डर्टी रौताईन पर बवाल

Tuesday, March 5, 2013

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रौताईन

रायपुर: छत्तीसगढ़ के तकरीबन दर्जन भर सिनेमाघरों में प्रदर्शन के लिए तैयार छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘रौताईन’ लगातार विवादों से घिरती नजर आ रही है. निर्माता कंपनी ने प्रमोशन के लिए प्रोमो का जो हिस्सा स्थानीय चैनलों पर चल रखा है, विवाद की शुरुआत वहीं से हुई है और चर्चा है कि अब लगातार बढ़ते दबाव के बाद फिल्म के निर्माता इसका नाम बदलने वाले हैं.

लोगों का कहना है कि इस फिल्म में रौताईन नामक पात्र को डर्टी पिक्चर स्टाईल में फिल्माया गया है. यह चर्चा आम हो गई कि छत्तीसगढ़ी में ऐसी फिल्में बननीं अब शुरू हो गईं, जिनके शीर्षक भले साफ-सुथरे हों, लेकिन पूरी फिल्म इतनी साफ-सुथरी नहीं होती कि परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके.

बॉलीवुड में सेक्स का तडक़ा मारते हुए हालिया आई कई फिल्मों की तरह ‘रौताईन’ में भी मसाले डाले गये हैं, ऐसा उसकी झलकियां देखकर लग रहा है. फिल्म के निर्देशक अमित प्रधान ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि फिल्म में कुछ ट्यून डर्टी पिक्चर से प्रेरित हैं और फिल्माने का ढंग भी कुछ इसी तरह का है, लेकिन इस बात से वे इंकार करते हैं कि फिल्म में अश्लीलता परोसी गई है. वे कहते हैं- “पूरी फिल्म को देखने से पता चलेगा कि हम अश्लीलता का समर्थन नहीं कर रहे हैं.”

‘रौताईन’ के विवादित होने का दूसरा किस्सा भी सुन लें. छत्तीसगढ़ के यादव समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने इसके शीर्षक पर आपत्ति दर्ज कराई है कि रौताईन शब्द छत्तीसगढ़ में यादव जाति की महिलाओं के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि फिल्म में एक नौकरानी को रौताईन बताकर, उसे अश्लील कपड़े पहनाकर नृत्य कराते हुए यादव समाज की महिलाओं के प्रति नजरिया दुषित करने का प्रयत्न किया गया है.

यादव समाज के युवाओं ने तो यहां तक कह डाला कि फिल्म को छत्तीसगढ़ में बिल्कुल नहीं चलने देंगे. बैनर-पोस्टर और सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ क्यों न करना पड़े. यादव समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने सोमवार को छत्तीसगढ़ फिल्म इंडस्ट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल से भी मुलाकात की और अपनी बात रखी.

प्रतिनिधियों ने श्री अग्रवाल से कहा कि इस फिल्म को ऐसे लोगों ने बनाया है, जो छत्तीसगढ़ के हैं ही नहीं. वे बाहरी हैं. वे बाहरी हैं, इसलिए हमारा विरोध नहीं है, बल्कि हम यह कहना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा, जीवनशैली आदि के संबंध में गहराई से जानकारी हासिल किए बिना यदि कोई फिल्मकार फिल्म बनाएगा, तो ऐसा ही होगा.

प्रतिनिधियों का कहना था कि सिर्फ ‘रौताईन’ का लेकर हमारी आपत्ति नहीं है, बल्कि अब यह मांग भी है कि जिन्हें छžत्तीसगढ़ के बारे में सही तथ्यों का पता नहीं है, वे यहां के निवासियों को मजाक बनाने के लिए फिल्में न बनाएं. सूत्रों के अनुसार, यादव समाज के प्रतिनिधियों और छžत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री एसोसिएशन की भेंट इस निष्कर्ष के साथ समाप्त हुई कि ‘रौताईन’ को बदला जाएगा. हालांकि नया शीर्षक क्या होगा, इस संबंध में अधिकृत तौर पर पता नहीं चल सका है.

किसी फिल्म का अचानक विरोध-अवरोध, पोस्टर-बैनर फाडऩे जैसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं. बाद में पता चलता है, फिल्म चल भी रही है और विरोध करने वाले खुद ही उस फिल्म को देख भी रहे हैं. ‘रौताईन’ का निर्माण कई माह से चल रहा है, ऐन आठ मार्च को प्रदर्शन की तारीख निर्धारित होने के बाद ही विरोध-अवरोध, बैठक, प्रेसवार्ता यह सब प्रचार का हथकंडा तो नही है?

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