थके नहीं रमेशचंद्र शाह

Tuesday, March 10, 2015

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रमेशचंद्र शाह

बीबीसी | रायपुर: “मैं सोचता हूं. इसलिए मैं हूं”, रेने देकार्त का बहुत प्रसिद्ध वाक्य है. मेरी समझ में यह बड़ी भारी भूल है उसकी. और यही सारी मुसीबतों की जड़ है. ‘सच यह है कि मैं हूं; इसलिए मैं सोचता हूं.’ सोचना एक फंक्शन मात्र है; जबकि होना एक फैक्ट है. हमें फैक्ट को पकड़कर चलना चाहिए, न कि फंक्शन को.

रमेशचंद्र शाह और उनके लेखन को समझने में उनके उपन्यास विनायक के एक पात्र का यह कथन थोड़ी मदद तो करता है लेकिन जब तक आप इसके अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं, रमेशचंद्र शाह का कवि वाला व्यक्तित्व आपके सामने आ कर खड़ा हो जाता है.

कविताओं में डूबते-उतरते आप संभल भी नहीं पाते कि डायरी का एक अंश आपको बुलाने लगता है. फिर नाटक, आलेख, यात्रा वृतांत, आलोचना और… आप गुमने लग जाते हैं!

रमेशचंद्र शाह समझाने वाले अंदाज़ में कहते हैं, “मुझे जब लगता है कि मैं किसी एक विधा में अपने को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर पा रहा हूं तो मैं दूसरी विधा को चुन लेता हूं.”

2014 का साहित्य अकादमी सम्मान सोमवार को रमेशचंद्र शाह को 78 साल की उम्र में जा कर मिला.

38 साल पहले जब उनका उपन्यास ‘गोबर गणेश’ प्रकाशित हुआ था, तब पहली बार उन्हें साहित्य अकादमी दिये जाने की चर्चा हुई थी. अब 78 किताबें लिखने के बाद कहीं जा कर ‘विनायक’ उपन्यास को साहित्य अकादमी के लायक समझा गया.

इस दौरान रमेशचंद्र शाह ने 78 किताबें लिखीं. शाह कहते हैं, “मेरी किताबें कम से कम छह अवसरों पर साहित्य अकादमी के लिये शार्टलिस्ट की गईं. लेकिन मुझे सुख केवल इस बात का है कि जिस विनायक उपन्यास के लिये अंतत: मुझे साहित्य अकादमी मिला, वह मेरे पहले उपन्यास गोबर गणेश का ही विस्तार है.”

शाह अपने अल्मोड़ा के दिनों की याद करते हुए डूब जाते हैं, “एक तरफ तो अद्भूत प्राकृतिक रमणीयता और उससे लिपटी हुई लोक संस्कृति. यह मेरी इंद्रियों को जगाने वाला था. दूसरी तरफ बहुत निर्धनता, बहुत अभावग्रस्तता. तीसरी तरफ एक बाज़ार के परिवेश में हमारा मकान. मानव मेला. जहां बैठे-बैठे ही आप घटित होते जीवन लीला को अपने सामने देख रहे हैं.”

रमेशचंद्र शाह मानते हैं कि ये दोनों नितांत विरोधी स्थितियों ने उनके लिए साहित्य की ज़मीन तैयार की. बाज़ार और कोलाहल ने कथाकार को जगाया तो चीड़ के पेड़ों के बीच घंटो निस्तब्धता और खामोशी ने कवि मन को प्रेरित किया.

अपने लिखे में दर्शन और चिंतन के विस्तार को लेकर रमेशचंद्र शाह के पास अपने तर्क हैं, “आम हिंदुस्तानी के लिए ज्ञान का मतलब आत्मज्ञान होता है, नॉलेज इंडस्ट्री नहीं. सामान्य से सामान्य आदमी में भी दार्शनिक संस्कार होता ही है. वही मुझमें भी है. जीवन के स्वाभाविक दिशा, परिणति के रुप में वह रचनाओं में भी आएगा ही.”

रमेशचंद्र शाह उम्र के इस पड़ाव में आ कर भी थके नहीं हैं. हर रोज़ लिखना, जीवन के दूसरे काम की तरह उनकी दिनचर्या में शामिल है क्योंकि शाह मानते हैं कि अभी उनकी श्रेष्ठतम रचना का लिखा जाना बचा हुआ है.
चर्चित किताबें

‘गोबर गणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘विनायक’ (सभी उपन्यास); ‘नदी भागती आई’, ‘प्यारे मुचकंद को’ (सभी कविता-संग्रह), ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्र’ (सभी कहानियां); ‘रचना के बदले’, ‘समानांतर’, ‘वागर्थ’, ‘भूलने के विरुद्ध’ (निबंध एवं आलोचना).

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