छग के गांवों तक विकास कैसे पहुंचेगा?

Friday, March 18, 2016

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आदिवासी

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में मनरेगा के 2015-16 के 59,759.69 लाख रुपयों का भुगतान बकाया है. इतना ही नहीं साल 2014-15 के 491.81 लाख रुपयों का भुगतान अब तक नहीं किया जा सका है. पिछले साल 2014-15 में मनरेगा के तहत कराये गये कार्यों में से सरगुजा में 256.42 लाख, जशपुर में 2.14 लाख, कोरिया में 135.98 लाख, जांजगीर-चांपा में 96.47 लाख, कबीरधाम में 2.50 लाख तथा बेमेतरा में 1.30 लाख रुपयों का भुगतान नहीं किया जा सका है.

हैरत की बात है कि साल 2015-16 में कराये गये 4,78,949.19 लाख रुपयों में से 59,759.69 लाख रुपयों का भुगतान नहीं किया जा सका है. इस तरह से 12.47 फीसदी मनरेगा के मजदूरी का भुगतान अभी तक नहीं किया जा सका है.

छत्तीसगढ़ सरकार का कथन है कि केन्द्र से राशि प्राप्त होते ही इसका भुगतान कर दिया जायेगा. इसका अर्थ है कि कोताही केन्द्र सरकार की है राज्य सरकार की नहीं.

उल्लेखनीय है कि मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीणों को उनके गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराना है. उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में साल 2015-16 में 25,91,561 परिवारों ने रोजगार की मांग की थी जिसमें से 20,47,566 परिवारों को ही रोजगार उपलब्ध कराया जा सका है. जाहिर है कि रोजगार मांने वालें 21 फीसदी परिवारों को रोजगार मुहैय्या नहीं कराया जा सका है.

जबकि 1,78,432 परिवारों को ही 100 दिन का रोजगार दिया जा सका है. जिसका अर्थ होता है कि मात्र 8.71 फीसदी परिवारों को 100 दिनों का रोजगार दिया जा सका है.

आकड़ें चीख-चीखकर घोषणा कर रहें हैं कि छत्तीसगढ़ में मनरेगा का लगातार हास हो रहा है. 21 फीसदी परिवारों को रोजगार मुहैय्या नहीं कराया जा सका है उसमें से केवल 8.71 परिवारों को मनरेगा के घोषित उद्देश्य के अनुसार 100 दिनों का रोजगार दिया गया है. उस पर तुर्रा यह कि 12.47 फीसदी के मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा सका है चाहे कारण जो भी हो.

जाहिर है कि इस तरह से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों से रोजगार के लिये दिगर राज्यों की हो रहें पलायन को रोका नहीं जा सकता है. कम से कम जन कल्याणकारी सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन से ग्रामीण छत्तीसगढ़ को कुछ राहत तो दी ही जा सकती है.

मनरेगा जैसी योजनाओं की आलोचना करने वाले कह सकते हैं कि आखिरकार इस तरह के योजनाओं की जरूरत क्यों आन पड़ी? उनका यह आरोप भी सही है कि विकास की किरणें गांवों तक नहीं पहुंची है जिसके लिये देश पर लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी जिम्मेदार है. इसी के साथ यह सवाल भी किया जाना चाहिये कि उस समय आप क्या कर रहें थे. क्या आपके पास कोई वैकल्पिक योजना है.

अब तक जितनी नई योजनाओं को लांच किया गया है जैसे मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा, अटल बीमा योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीअ कौशल योजना, आवास योजना उनमें से किसी से भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ने जा रहे हैं.

लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच छत्तीसगढ़वासियों को किस तरह से राहत पहुंचाई जाये यह लाख टके का सवाल है.

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