आत्मदाह या व्यवस्था पर चोट

Tuesday, August 2, 2016

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आत्महत्या की कोशिश

दिवाकर मुक्तिबोध
एक नवंबर, 2001 को मध्यप्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ की अब तक की सबसे त्रासद घटना है विकलांग योगेश साहू की मौत. 12वीं तक शिक्षित राजधानी रायपुर के इस युवा ने दो साल के निरंतर संघर्ष के बाद जब एक अदद सरकारी नौकरी की आस छोड़ दी, तब उसने स्वयं को खत्म करने का निर्णय लिया. 21 जुलाई को प्रात: आठ बजे वह अपने बीरगांव स्थित घर से मुख्यमंत्री जनदर्शन में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलने आखिरी उम्मीद के साथ निकला और नाउम्मीद होने के बाद मुख्यमंत्री आवास के सामने पेट्रोल छिड़ककर खुद को आग के हवाले कर दिया.

लगभग 85 प्रतिशत झुलसी उसकी काया ने छह दिन के संघर्ष के बाद अंतत: जिंदगी का साथ छोड़ दिया. उसकी मौत दरअसल रोजगार के लिए संघर्षरत शिक्षित युवाओं में व्याप्त असंतोष, निराशा, कुंठा और बेपनाह दर्द की मार्मिक अभिव्यक्ति है. यह सड़ी-गली व्यवस्था पर एक और निर्मम चोट है.

छत्तीसगढ़ के इतिहास में आत्मदाह की यह पहली घटना है जिसने संपूर्ण तंत्र को हिला दिया है. इसके पूर्व बेरोजगारी से तंग होकर जान देने या जान देने के प्रयास की घटनाएं हो चुकी हैं किन्तु उन्हें कभी सुर्खियां नहीं मिलीं, कभी समग्र समाज को आंदोलित नहीं किया और न ही सरकार ने कभी उन्हें गंभीरता से लिया. दूरदराज में घटित ऐसी घटनाओं से कुछ समय के लिए सीमित दायरे में निस्तब्धता जरूर फैली और फिर बात आई-गई हो गई. लेकिन योगेश साहू की मौत ऐसी पहली वारदात है जो सत्ता और समाज के अंतर्संबंधों में व्याप्त विसंगतियों के साथ-साथ स्थितियों की भयावहता की ओर इशारा करती है.

यह पहली ऐसी घटना है जिसमें सरकार ने तत्परता से कार्य करते हुए योगेश के इलाज की व्यवस्था की, उसे आर्थिक अनुदान दिया और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया. लेकिन सरकार की इस संवेदनशीलता के बावजूद यह सवाल मुंह-बाएं खड़ा है कि क्या बेरोजगारी दूर करने के सरकारी उपक्रम पर्याप्त हैं? क्या वे ठीक से कार्य कर रहे हैं या क्या पिछले 12 वर्षों से सत्तारूढ़ भाजपा सरकार बेरोजगार युवकों को रोजगार दिलाने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में सफल है? जाहिर है, ऐसा कुछ नहीं है वरना योगेश साहू अटूट निराशा के गर्त में क्यों डूबता, क्यों जान देता?

यह बिलकुल ठीक है कि सरकारी नौकरियों की एक सीमा है. प्रत्येक शिक्षित बेरोजगार को सरकारी काम में नहीं लगाया जा सकता, लेकिन रोजगार के लिए अनुकूल माहौल बनाना सरकार के हाथ में है. यह उसका दायित्व भी है. 16 बरस के छत्तीसगढ़ में ऐसा वातावरण अब तक नहीं बना है जबकि औद्योगिक निवेश के नाम पर सरकार अब तक अरबों रुपए के एमओयू संपन्न करने का दावा करती रही है. जाहिर है, सरकारी आंकड़े कुछ कहते हैं, जमीनी हकीकत कुछ और है.

स्टील और पॉवर प्रोजेक्ट को छोड़ दें, तो शेष उद्योगों की हालत खस्ता है. मझोले और लघु उद्योगों में धीरे-धीरे तालेबंदी हो रही है और कुटीर उद्योग तो लगभग बंद हो गए हैं जिससे बेरोजगारी को और बढ़ावा मिल रहा है. राज्य सरकार समय-समय पर राज्य में निवेश के लिए देश-विदेश में उद्योगपतियों के साथ बातचीत एवं सम्मेलन करती रही है, उन्हें राज्य में आमंत्रित करती रही है पर नतीजा लगभग सिफर है. इसी वर्ष 14 फरवरी को केंद्र सरकार के आव्हान पर मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इन्वेस्टर मीट में भाग लिया.

मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह अपने उच्चाधिकारियों के साथ मौजूद रहे. उन्होंने देश के बड़े औद्योगिक घराने मसलन रिलायंस, आदित्य बिड़ला ग्रुप, लैंको सोलर, हीराचंदानी, आईटीसी आदि के अध्यक्षों, संचालकों एवं सीईओ से मुलाकात की, बातचीत की. और तो और जापान, चेक गणराज्य जैसे कुछ देशों के उच्चायुक्तों एवं दूतावास के वाणिज्य अफसरों से भी बातचीत हुई. उन्हें छत्तीसगढ़ में निवेश के लिए आमंत्रित किया गया. 6 महीने बीत गए हैं पर कोई हलचल नहीं. स्पष्ट है, सरकार उद्योगपतियों को लुभाने में असफल है क्योंकि उद्योग स्थापना के मार्ग में आने वाली सरकारी एवं गैर सरकारी अड़चनों को वह दूर नहीं कर पा रही है. नौकरशाही की बदमिजाजी भी अरुचि का एक बड़ा कारण है. टाटा के बाद बस्तर से एस्सार ग्रुप की विदाई राज्य में उद्योगों की हालत बयान करती हैं. जाहिर है बेरोजगारी घटाने की दिशा में सरकारी प्रयत्न फलीभूत नहीं हो रहे हैं.

यद्यपि रोजगार जैसे संवदेनशील मुद्दे पर सरकार कुछ बेहतर करने की कोशिश अवश्य कर रही है. उनमें से एक है कौशल विकास कार्यक्रम. इस योजना के तहत राज्य के सभी 27 जिलों के लाइवलीवुड कॉलेजों की स्थापना की गई है जहां विभिन्न ट्रेड में युवा और प्रौढ़ता को स्पर्श करने वाले लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता है पर कुशलता हासिल करने के बावजूद रोजगार है कहां? निजी उद्योग-धंधे इतने नही हैं कि सभी प्रशिक्षितों को काम मिल सके. फिर रोजगार उन्हें ही मिलता है जो अत्यंत कुशल हैं.

कहना होगा, लाइवलीवुड कॉलेजों से भी कुशल बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही है. राज्य के रोजगार कार्यालयों जीवित पंजीयन को देंखे तो वर्ष 2015 में 2 लाख 78 हजार 258 पंजीकृत बेरोजगारों में से सिर्फ 1,508 को ही रोजगार मिल पाया. यह चौंकाने वाला आंकड़ा है. नौकरियां नहीं है. इसीलिए राज्य से श्रम का पलायन हो रहा है. हालांकि खेतीहर मजदूरों एवं कामगारों का काम के लिए पलायन राज्य की शाश्वत समस्या रही है जिसका आकार फिल्हाल कुछ घटा है किंतु अस्तित्व कायम है. ऐसी स्थिति में स्वरोजगार को बढ़ावा ही कारगर उपाय हो सकता है बशर्ते उसके लिए अधिकृत एजेंसियां अपने काम को बेहतर तरीके से संपादित करें.

कहना न होगा, इसमें बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. और यह बात सभी जानते हैं कि बैंकों की अफसरशाही कैसी होती है और ऋण के लिए औपचारिकताएं पूरी करने में कितना पसीना बहाना पड़ता है? केंद्र सरकार नि:शक्तजनों के प्रति अधिक संवेदनशील है तथा उन्हें हर संभव मदद देने के लिए तत्पर है तब छत्तीसगढ़ में एक विकलांग शिक्षित बेरोजगार की आत्मदाह की घटना वह भी मुख्यमंत्री के सिंह द्वार पर, सरकारी योजनाओं के प्रति निराशा की मार्मिक अभिव्यक्ति है. सरकार को राज्य की रोजगार नीति पर नए सिरे से मनन करने की जरुरत हैं.

बहरहाल जीवन से पलायन किसी समस्या का हल नहीं है, इसलिए योगेश की मौत को सामाजिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. उसके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी देना भी एक गलत परंपरा की शुरुआत है. अलबत्ता सरकार अन्यान्य तरीकों से परिजनों की मदद कर सकती है ताकि उनका आर्थिक ढांचा सुधरे.

दरअसल, जरूरत इस बात की है कि सरकार बेरोजगारी को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिए निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि एवं वनोपज आधारित उद्योगों की स्थापना को सर्वोच्च प्राथमिकता दे. यह कितनी विचित्र बात है कि लाखों बेरोजगारों की फौज के बावजूद सरकार नौकरियों में आउटसोर्सिंग का सहारा ले रही है. तर्क दिया जाता है कि कुशलता व योग्यता के मापदंड पर छत्तीसगढ़ के युवा खरे नहीं उतरते. यदि यह सच है तो दोष किसका है? इसका अर्थ है राज्य की समूची शिक्षा प्रणाली भी ध्वस्त है जो शिक्षा के नाम केवल डिग्रियां या सर्टिफिकेट बांट रही है. यानी चिंता कुछ ज्यादा ही गहरी है. योगेश की मौत को शायद इसी नजरिए से देखने की जरूरत है.

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