भ्रूण हत्या से दूर पहाड़ी कोरवा

Sunday, November 30, 2014

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कोरवा जनजाति-कोरबा

कोरबा | अब्दुल असलम: छत्तीसगढ़ की कोरवा जनजाति कन्या भ्रूण हत्या से कोसो दूर रहती है. यह जनजाति छत्तीसगढ़ के कोरबा के पहाड़ों में वास करती है. जनगणना 2011 के लिहाज से भले ही जिले भर में स्त्री-पुरूष अनुपात में सामंजस्य न हो, किंतु कोरवा जनजाति की महिलाओं की तादात पुरूष से अधिक होने से इस जनजाति के संरक्षण को लेकर आशातीत परिणाम देखे जा रहे हैं.

नवीन जनगणना के अनुसार इस जनजाति को लेकर महिला, पुरूष अनुपात में आश्चर्यजनक आंकड़े सामने आए हैं. जिले में कोरवा जनजाति के कुल 638 परिवार निवास करते हैं. इनमें सबसे अधिक पहाड़ी कोरवाओं का वास कोरबा विकासखंड में ही है. वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 2889 है. इसमें पुरूषों के संख्या 1232 व महिलाओं की संख्या 1257 अंकित की गई है.

सभ्यता व शिक्षा के विकास के बाद भले ही शहरी क्षेत्रों में कन्या भ्रूण हत्या को लेकर तरह-तरह के कवायद व नारेबाजी किए जाते हों, किंतु शिक्षा से कोसों दूर पहाड़ी कोरवाओं में कम से कम यह मानवता तो है कि वे कन्या भ्रूण हत्या से कोसों दूर हैं. आज भी इस जनजाति में बाल विवाह जैसे कुप्रथा जारी है, किंतु इस जनजाति में दहेज दानव अथवा भ्रूण हत्या जैसी विकृत मानसिकता नहीं है. भले ही शासन द्वारा इन्हें शिक्षित कर समाज की मुख्य धारा में जोडऩे के लिए उपकृत योजना बनाई जा रही है.

यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में ये पहाड़ी कोरवा कन्या भ्रूण हत्या व दहेज दानव जैसे विकृति को शिक्षित होने के बाद अपना लें. प्रशासनिक योजनाओं के विकेंद्रीकरण के बावजूद भी जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन नहीं होने से जिले के कोरवा जनजाति का समग्र विकास नहीं हो पा रहा है.

महिला सशक्तिकरण को लेकर शासन द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही है. इस जनजाति की महिलाओं को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाने के कारण अब भी स्तर में सुधार नहीं हो सका है. विडंबना यह है कि कोरवाओं के लिए शासकीय योजनाओं के विकेंद्रीकरण नहीं होने के कारण इन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ा जाना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है. इस पिछड़ी जनजाति में शैक्षणिक स्तर में व्यापक सुधार की आवश्यकता जताई जा रही है.

पहाड़ी कोरवा जनजाति का वास कोरबा जिले के पहाड़ी क्षेत्रों में आदिकाल से है. राज्य भर में कई आदिम जनजातियों की संख्या सिमट रही है. यह बात ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है जब संरक्षित जनजाति के महिलाओं का नसबंदी कर दिया जा रहा है. संभवत: यह जनजाति कोरबा के आदि मानव होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है.

यह भी कहा जाता है कि कोरबा जिले का नामकरण कोरवा के कारण ही हुआ है. प्रशासन द्वारा इस जनजाति के संरक्षण के लिए कई उपाय तो किए जा रहे हैं, किंतु इसके आशातीत परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं. इस कड़ी में इन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र की उपाधि भी दी जा चुकी है.

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