञ समितियां विफल हो चुकी हैं तो यह सोचना बेकार है कि केंद्रीय और राज्यों के स्तर पर देश भर में गठित 30 और टास्क फोर्स किसी उद्देश्य को पूरा करेंगे.

यह वही है जिसके बारे में अल्बर्ट आइन्स्टीन ने हमें चेताया था. उन्होंने कहा था, ‘हम उसी तरह सोचकर अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते जैसे हमने इसे पैदा किया था.’ वह बिल्कुल सही थे. जो बात नहीं स्वीकार की जा रही है, वह यह है कि वर्तमान कृषि संकट उसी तरह की नीतियों और दृष्टिकोणों का परिणाम है जिनके जरिये दुर्भाग्यवश हम उत्तर ढूंढ़ने की अब कोशिश कर रहे हैं. नियमित तौर पर सुझाए जाने वाले ये अव्यावहारिक समाधान वर्तमान कृषि उपज पैटर्न के दायरे में आते हैं. कुछ गेहूं से मक्के की तरफ शिफ्ट करने जैसी उपज की विविधता की सलाह देते हैं, कुछ आय बढ़ाने के लिए कृषि संरक्षण का सुझाव देते हैं, कुछ अन्य बाजार नियंत्रित हस्तक्षेप की बात करते हैं और अंतत: सभी फसल उत्पादन बढ़ाने की जरूरत की बात करते हैं.

ये सभी विकल्प अमेरिका, यूरोप और चीन में आजमाए जा चुक हैं. और कृषि कार्यों को शक्ति देने के लिए अमेरिका/यूरोप में अब भी एक अरब रोजाना से अधिक कृषि सब्सिडी दी जा रही. इस सब्सिडी की वापसी का मतलब विकसित देशों में हाइटेक कृषि का ढह जाना होगा. भारत में ज्यादा परिष्कृत और महंगी मशीनरी को लागू करना सीधे-सीधे किसानों के कर्ज जाल को और बढ़ाना है.

पंजाब में जिस तरह टेक्नोलॉजी आधारित समाधान पर जोर दिया गया, उस तरह के समाधान से कृषि संकट और गंभीर ही हो गया. पंजाब जो प्रमुख कृषि राज्य है, वहां किसी न किसी इलाके में रोजाना दो किसान आत्महत्या कर रहे हैं. करीब तीन दशकों से भारत का ग्रामीण समाज ढह रहा है. रासायनिक उर्वरकों के बहुत ज्यादा उपयोग ने हरी-भरी जमीन को विषैला बना दिया है, जल दोहन ने भूगर्भ जल को इस हद तक सुखा दिया है कि बंजर का विस्तार हो रहा है और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. साल दर साल लागत मूल्य बढ़ते जाने और उत्पादन मूल्य स्थिर रहने से किसान उन्हीं आर्थिक नीतियों के शिकार बन गए हैं जिसने उन्हें देश के नायक के तौर पर बताया था. कृषि न सिर्फ न किए जाने लायक, बल्कि आर्थिक रूप से अलाभकारी हो गई है.

क्या इस तरह की टेक्नोलॉजी के उपयोग से किसानों की आय बढ़ी है? मैंने प्रगतिशील माने जाने वाले पंजाब के उन किसानों की लागत और मूल्य का आकलन किया है जो नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं और जिन्हें 99 प्रतिशत सुनिश्चित सिंचाई प्राप्त है. कृषि लागत और मूल्य आयोग की नवीनतम रिपोर्ट प्रति हेक्टेयर गेहूं और चावल का औसत शुद्ध प्रतिफल 36,052 रुपये और 3029 रुपये मासिक बताती है. नई टेक्नोलॉजी या मशीनी उपकरण बेचे बिना उनकी कृषि आय को बढ़ाने के लिए नीति की योजना में भिन्न प्रकार के दृष्टिकोण की जरूरत है.

इसके लिए दो तात्कालिक कदमों की अपेक्षा है. पहला, कृषि पर आम तौर पर निगाह रखने वाले विशेषज्ञों को अलग करना. हमें विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की जरूरत है जो इस पर सोचें और भिन्न तरीके से योजना बनाएं. संकट के नियंत्रण में लगे लोगों का समान समूह कोई अर्थकारी सुझाव देगा, ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती. टास्क फोर्स की संरचना देखने पर मेरी चिंता यह है कि नीति आयोग के सुझाव वर्तमान संकट को और गहरा ही करेंगे. आइंस्टीन गलत नहीं थे.

दूसरे, जटिल और परेशान करने वाले भारतीय कृषि संकट का समाधान अमेरिका या चीन में नहीं है. यह सही समय है जब हम विकसित देशों के उदाहरण देना बंद कर दें जिनकी बात सिर्फ नई और महंगी कृषि मशीनरी और औजार के आयात पर आकर समाप्त हो जाती है. समाधान हमें अपनी जमीन पर खोजने होंगे. अगर हम ध्यान से अपने यहां देखेंगे और कृषि-पर्यावरणीय क्षेत्र की खास जरूरतों को पूरा करने वाले स्थानीय समाधानों की खोज करेंगे तो हमें दीर्घकालिक कृषि सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले चिरस्थायी उत्तर प्राप्त हो सकते हैं. टेक्नोलॉजी वाला समाधान महत्वपूर्ण हिस्सा अदा करता है, लेकिन असली बात यह होनी चाहिए कि किसानों को किस तरह निश्चित मासिक आय उपलब्ध हो.

* लेखक देश के जाने-माने कृषि और खाद्य मामलों के विशेषज्ञ हैं.

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