जोड़ों में बलात्कार पर सजा

Monday, July 27, 2015

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पोर्न फिल्म

सुनील कुमार
अभी संसद में और संसद के बाहर इस बात पर बहस चल रही है कि क्या शादीशुदा जोड़ों के बीच ऐसे सेक्स को बलात्कार का दर्जा देकर सजा के लायक बनाया जाए जिसमें एक जोड़ीदार दूसरे की मर्जी के खिलाफ देहसंबंध बनाए. मोटे तौर पर बलात्कार से एक आदमी ही मुजरिम दिखता है, लेकिन हो सकता है कि ऐसा कोई कानून बनते समय उसे आदमी और औरत दोनों को बराबरी का हक देने वाला बनाने की बात भी हो. शादीशुदा जोड़ों के बीच भी अगर बलात्कार की नौबत आती है, तो उसमें जरूरी नहीं है कि आदमी की ही जरूरत औरत से अधिक हो, और वही हमलावर हो, तस्वीर इसके ठीक उल्टी भी हो सकती है, इसलिए कानून बनाते समय तमाम संभावनाओं पर, तमाम आशंकाओं पर नजर डाल लेना जरूरी होता है.

भारतीय समाज के बहुत से शादीशुदा जोड़ों के बारे में कुछ बातों की जानकारी उन्हीं के बताए हुए मुझे है, और उसी के आधार पर मुझे बलात्कार की परिभाषा के ऐसे विस्तार वाले कानून के साथ कुछ दिक्कतें भी लगती हैं. भारतीय समाज की हकीकत को देखें, तो बहुत से जोड़े कई मौकों पर बरसों तक अलग रहने लगते हैं, बहुत से जोड़े तलाक का हौसला जुटा पाते हैं, और बहुत से मामलों में दहेज प्रताडऩा जैसी शिकायतें भी सामने आती हैं. मतलब यह कि शादीशुदा जोड़ों के बीच इतने तनाव की नौबत आने के पहले तक भी तनाव कम या ज्यादा हद तक तो शुरू हो ही चुका रहता है, तभी जाकर अलगाव की ऐसी नौबत आती है. क्या ऐसे में लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ तलाक के लिए अदालत में वजह गिनाने का एक नया मौका नहीं मिल जाएगा? और पेशेवर वकील और जज सेक्स की ऐसी बारीकियों के कितने विश्लेषण के काबिल होंगे? और शादीशुदा जोड़े के दोनों भागीदारों में से जो लोग अदालत में सेक्स विशेषज्ञों को गवाह के रूप में खड़ा कर पाएंगे, क्या वे ऐसे मामलों को जीतने की अधिक संभावना नहीं रखेंगे? ऐसा नहीं है कि पैसों की ताकत से आज भी लोग ऐसे विशेषज्ञ नहीं खरीदते हैं, लेकिन सेक्स संबंधों की जटिलताओं से मोटे तौर पर नावाकिफ जज और वकील हो सकता है कि विशेषज्ञ राय सुनना चाहें.

अब एक स्थिति की कल्पना करें जिसमें पति-पत्नी के बीच मानसिक या शारीरिक जरूरतों को लेकर फर्क हो. ऐसा फर्क पसंद और नापसंद को लेकर भी हो सकता है, कि किसी को सेक्स का कोई एक तरीका पसंद हो, और साथी को इस तरीके से नापसंदगी हो. एक दूसरी बात यह हो सकती है कि एक की शारीरिक जरूरतें अधिक हों, और दूसरे की कम हों. एक तीसरी बात यह हो सकती है कि किसी एक दिन किसी एक की हालत सेक्स के लायक हो, लेकिन साथी की हालत उस दिन वैसी न हो. ऐसी बहुत सी स्थितियां आ सकती हैं, हर शादीशुदा जोड़े की जिंदगी में आती हैं जब किसी एक दिन, किसी एक वक्त पर, किसी एक किस्म के सेक्स के लिए, एक को दूसरे पर कुछ दबाव डालकर उसे तैयार करना पड़ता है, या कम से कम उसकी कोशिश लोग करते हैं.

अब यह नौबत एक शादीशुदा जोड़े के बीच एक के हिसाब से मनुहार की, मनाने की, तैयार करने की हो सकती है, और इन्हीं कोशिशों को दूसरा साथी जबर्दस्ती करार दे सकता है, या दे सकती है. जहां शादीशुदा जिंदगी पचास बरस या उससे भी लंबी हो सकती है, वहां पर यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी नौबत कई बार आ सकती हैं. किसी भी देश, प्रदेश, समाज, धर्म, और परिवार की अपनी खास नौबतों के चलते हुए कई ऐसे मौके आ सकते हैं जब परिवार के दूसरे लोगों का ख्याल रखते हुए भी एक महिला अपने पति को रोकने की कोशिश करे, और वह उसी वक्त सेक्स पर आमादा हो.

अब आधी सदी की शादीशुदा जिंदगी में आने वाली ऐसी अनगिनत नौबतों में जब जिंदगी के बाकी तनाव मिलकर एक अलगाव की नौबत ला सकते हैं, तब ऐसी मनुहार या ऐसी जबर्दस्ती कब बलात्कार करार दे दी जाए, यह फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होगा. एक कोशिश और एक जबर्दस्ती के बीच ऐसी नौबत में कोई सरहद नहीं खींची जा सकेगी, और एक ही तस्वीर को दो तरफ से देखकर उसके दो मतलब निकालने का खतरा हमेशा ही बना रहेगा.
ऐसे में कानून क्या करेगा, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अंधा होता है, और सिर्फ सुबूतों पर फैसला करता है. भारत में कानून के बारे में एक दूसरी बात यह भी है कि यह महिलाओं के मामले में, दलितों और आदिवासियों के मामले में, बच्चों और नाबालिगों के मामले में इनको विशेष अधिकार देने वाला है, और इनकी बात का वजन आरोपी की बात से अधिक रखने का इंतजाम कानून में ही है. ऐसे में एक शादीशुदा जोड़े के बीच जबर्दस्ती सेक्स को सजा के लायक बलात्कार बनाने से एक तो शिकायत करने वाली महिलाओं के पति पर एक खतरा बढ़ेगा, जो कि हो सकता है हर वक्त जायज न हो, और दूसरी नौबत यह आएगी ही आएगी कि आपसी तनाव से गुजर रहे जोड़ों के बीच देहसंबंधों से दिक्कतें सुलझने की संभावना घट जाएगी, या खत्म ही हो जाएगी.

