बिना छुरी के

Sunday, May 5, 2013

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छत्तीसगढ़ झोला छाप डॉक्टर

जे के कर

छत्तीसगढ़ के गॉव-कस्बो में बिना छुरी के बोर्ड वाले झोला छाप डाक्टर बहुतायत से मिलते हैं. ज्यादातर ग्रामीण जनता इन्ही से इलाज करवाना पसंद करती है.

परंपरागत रूप से ये डाक्टर बने हैं. बिना किसी मान्यता प्राप्त डिग्री के ही. ये बवासीर तथा हाइड्रोसील का इलाज करते हैं बिना शल्य क्रिया के. इसलिये इन्हे बिना छुरी वाला डाक्टर कहा जाता है. वास्तव में शल्य क्रिया की छोड़े इन्हे दवाओं से इलाज करना भी नही आता है. लेकिन छत्तीसगढ़ की भोली-भाली जनता है कि इन्ही के पास बारं-बार जाती है. कारण यह है कि जनता को समझ में ही नही आता कि नुकसान ज्यादा करते हैं.

पूर्णत: अवैज्ञानिक तरीको से इलाज कर ये अपना कारोबार चलाते हैं. बवासीर को सुन्न कर देने वाले धागे से बांध-बांधकर उसे अंतत: शरीर से अलग कर दिया जाता है. फोते के पानी को भी इंजेक्शन द्वारा निकाला जाता है. वक्त्ती तौर पर मरीजो को राहत तो अवश्य मिलती है लेकिन बीमारी पीछा नही छोड़ती है. कई बार इनसे गंभीर इंफेक्शन हो जाता है तब जान पर बन आती है.

ऐसा नही है कि इन्ही दो बीमारियों तक सीमित रहा जाता है. सर्दी-खांसी से लेकर मलेरिया तक का इलाज किया जाता है. हर एक मरीज को बॉटल चढ़ाया जाता है. नयी पीढ़ी के एंटीबायोटिक्स का ये तथाकथित डाक्टर धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. अज्ञानता की वजह से एंटीबायोटिक्स की न तो सही मात्रा दी जाती है न ही नियत समय के लिये दिये जाते हैं. अंजाम बेचारे ग्रामीण उस एंटीबायोटिक्स की प्रतिरोध क्षमता अपने शरीर में उत्तपन्न कर बैठते हैं. इससे अगले बार ग्रामीणों को दूसरा एंटीबायोटिक्स देना पड़ता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सिप्रोफ्लाक्सासिन नामक एंटीबायोटिक्स की 250 मिलीग्राम की दो गोली दिन में देनी चाहिये 5-7 दिनों तक. इसके 500 मिलीग्राम मात्रा का हर बीमारी में इतना दुरुपयोग किया गया है कि अब यह असर नही करती. पतले दस्त से लेकर सर्दी-बुखार तक में इसका उपयोग किया गया है.

यदि इन झोला छाप डाक्टरो के चुंगल से बचकर कोई मरीज असल डाक्टर के पास पहुचता है तो उसे लीवोफ्लाकसासिन नामक एंटीबायोटिक्स देना मजबूरी होता है. मरीज जब गॉव लौटकर जायेगा तो झोलाछाप लीवोफ्लाक्सासिन का नाम भी सीख जायेगें. फिर शुरु हो जायेगा इसका उपयोग ले बाबूलाल दे बाबूलाल.

आज छत्तीसगढ़ में ही नही दुनिया भर में एंटीबायोटिक्स के प्रतिरोधी हो जाने पर चिकित्सक वर्ग चितिंत है. फलतः नये-नये एंटीबायोटिक्स की खोज की जा रही है. नये एंटीबायोटिक्स महंगे होते हैं एवं आयातित करने पड़ते हैं.

एंटीबायोटिक्स के उपयोग पर नियंत्रण होना चाहिये. आवश्यकता पड़ने पर ही एंटीबायोटिक्स का उपयोग हो एवं योग्य चिकित्सक ही इसका उपयोग कर सके यह सुनिश्चित किया जाये. ऐसे हालात में सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिये. कानून एवं उसके क्रियान्वयन द्वारा ही मानव समाज को इस संकट से निकाला जा सकता है. जनता के बीच जागृति फैलाना समय की पुकार है. यदि इसे अनसुना किया जाता है तो भविष्य भयावह होगा.

राज्य सरकार को चिकित्सा सेवा को गॉव-गॉव तक ले जाना होगा. ताकि हर कोई इसका फायदा उठा सके. स्वास्थ्य महकमें में जो पद रिक्त पड़े है उन्हे तुरंत भरा जाना चाहिये. झोलाछापो पर कार्यवाही करने के पहले अपने अधोसंरचना को दुरस्त करना आवश्यक है.

प्रदेश में 49 उप स्वास्थ्य केन्द्र के लिये ही सरकारी भवन उपलब्ध है. 246 उप स्वास्थ्य केन्द्र भवन विहीन हैं तथा 9 उप स्वास्थ्य केन्द्र अन्य भवनो से संचालित होते हैं. 28 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सरकारी भवनो से संचालित होते हैं. 5 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भवन विहीन हैं तथा 33 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र अन्य भवनो से संचालित होते हैं.

प्रदेश के सरकारी चिकित्सालयों में स्थायी विशेषज्ञ चिकित्सको का विवरण इस प्रकार है. शिशु रोग के 16, स्त्री रोग के 14, मेडीसीन के 39, सर्जरी के 7, नेत्र रोग के 5, अस्थि रोग के 3 एवं नाक कान गला रोग के 3 विशेषज्ञ हैं. बाकी संविदा नियुक्ति पर हैं.

अब इनमें से कितने विशेषज्ञ गॉवो में तैनात हैं यह भी एक अनुसंधान का विषय है. अधोसंरचना तथा मानव संरचना चीख-चीख कर बता रहे हैं कि सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव है. तात्कालिक आवश्यकत्ता इन्हे दुरस्त करने की भी है.

झोलाछाप डाक्टरो को इलाज करने से रोकना राज्य सरकार की जिम्मेवारी है. जिसका पालन किया जाये. जिला कलेक्टरो तथा स्वास्थ्य महकमे का यह नैतिक एवं संवैधानिक कर्त्वय है कि इन बिना छुरियों वाले हत्यारो पर कार्यवाही की जाये. भोले-भाले ग्रामीणों की रक्षा की जाए.

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