नसबंदी कांड के सवाल

Friday, November 28, 2014

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सिप्रोसीन 500

रायपुर | संवाददाता: बिलासपुर नसबंदी कांड से उपजा आक्रोश अब अमर अग्रवाल पर जा कर टिक गया है. पूरे मामले की राजनीतिक और सरकारी लीपापोती जारी है लेकिन ऐसे सारे सवाल किनारे कर दिये गये हैं, जो इस भयावह और अक्षम्य कांड के कारण हैं. मारी गई महिलाओं के परिजन और ज़िंदा बच गई महिलाओं के हिस्से के दुख दर्द किसी की चिंता का मुद्दा नहीं है.

यह तो तय है कि इस्तीफा नहीं देने पर अड़े हुये स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के सारे गड़े मुर्दे उखाड़े जाएंगे. चाहे वो गर्भाशय कांड हो या नेत्र कांड या फिर गुड़ाखू का पुश्तैनी व्यापार. लेकिन यह चकित करने वाली बात है कि अमर अग्रवाल को आगे कर के रमन सिंह की सरकार उन सारे सवालों पर चुप है, जिसके जवाब तलाशे जाने पर नसबंदी कांड का सच सामने आ सकता है.

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी

विपक्ष के लिये भी यह सुविधाजनक है कि वह अमर अग्रवाल को ही निशाने पर बनाये रखे. सवाल दूसरे उठेंगे तो सत्ता के लोगों पर भी आंच आएगी और विपक्ष पर भी. दवा बनाने वाले महावर फर्मा के मालिक रायपुर के सांसद रमेश बैस की नाक के बाल हैं तो बिलासपुर में दवा की आपूर्ति करने वाली कंपनी के मालिक कांग्रेसी नेताओं के खासमखास.

और इन सबों के बीच नैतिकता की अपनी परिभाषा गढ़ते हुये स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल छाती ठोंक कर बिलासपुर, रायपुर से लेकर दिल्ली तक घूम रहे हैं कि वे इस्तीफा नहीं देंगे, जिसे जो करना है, कर ले ! इस बेशर्म राजनीति के समय में यह सारा दृश्य चकित करने वाला है.

साजिश
इस पूरे मामले पर नज़र रखने वालों का मानना है कि बिलासपुर का नसबंदी कांड कोई भूलवश हुआ लापरवाही का मामला नहीं है. इस बात का आधार बस इतना भर है कि नसबंदी के बाद इस्तेमाल की गई दवा सिप्रोसीन में जिंक फास्फाइट, लेड, आर्सेनिक और मरकरी जैसे रासायन मिले हैं और इतने रासायन गलती से मिल गये होंगे, यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है.

जिस जिंक फास्फाइट को दवाओं के जहरीले होने का कारण बताया जा रहा है, उसका रंग काला होता है. इसे सफेद करने के लिये ब्लिच का इस्तेमाल किया गया होगा और यह अनजाने में किया गया होगा, इससे भला कौन सहमत होगा?

सिप्रोसिन की लैब में जांच करने वाले सूत्रों का दावा है कि जिन चूहों को जिंक फास्फाइट का 10 से 20 एमजी का डोज़ मारने के लिये पर्याप्त होता है, उन पर सिप्रोसीन का कोई असर नहीं हुआ. उन चुहों को 30000 एमजी डोज़ दी गई, तब कहीं जा कर चूहों की मौत हुई. मतलब ये कि बिलासपुर में बांटी गई सिप्रोसीन को इस तरह से डिजायन किया गया है कि यह सीधे तौर पर मनुष्यों पर असर करे.

ड्रग ट्रायल
ऐसी स्थिति में सवाल कई हैं. मसलन ये कि क्या यह किसी दवा कंपनी का लिमिटेड ड्रग ट्रायल था? छत्तीसगढ़ में अवैध तरीके से मनुष्यों पर ड्रग ट्रायल होते रहे हैं और सरकारें आंख मूंदे बैठी रही हैं. पेंडारी में अगर ऐसी कोई कोशिश की गई होगी तो यह किसी भी दवा कंपनी के लिये सुविधाजनक होगा क्योंकि इस तरह के नसबंदी शिविर में आसपास के लोग शामिल होते हैं और उन पर दवाओं के असर को जानना-समझना सरल होता.

जेनेरिक बनाम ब्रांड
सवाल यह भी है कि क्या यह जेनेरिक दवाओं को बदनाम करने की कोशिश थी? जिस तेजी से राज्य भर में जेनेरिक दवाओं के प्रति जागरुकता बढ़ी है और लोग जेनेरिक की बात करने लगे हैं, उससे भीमकाय दवा कंपनियों की लूट की हद तक मुनाफा कमाने का धंधा खतरे में पड़ सकता है.

आश्चर्य नहीं कि इस कांड के बाद एक टीवी चैनल पर बोलते हुये बिलासपुर के नेहरु चौक पर हास्यास्पद तरीके से एक बड़े डाक्टर ने कहा कि इस मामले में आमिर खान को गिरफ्तार किया जाना चाहिये क्योंकि आमिर खान ने ही लोगों को जेनेरिक दवाओं के बारे में प्रोत्साहित किया. डाक्टर साहब ने पूरे जतन से यह साबित करने की कोशिश की कि जेनेरिक दवाएं कैसे खराब होती हैं और ब्रांडेड दवाओं को हमें क्यों ‘महान’ मानना चाहिए.

और राजनीति
राजनीतिक हलके में तो इस पूरे कांड को लेकर दूर की कई कौड़ियां लाई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि हाल ही में मुख्यमंत्री रमन सिंह को कथित तौर पर हटाये जाने और कथित रुप से अमर अग्रवाल को मुख्यमंत्री बनाये जाने की योजना के कारण यह सब कुछ साजिशाना तरीके से किया गया है. आरोपों के घेरे में नौकरशाहों के नाम हैं, राजनेताओं के नाम हैं. लेकिन ये सारी बातें महज अफवाह की शक्ल में तैर रही हैं.

जाहिर है, इन सारे सवालों के जवाब कम से कम न्यायिक जांच के तय बिंदूओं में तो आने से रहे. दूसरी ओर जांच कर रहे पुलिस कर्मचारियों को रोज-बरोज ‘ऊपर’ से यह करने और यह न करने के निर्देश मिल रहे हैं. मामले में जिन-जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात हो रही है, हरेक आदमी अपने को ‘ऊपर’ का सबसे खास बता कर रौब गालिब कर रहा है. ऐसे में जांच किस तरह होगी और उसके परिणाम क्या होंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.

महावर फार्मा के मालिक, ऑपरेशन करने वाले डाक्टर देर-सबेर जमानत पर बाहर आ जाएंगे और कमज़ोर धरातल पर खड़े किये गये मुकदमें सालों साल एक अदालत से दूसरी अदालत तक चलते रहेंगे.

ऐसे में लाख टके का सवाल है कि क्या इन दवाओं के कारण मारे गये 19 लोगों के परिजनों और इस दवा का दंश जीवन भर झेलने को अभिशप्त सैकड़ों लोगों को कभी अपने अपराधियों के बारे में पता भी चल पाएगा? कम से कम भोपाल गैस कांड की त्रासदी तो हमारे पड़ोस की है और उसका हश्र हम सब आज तक देख रहे हैं.

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