बजट: दावे और हकीकत!

Tuesday, March 8, 2016

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बजट-छत्तीसगढ़

सीपी चंद्रशेखर
विभिन्न राज्यों के आने वाले चुनाव को ध्यान में रखते हुए, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एलान किया है कि उन्होंने एक ऐसा बजट पेश किया है जिसमें, ‘‘कमजोर तबकों, ग्रामीण इलाकों और सामाजिक तथा बुनियादी भौतिक ढांचे के लिए, अतिरिक्त संसाधनों का’’ प्रावधान किया गया है. लेकिन, चालू वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष के बीच, रुपयों में भी सकल खर्च में तो सिर्फ 10.8 फीसद की बढ़ोतरी का ही प्रस्ताव किया जा रहा है. इसे देखते हुए, उनके दावे पर विश्वास करना मुश्किल है. अचरज की बात नहीं है कि जब हम गरीबों तथा कमजोर तबकों से जुड़े विभागों तथा कार्यक्रमों के लिए आवंटनों पर अलग-अलग कर के गौर करते हैं, तो वे मंत्री महोदय के दावे की पुष्टि नहीं करते हैं.

मिसाल के तौर पर मनरेगा को लिया जा सकता है, जोकि ऐसा कार्यक्रम है जिसे एनडीए सरकार तक गरीबों के लिए अपने सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक बताती है. यह बात आम जानकारी में है पिछले साल के दौरान यह कार्यक्रम, इसके लिए संसाधनों के आवंटन तथा इससे पैदा होने वाले कार्यदिवसों की संख्या, दोनों ही पहलुओं से पिछड़ रहा था. पिछले दो वर्षों के दौरान, इसके तहत मुहैया कराए गए कार्यदिवसों का औसत 40 प्रति परिवार ही रहा है, जबकि यह कार्यक्रम साल में पूरे 100 दिन का रोजगार दिलाने का वादा करता है. इतना ही नहीं, मजदूरों की खासी बड़ी संख्या को मजदूरी का भुगतान ही नहीं किया गया है और यह बकाया राशि भी काफी बड़ी है. 2016-17 के बजट में इस कार्यक्रम के लिए 38,500 करोड़ रु0 का प्रावधान किया गया है और 2015-16 के संशोधित अनुमानों के मुकाबले कोई खास बढ़ोतरी नहीं दिखाता है. यह तब है जबकि 2015-16 को इस कार्यक्रम के लिहाज से खराब वर्षों में गिना जाता है. पिछले साल की बकाया मजदूरी के भुगतान को भी हिसाब में लिया जाए तो, इस कार्यक्रम के लिए, जिसका गरीबों तथा कमजोर तबकों पर असर पडऩा स्वयंसिद्घ है, आने वाले वर्ष का आवंटन वास्तव में गिरावट ही दिखा रहा होगा.

अनेक मामलों में बजट भाषण में उद्यृत आंकड़े विनम्रता से भी कहें तो भ्रामक ही कहे जाएंगे. मिसाल के तौर पर इसी दावे को ले लीजिए कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी. वित्त मंत्री ने कहा है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ही कृषि तथा कृषक विकास के लिए कुल 35,984 करोड़ रु0 का आवंटन किया गया है. ऊपर-ऊपर से देखने पर किसी को भी ऐसा लगेगा कि कृषि, सहकारिता तथा कृषक कल्याण की मद में भारी बढ़ोतरी की गयी है. आखिरकार, 2015-16 के संशोधित अनुमानों में तो यही आवंटन 15,809 करोड़ 54 लाख रु0 ही था. लेकिन, यह सारी करामात वर्गीकरण में बदलाव किए जाने की ही है. 2016-17 के बजट अनुमान में, ‘‘किसानों को दिए जाने वाले अल्पावधि ऋणों पर ब्याज सब्सीडी’’ के लिए प्रस्तावित 15,000 करोड़ रु0 भी जोड़ दिए गए हैं. इससे पहले तक यह खर्चा वित्त मंत्रालय की अनुदान मांगों में शामिल किया जाता था और इस मद में अगले साल खर्च की जाने वाली रकम के करीब रकम ही, 2015-16 में भी खर्च की गयी थी. इस तरह, 2016-17 का आंकड़ा वर्गीकरण में इस तब्दीली ने काफी बढ़ा दिया है. इसे अलग कर दिया जाए तो किसानों के लिए आवंटन में रुपयों में भी सिर्फ 33 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इस तरह 128 करोड़ रु0 की बढ़ोतरी दिखा दी गयी है.

जनता के कल्याण से जुड़े कुछ अन्य क्षेत्रों, मिसाल के तौर पर स्वास्थ्य व परिवार कल्याण, स्कूली शिक्षा व साक्षरता के मामले में भी, स्थिति कोई अच्छी नहीं है. इन मदों में 2016-17 के बजट में रुपयों में प्रस्तावित बढ़ोतरी या तो 2016-17 में स्वाभाविक रूप से होने वाली बढ़ोतरी को ही दिखाती है या फिर 2015-16 के संशोधित अनुमान और 2014-15 के वास्तविक खर्च के बीच के अंतर के मुकाबले, कोई खास बढ़ोतरी नहीं दिखाती है. इसी प्रकार, गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजनाएं अपने आप में बेशक अच्छी हैं, लेकिन उनसे इन क्षेत्र में सरकार के खर्चे की भारी तंगी की भरपाई किसी भी तरह से नहीं हो सकती है. जिन क्षेत्रों में आवंटन में बढ़ोतरी होती ही है, उनमें मामूली बढ़ोतरियों का किसी भी तरह से बजट का जोर जनकल्याण पर होने का सबूत नहीं माना जा सकता है. महिला तथा बाल विकास के मामले में, जिसके लिए 2015-16 का आवंटन, 2014-15 के मुकाबले 1188 करोड़ रु0 घट गया था, 2016-17 के बजट में सिर्फ 56 करोड़ 23 लाख रु0 की बढ़ोतरी का प्रस्ताव है.

कुल मिलाकर यह कि बजट में किसान व गरीब हितैषी बतकही तो खूब है, लेकिन संसाधन जुटाने के प्रयासों की अपर्याप्तता और राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पूरे करने की ग्रंथि ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि सरकार, अपनी विकास रणनीति को अत्यावश्यक मानवीय चेहरा दे ही नहीं सकती है. सच तो यह है कि राजस्व अर्जन के जो अति-आशावादी अनुमान लगाए गए हैं, वे अगर पूरे नहीं हुए तो, वित्त वर्ष के बाद के हिस्से में प्रस्तावित खर्चों में से कटौतियों की नौबत आ सकती है और जनता की स्थिति सुधरने के बजाए और बदतर भी हो सकती है.

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