छत्तीसगढ़ में महंगी हो सकती है बिजली

Saturday, February 8, 2014

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संकट गहराया-छत्तीसगढ़

रायपुर | एजेंसी: सरप्सल बिजली वाले राज्य होने का दावा करने वाले छत्तीसगढ़ में बिजली उपभोक्ताओं की जेबों पर भारी बिजली बिलों का बोझ जल्द पड़ सकता है. राज्य की विद्युत वितरण कंपनी ने छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग को आय-व्यय के ब्योरे के साथ अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी है. कंपनी ने 2014-15 के बिजली की दर में 21 फीसदी बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया है.

फिलहाल आयोग, कंपनी के आय-व्यय के ब्योरे की स्क्रूटनी करने में लगा हुआ है. स्क्रूटनी के बाद आय-व्यय का प्रकाशन कर आम जनता से राय ली जाएगी. सरप्लस बिजली वाला स्टेट होने के बाद भी यहां लगातार बिजली की दर बढ़ती जा रही है. वर्तमान में यहां दो रुपये दस पैसे (2.10) से लेकर पांच रुपये पच्यासी पैसे (5.85) तक स्लैब आधारित दर प्रचलित हैं.

छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग के सचिव पीएन सिंह ने कहा, “कंपनी की तरफ से आय-व्यय का ब्योरा दिया गया है. इसमें 21 फीसदी बढ़ोत्तरी का प्रस्ताव है. फिलहाल कंपनी से मिले आय-व्यय की जांच की जा रही है. कंपनी से कई बिन्दुओं पर जानकारी मांगी गई है. पूरी प्रक्रिया अपनाने के बाद बिजली की नई दर घोषित की जाएगी.”

विभागीय सूत्रों के मुताबिक छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी ने 2014-15 में छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग से 8202 करोड़ रुपये की जरूरत बताई है. इसके एवज में कंपनी ने घरेलू और गैर घरेलू बिजली की दर में 21 फीसदी बढ़ोतरी करने की मांग की है.

बताते हैं कि कंपनी ने करीब 1400 करोड़ की हानि की रकम की वसूली के लिए बिजली की दर में बढ़ोतरी करने का प्रस्ताव दिया है. कंपनी के आय-व्यय ब्योरे के संबंध में आयोग जांच कर रहा है. जांच में आयोग ने कई बिन्दुओं पर आपत्ति जताई है. आयोग ने कंपनी से इन्हीं बिन्दुओं पर जानकारी मांगी है.

बताया जा रहा है कि आयोग ने कंपनी को 6700 करोड़ रुपये देने को कहा है, लेकिन कंपनी ने 8202 करोड़ रुपये की मांग की है. बताते हैं कि कुछ बिन्दुओं पर कंपनी ने आयोग को जानकारी दे दी है, लेकिन इसका अवलोकन आयोग ने नहीं किया है. कंपनी की जानकारी के आधार पर आयोग बिजली की दर निर्धारित करेगी. इसके पहले आय-व्यय का ब्योरे को लेकर आम जनता से राय ली जाएगी. इसके बाद आयोग बिजली की नई दर निर्धारित करेगा. हालांकि कंपनी के अफसरों ने इसे प्रारंभिक जानकारी बताया है.

अफसरों का कहना है कि इस पर अभी अगले दौर में चर्चा होगी और कई बार आंकड़े बदले जाएंगे, ऐसे में इसे अंतिम आंकड़ा मानना गलत होगा. लोकसभा चुनाव के ठीक पहले इस प्रस्ताव को राजनीतिक नफा नुकसान से भी जोड़ कर देखा जाने लगा है.

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