बच्चों को रख दिया गिरवी

Monday, May 19, 2014

A A

बच्चों की मानव तस्करी

लखनऊ | एजेंसी: सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन बुंदेलखंड की सूरत नहीं बदलती. बदहाली के कारण उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र हमेशा सुर्खियों में रहता आया है. बुंदेलखंड की जो ताजा तस्वीर सामने आई है, वह झकझोर देने वाली है. प्रदेश के पिछड़े जनपदों में शुमार ललितपुर के मड़ावरा ब्लॉक के सकरा गांव में सहरिया जाति के कई किसानों ने दो वक्त की रोटी के लिए अपने डेढ़ दर्जन बच्चों को राजस्थान के ऊंट व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया है.

बच्चों को गिरवी रखने का मामला मीडिया में आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जबाव तलब किया है और जिलाधिकारी को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जबाव मांगा है. आयोग जल्द ही एक टीम मौके पर भेजेगी.

ललितपुर जनपद का मड़ावरा क्षेत्र वर्ष 2003 में सुर्खियों में आया था. खबरों में बताया गया था कि यहां के गरीब लोग घास की रोटियां खाकर जीते हैं. आज 11 साल बाद हालात इतने बदतर हो गए हैं कि यहां के गरीब अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं दे पा रहे हैं. इसलिए उन्होंने अपने 10 से 15 साल के बच्चों को राजस्थान के ऊंट और भेड़ व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया है.

लगभग 80 परिवारों की आबादी वाली ग्राम पंचायत धोरीसागर के सकरा गांव निवासी धनसू सहरिया का कहना है कि उसके सामने रोजी-रोटी का जबरदस्त संकट है. गांव में सरकारी राशन भी कई महीनों से नहीं बांटा जा रहा है. ऐसे में परिवार को भुखमरी से बचाने के लिए उसके सामने एक ही विकल्प था कि बच्चों को गिरवी रख दे.

धनसू ने बताया कि उसने ऊंट-भेड़ चराने के लिए अपने बच्चों को राजस्थान के व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया. व्यापारियों ने उसे पांच हजार रुपये दिए.

गिरवी रखे गए बच्चों ने शोषण की जो कहानी बयां की, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है. इन बच्चों का कहना है कि चिलचिलाती धूप में उन्हें ऊंट और भेड़ों के झुंड को एक से दूसरे इलाके में हांककर ले जाने को कहा जाता है और लापरवाही करने पर यातनाएं दी जाती हैं.

हाल ही में व्यापारियों को चकमा देकर किसी तरह सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गांव लौटे ऐसे ही एक बच्चे ब्रजराम ने बताया कि भेड़ों के साथ जंगलों में उन्हें बिना चप्पल चलाया जाता और किसी भेड़ के इधर-उधर चले जाने पर ठेकेदार बेरहमी से उनकी पिटाई करता था. बच्चों की मानें तो 20 बच्चे इनके गांव से गए थे, जिनमें से करीब 10 बच्चे अभी भी राजस्थान के व्यापारियों की गिरफ्त में हैं.

आयोग की सक्रियता के बाद अब जिला प्रशासन नींद से जागा है. आनन-फानन में गांव में सहरिया जाति के लोगों को राशन कार्ड दिलाकर राशन वितरित किया गया है और इस जाति के किसानों को राहत राशि के चेक भी वितरित किए गए हैं.

खास बात यह कि मुख्य विकास अधिकारी जगदीश प्रसाद स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि क्षेत्र में बदहाली है. दो महीने पहले ओले पड़ने और बेमौसम बारिश के कारण फसल बर्बाद होने को वह अहम वजह बता रहे हैं. उनका कहना है कि श्रम प्रवर्तन विभाग को व्यापारियों के चंगुल में फंसे बच्चों को वापस लाने के निर्देश दिए गए हैं.

सवाल यह है कि जो सरकार मुजफ्फरनगर में दंगा पीड़ितों के शिविरों में बच्चों के ठंड से मरने की खबर को गंभीरता से न लेकर उसे विरोधियों का दुष्प्रचार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती हो और प्रशासनिक अधिकारी कहते हों कि ‘भूख से कोई नहीं मरता’, उन्हें बुंदेलखंड की बदहाली से क्या लेना-देना.

Tags: , , , , , ,