किसी कानून को जो कि इंसानों पर लागू होना है, उनको बनाते समय इंसान के बुनियादी मिजाज, और उसकी बुनियादी जरूरतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए. इसके साथ-साथ उस देश और वहां की सामाजिक व्यवस्था की सीमाओं और संभावनाओं को भी देखना चाहिए. इन सबको देखें तो लगता है कि भारत में शादीशुदा जोड़ों के बीच देहसंबंधों को लेकर कई तरह की संभावनाएं टटोलने की संभावनाएं ऐसे कानून से खत्म हो जाएंगी. आज बलात्कार को स्थापित करने के लिए जो मेडिकल जांच होती है, वह यह देखती है कि बलात्कार के शिकायतकर्ता के बदन पर जख्मों के निशान, जबर्दस्ती के निशान, नाखूनों के निशान हैं या नहीं. अब दूसरी तरफ भारत के ही वात्सायन के कामसूत्र को पढ़ें, तो उसमें देहसंबंधों की विविधताओं में से कुछ ऐसी हैं जिनमें नाखूनों और दांतों से नोंचने या काटने को देहसंबंध का एक तरीका बताया गया है. अदालत में जब एक अंधे कानून, और वात्सायन में मुकाबला होगा, तो कौन जीतेगा?

यह बात जगजाहिर है कि हर आदमी और हर औरत की सेक्स की पसंद, नापसंद, प्राथमिकता, और जरूरत, इन सबमें बड़ी विविधता रहती है और बड़ा फर्क रहता है. किसी एक की पसंद किसी दूसरे के लिए हिंसा भी हो सकती है. ऐसे में क्या शादी के पहले संभावित जोड़े के दोनों लोगों के बीच खुलासे से बातचीत होकर एक विवाह-पूर्व लिखित समझौता होना चाहिए, जैसा कि कई देशों में अभी भी प्रचलित है.

एक दूसरी बात इसी से जुड़ी हुई यह है कि भारत में परिवार की तय की हुई शादियों से परे जहां पर लड़के-लड़कियां साथ रहना पहले शुरू करते हैं, और शादी कुछ महीनों या बरसों के बाद करते हैं, या कम से कम शादी के पहले उनके हर किस्म के संबंध बन चुके होते हैं, वे एक-दूसरे की पसंद-नापसंद, एक-दूसरे के मिजाज को बेहतर समझ चुके होते हैं, और उनके बीच शादी के बाद बलात्कार जैसे खतरे शायद कम हों. इसलिए ऐसे किसी कानून के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी शिकायत या ऐसे जुर्म की नौबत समाज के भीतर, जोड़ों के भीतर कैसे घटाई जा सकती है. जुर्म की जड़ को खत्म किए बिना ऊपर-ऊपर उसके लिए सजा बनाते चलने से सरकार और समाज पर बोझ बढ़ते चलेगा. आज जो समाज शादी के बाद की जबर्दस्ती को सजा के लायक जुर्म बनाने की तैयारी कर रहा है, उस समाज को कम से कम शादी के पहले लड़के-लड़कियों को प्रेम करने, साथ रहने का मौका देना सीखना चाहिए, वरना बेमेल संबंधों को लादकर उसके बीच अपराध और सजा का इंतजाम करना एक बड़ी नासमझी होगी.

यह सब कहने का यह मतलब बिल्कुल ही नहीं है कि शादीशुदा जोड़ों के बीच आपसी बलात्कार की नौबत आती ही नहीं है. और मैं तो इसे केवल आदमी का किया हुआ जुर्म मानने से भी इंकार करता हूं. हो सकता है कि कई मामलों में एक औरत की जरूरत अधिक आक्रामक रहती हो. लेकिन इनमें से जो भी नौबत हो, किसी कानून को बनाने के पहले, या उसको बनाने के साथ-साथ, एक बड़ी मशक्कत सामाजिक और वैवाहिक परामर्श के लिए होनी चाहिए. भारत का दकियानूसी समाज शादी के पहले तक लड़के-लड़कियों को सेक्स की किसी चर्चा से भी रोकने पर आमादा रहता है. और शादी के तुरंत बाद उनसे तन-मन के जटिल संबंधों का विशेषज्ञ बन जाने की उम्मीद की जाती है. इसके बीच जो तनाव खड़ा होता है, उसे सिर्फ कानून से निपटाना नासमझी होगी. जो समाज, या जो सरकारें समस्या की जड़़ों तक पहुंचने की जहमत उठाना नहीं चाहते, उनके लिए यह पसंदीदा शगल रहता है कि हर बात के लिए एक नया कानून बना दिया जाए, जो कि उसी तरह अमल से दूर रहे, जैसे कि आज के अधिकतर कानून किताबों के बीच कैद रहते हैं.

शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार एक बड़ी जटिल बहस का मुद्दा रहेंगे, और समाज को इस बारे में संसद से कहीं अधिक सोचने की जरूरत है, वरना इंसाफ कम, बेइंसाफी अधिक का खतरा खड़ा हो जाएगा.

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