प्रभावित क्षेत्र में हो जनसुनवाई

Tuesday, September 20, 2016

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कांकेर | अंकुर तिवारी: छत्तीसगढ़ के कांकेर में खान के लिये जनसुनवाई गांव में ही कराने की मांग उठी है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य कांकेर जिले में नवभारत फ्यूज कंपनी लिमिटेड के प्रस्तावित लौह अयस्क आयरन ओर माइन की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए प्रभावित क्षेत्र में जन सुनवाई कराने की मांग ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से की है.

इसके पहले 7 सितंबर को भानुप्रतापपुर के जनपद पंचायत कार्यालय में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जन सुनवाई का आयोजन किया गया था. इस जन सुनवाई की जानकारी जिला प्रशासन ने प्रभावित होने वाले ग्रामीणों को पहले से नहीं दी थी. जिसके बाद गोपनीय ढंग से जन सुनवाई को संपन्न कराने की कोशिश की गई. मगर आदिवासियों को एन वक्त पर इस जन सुनवाई की सूचना मिल गई. मौके पर पहुंचे ग्रामीणों ने इसका जमकर विरोध किया, जिसके बाद जिला प्रशासन ने जन सुनवाई को स्थगित कर दिया है.

दुर्गूकोंदल तहसील क्षेत्र में जन सुनवाई का आयोजन कराने की बजाये जिला प्रशासन ने 35 किलो मीटर दूर भानुप्रतापपुर के जनपद कार्यालय में लोक सुनवाई का आयोजन किया था. ग्रामीणों के विरोध के बाद पर्यावरणीय जन सुनवाई को स्थगित करना पड़ा था.

ग्राम पंचायत तराईघोटिया के आश्रित ग्राम रसूली में 45 हजार टन की वार्षिक उत्पादन क्षमता वाले लौह अयस्क खदान के लिए 220 हेक्टेयर भूमि का आवंटन किया जाना है. खदान को शुरु करने के लिए पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य है. एनवायरमेंट क्लियरेंस के बिना खनन का काम चालू नहीं किया जा सकता है.

ग्राम पंचायत तराईघोटिया के उप सरपंच अरविंद कुमार कल्लो कहते है, “पिछली जनसुनवाई की जानकारी स्थानीय लोगों को नहीं दी गई थी. इस जन सुनवाई में प्रभावित होने वाले लोग शामिल नहीं हुए थे. हमारी मांग है कि जहाँ माइनिंग होनी है उस क्षेत्र में जन सुनवाई का आयोजन किया जाए ताकि आम जनता उपस्थित होकर अपनी बात कह सकें.”

ग्रामीणों ने कहा कि, “स्थानीय लोगों को सूचना दिए बगैर गोपनिय तरीके से जन सुनवाई संपन्न किया जा रहा था. हमें पता है कि खदान खुलने से पर्यावरण को नुकसान होगा, कृषि कार्य प्रभावित होंगे और खदान से निकलने वाले लाल पानी से हमारे खेत बंजर होंगे. वन संपदा को भी नुकसान होगा, इसलिए हम चाहते है कि स्थानीय क्षेत्र में जनसुनवाई का आयोजन किया जायें.”

दूर्गूकोंदल इलाके के आदिवासी इस बात को लेकर ज्यादा सशंकित हैं कि इस खदान से वन संपदा को भारी नुकसान होगा तथा कृषि कार्य प्रभावित होगा. इसके साथ ही जिलें के अऩ्य खदानों से पर्यावरण को हो रहे नुकसान से लोग वाकिफ है.

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