घोषणा पत्र में कांग्रेस

Wednesday, November 6, 2013

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस

रायपुर | कनक तिवारी: छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2013 के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी किया है. पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष तथा चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष मोतीलाल वोरा को राजधानी रायपुर में घोषणा पत्र जारी करने का श्रेय मिला. प्रदेश में चुनाव 11 तथा 19 नवम्बर को दो चरणों में होंगे. कोई दस दिन पहले जारी किए गए घोषणा पत्र को मतदाताओं के लिए निःशुल्क मुहैया कराए जाने की कोई घोषणा नहीं है. उसे मीडिया के ज़रिए घोषित किया गया है. प्रचारित कैसे किया जाएगा-इसका कोई संकेत भी नहीं है.

चिकने आर्ट पेपर पर पतली सी सुंदर चित्रों से सजी पुस्तिका में हिज्जे की कई खटकने वाली गलतियां हैं. मसलन ‘‘प्रदेष‘‘, ‘‘रूपये‘‘, ‘योजनाऐ‘‘, ‘‘उत्कृश्ठ‘‘ तथा ‘‘गुरू‘‘ आदि. इससे ज़ाहिर है कि अंतिम ड्राफ्ट को किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति ने पढ़ने की ज़हमत भी नहीं उठार्ई. यह भी स्पष्ट नहीं है कि घोषणा पत्र किस प्रिंटिंग प्रेस में छपा है जिससे उत्सुक लोग उसे हासिल कर सकते. 17 सूत्रीय घोषणा पत्र में कई प्रमुख बिन्दु स्वप्नशीलता के साथ शामिल किए गए हैं. वे कब पूरे होंगे. उसके लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है.

देश जानता है कि भारत के संविधान के भाग-4 में नीति निदेशक तत्व वे स्वप्न हैं जिन्हंें संविधान निर्माताओं ने वंशज पीढ़ियों की संसद के लिए प्रावधानित किया था कि वे धीरे धीरे इन सपनों को पूरा करने का प्रयास करें. दुर्भाग्यजनक है कि अधिकांश स्वप्न संविधान के 63 वर्ष पूरे होने पर भी पूरे नहीं किए जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि नीति निदेशक तत्व उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने नागरिकों के मूल अधिकार. फिर भी सरकारों ने उन घोषणाओं को पूरा करने के प्रयत्न नहीं किए. इन्दिरा गांधी ने सबसे ज़्यादा जनोन्मुखी घोषणाएं की थीं और उन्हें क्रियान्वित भी किया था. उन्होंने ही संविधान में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के मकसद को संशोधन के ज़रिए शामिल किया था. उनके ही प्रधानमंत्री काल में संविधान में ‘मूल कर्तव्य‘ का अध्याय जोड़ा गया था, जो प्रशंसनीय है.

घोषणा पत्र की भूमिका में यह कहा जा सकता था कि पार्टी भारत के संविधान में वर्णित इन सभी आदर्शों और कर्तव्यों के लिए खुद को सदैव की तरह समर्पित रखेगी. यह ज़रूरी था क्योंकि पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने समाजवाद विरोधी निर्णय लगातार किए हैं. अब देश में समाजवाद दम तोड़ रहा है. नरेन्द्र मोदी जैसे उग्र हिन्दूवादी नेता को केन्द्र में रखकर धर्मनिरपेक्षता को नकली धर्मनिरपेक्षता कहकर खिल्ली उड़ाई जा रही है.

मूल कर्तव्यों के संवैधानिक पाठ में कई ऐसे बिन्दु हैं जो हमारे राष्ट्रीय जीवन में क्रांति पैदा कर सकते हैं. इनमें हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों तथा संविधान के आदर्शों का पालन करना, स्त्री विरोधी परंपराओं का तिरस्कार, सामासिक संस्कृति की रक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आदि शामिल है.

बिना अधिक बौद्धिक वर्ज़िश के घोषणा पत्र को किसी सरकारी नस्ती की तर्ज़ पर बिन्दुवार लिखा गया है. वाक्य तक पूरे नहीं लिखे गए हैं. अपूर्ण वाक्य वायदों को अनिश्चितकाल तक उलझा कर रख सकते हैं. कई बुनियादी समस्याओं का स्पर्श तक नहीं किया गया है. किसानों के लिए ढेर वायदे हैं, लेकिन यह सूचना नहीं है कि छत्तीसगढ़ में कितने किसानों ने आत्महत्या की है. यह भी कि खेती की धरती और पैदावार तेजी से क्यों और कितनी कम होती जा रही है. यह भी कि शहरी इलाकों से सटी हुई भूमियों से बाहरी लोगों ने किस तरह छत्तीसगढ़ के किसानों को बेदखल किया है.

कांग्रेस सरकार की विद्युत नीति कोयला आवंटन के आरोप के कारण हमले का शिकार है. निजी पावर प्लांट के छत्तीसगढ़ में उगे मकड़जाल की सफाई को लेकर कोई जानकारी या उल्लेख नहीं है. शिक्षा के क्षेत्र में नियमित प्राध्यापकों की नियुक्ति का खात्मा और स्कूलों में भी संविदा शिक्षकों की अनिश्चित नीति के तहत अंशकालीन नियुक्ति के निर्णय एशियन विकास बैंक से अनुदान पाने के नाम पर किसने किए थे? ऐसी ऊहापोह की स्थिति का क्या भविष्य है?

शिक्षा के अनापशनाप निजीकरण और तरह तरह के खतरनाक प्रयोगशील परिवर्तनों के चलते युवा पीढ़ी के भविष्य को संवारने के लिए कई ठोस विकल्प उपलब्ध हैं. उनका संक्षिप्त उल्लेख हो सकता था. आवास और परिवहन को सार्वजनिक क्षेत्र में सहूलियतों के आधार पर जारी करने का उल्लेख तक नहीं है.

आदिवासियों और दलितों को लेकर लोकलुभावन घोषणाएं करना प्रत्येक पार्टी को बहुत सुहाता है. यदि दलितों का आरक्षण प्रतिशत 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 16 प्रतिशत तथा पिछड़ों के आरक्षण को यदि बढ़ाना है, तो सभी राजनीतिक दलों ने जातीय समरसता को बरबाद किए बिना तमिलनाडु प्रदेश की तर्ज़ पर ऐसे अधिनियम क्यों नहीं रचे, जिनके संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के निर्णय के ज़रिए बहुत पहले सलाह दी है.

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