विकास का बोझ जनता पर क्यों ?

Friday, June 17, 2016

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टैक्स का बोझ

जेके कर:
प्रधानमंत्री ने आय बढ़ाने के लिये 10 करोड़ लोगों को आयकर में दायरे में लाने को कहा है. वर्तमान में 5.3 करोड़ लोग आयकर के दायरे में आते है. मोदी सरकार चाहती है कि उस दायरे को करीब दुगना करके सरकार के आय को बढ़ाया जाये. जाहिर है कि सरकार को काम करने के लिये पैसों की जरूरत पड़ती है जिसे प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों के रूप में वसूला जाता है. सरकार जितना ज्यादा विकास के काम करेगी उसे उतने ही ज्यादा फंड की आवश्यकता पड़ेगी.

जनता तो ईमानदारी से टैक्स भरने के लिये मजबूर है. उससे अप्रत्यक्ष करों के रूप में भी बहुत कुछ वसूला जाता है. साल 2015-16 में प्रत्यक्ष करों के रूप में 7 लाख 42 हजार 295 करोड़ रुपये वसूले गये इसमें नैगम टैक्स भी शामिल हैं. इसी तरह से अप्रत्यक्ष करों के रूप में 7 लाख 11 हजार 885 करोड़ रुपये सरकार को प्राप्त हुये.

उल्लेखनीय है कि प्रत्यक्ष करों में आयकर, नैगम कर तथा संपत्ति कर शामिल हैं. उसी तरह से अप्रत्यक्ष करों में सर्विस टैक्स, वैट तथा एक्साइज ड्यूटी मुख्य रूप से शामिल है. दरअसल, हर खरीद-फरोख्त तथा सेवा पर किसी न किसी रूप में केन्द्र या राज्य सरकार अप्रत्यक्ष टैक्स लेती रहती हैं.

सरकार ने 2015-16 में नैगम या कॉर्पोरेट टैक्स के रूप में 4 लाख 54 हजार 419 करोड़ रुपये वसूले. वहीं आयकर के रूप में 2 लाख 86 हजार 801 करोड़ रुपये जनता ने जमा किये.

अब हम बहस के मुख्य बिन्दु पर आ जाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) और केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBEC) के दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन -राजस्व ज्ञान संगम- में कर अधिकारियों को संबोधित करने के बाद संवाददाताओं से आयकर दाताओं की संख्या बढ़ाने की बात की है.

दूसरी तरफ आप पायेंगे कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने साल 2015-16 के अपने पहले पूर्ण आम बजट में कार्पोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटाकर 25 कर दिया था. ऐसा नहीं है कि केवल मोदी सरकार ही बड़े घरानों को टैक्स में छूटें दे रही है. इससे पहले की यूपीए सरकार ने भी ऐसी ही दयानतदारी दिखाई थी. यूपीए सरकार ने भी 2013-14 में कॉर्पोरेट और अमीरों को 5.32 लाख करोड़ रूपयों की छूट दिये थे. साल 2005-06 से 2014 तक जो रकम माफ़ की गई है वो 36.5 लाख करोड़ से ज़्यादा है. यानी सरकार ने 365 खरब रुपए माफ़ किये थे.

कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस समाचार समूह के द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ ने उनके आरटीआई के जवाब में बताया था कि वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2015 के बीच 29 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 1.14 लाख करोड़ रुपयों के उधार बट्टे खाते में डाल दिये गये हैं. रिजर्व बैंक ने इनके नाम नहीं बताये हैं पर इसे आसानी से समझा जा सकता है कि निश्चित तौर पर यह आम जनता को दिये जाने वाले गाड़ी, मकान, शिक्षा या व्यक्तिगत लोन नहीं है. ऐसे मौकों पर तो बैंक वाले आम जनता पर लोटा-कंबल लेकर चढ़ाई कर देती है. जाहिर है कि कार्पोरेट घरानों की इसमें बड़ी हिस्सेदारी तय है.

बड़े घरानों को दी जा रही इन तोहफों के बीच प्रश्न किया जाना चाहिये कि आखिर टाटा, अंबानी तथा अडानी क्या रोटी में हीरे जड़ कर खाना चाहते हैं जो उन्हें छूटें दी जा रही है. सरकार के द्वारा छूटें प्राप्त करने के हकदार तो भारत की वह विशाल जनसंख्या है जिसे दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं. जो अपने परिवार के स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर हो रहे खर्च को पूरा करने में नाकाम है. उधर, बड़े नैगम घराने टैक्स की छोड़िये बैंकों में जमा जनता के धन का गबन करके विदेश भाग जाते हैं. वह भी 9000 करोड़ रुपये डकारने के बाद लंदन में जाकर आलीशान विला खरीद लेते हैं.

बड़े हैरत की बात है कि ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा करने वाली मोदी सरकार, मनमोहक सरकार के समान ही बड़े घरानों को नैगम करों में छूटें दे रही हैं, उनके दिये गये उधार को बट्टे-खाते में डाल रही है तथा विकास के खर्चे का बोझ आम आयकर दाताओं की संख्या बढ़ाकर उन पर लादने की कोशिश कर रही है. फिर दोनों सरकारों की नीतियों में फर्क क्या रहा ? केवल कुर्सी पर एक की जगह दूसरा विराजमान हो गया है जिसका बोझा अब भी आम जनता के कंधों पर है वहीं बड़े घराने सरकार की नीतियों के बल पर देश की प्राकृतिक संपदा दिनों दिन अपने कब्जे में लेते जा रहें हैं.

देश के विकास का बोझ बड़े तथा नैगम घरानों पर डालना चाहिये न कि अभाव तथा महंगाई से त्रस्त जनता पर. सड़के बनाने का खर्च, अस्पताल बनाने का खर्च, एयरपोर्ट बनवाने का खर्च, देश को दुनिया का सरताज बनाने का खर्च बड़े घराने भी तो उठाये.

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