महंत ने कहा भाजपा सरकार के अच्छे दिन!

Saturday, August 30, 2014

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चरण दास महंत

कोरबा | अब्दुल असलम: डॉ. महंत ने सवाल उठाया है कि क्या यही भाजपा सरकार के अच्छे दिन हैं, जब भू-विस्थापितों को उनकी घर से घसीट- घसीटकर मारते हुए निकाला जाता है? पूर्व केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री व कोरबा के निवृत्तमान सांसद चरणदास महंत ने छत्तीसगढ़ के एसईसीएल की खदानों के विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान भू-विस्थापितों के साथ किए जाने वाले बल प्रयोग, दुव्र्यवहार और दमनात्मक कार्रवाई की कठोर शब्दों में भत्र्सना की है.

एसईसीएल की गेवरा परियोजना खदान का विस्तार से प्रभावित ग्राम पोड़ी के लोगों को बिना रोजगार व बेहतर व्यवस्थापन दिए दमनात्मक कार्रवाई करते हुए बेदखल करने और मकान तोडऩे पर डॉ. महंत ने कहा है कि लगातार प्रबंधन द्वारा प्रदेश की भाजपा सरकार के सहयोग से हितों की अनदेखी की जा रही है. भोले-भाले किसानों, आदिवासियों के हक पर जबरिया डाका डाला जा रहा है.

आदिवासी जिले में पेसा एक्ट का खुला उल्लंघन उद्योगों के प्रबंधन कर रहे हैं लेकिन सरकार सब कुछ जानकर भी चुप बैठी है. जिले के कृषि भूमियों का लगातार उद्योग हित में और एसईसीएल को देने का खेल रमन सरकार की सीधी देखरेख में हो रहा है. डॉ. महंत ने ग्राम पोड़ी और इससे पहले कुसमुंडा खदान विस्तार के लिए ग्राम बरकुटा में की गई कार्रवाई की निन्दा करते हुए कहा है कि उन्होंने इस विषय में कांग्रेस संगठन के लोगों से चर्चा की है.

डॉ. महंत ने कहा है कि मोदी सरकार ने एक ओर जहां महंगाई बढ़ाकर जनता को छला है वहीं भाजपा के राज में अधिकारियों के हौसले इतने बढ़ गए हैं कि महिलाओं को बाल पकड़कर घसीटते हुए, उनके हांथ मोड़ते हुए घर से निकाला जा रहा है. यहां तक कि एक वृद्ध महिला को अपने अधिकार के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के सामने आत्मदाह करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, और इस सब की वजह मात्र उद्योगों को बढ़ावा देना है. क्या इस तरह की कार्रवाई से माना जाए कि महिलाओं की इज्जत और रक्षा की बात करने वाले मोदी सरकार के अच्छे दिन आ गए हैं?

डॉ. महंत ने कहा है कि कोरबा जिले के ग्राम पोड़ी, बरकुटा के अलावा धनरास, रिस्दा, गोपालपुर, पंडरीपानी, छिरहुट खदान व उद्योग प्रभावित गांवों के भू-विस्थापितों की समस्याओं की भाजपा सरकार अनदेखी कर रही है. एक ओर भू-विस्थापित अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और दमनात्मक कार्रवाई का शिकार हो रहे हैं वहीं पुनर्वास ग्रामों में सुविधा के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है.

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