मुर्गा खाने पर नहीं, पालने पर है पाबंदी

Sunday, August 24, 2014

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मुर्गा पालन मना

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के कांकेर और इससे लगे नारायणपुर जिले में गाय पालन करने वाले ठेठवार समाज में मुर्गा खाने पर कोई बंदिश नहीं है लेकिन इसे पालने की पूरी तरह से मनाही है. ऐसा करने पर 151 रुपए का दंड लिया जाता है. ठेठवार समाज ने कई वर्षो से यह नियम लागू कर रखा है और इस पर अमल किया जा रहा है. गाय पालने वाले यदु यानि ठेठवार समाज में यह कायदा सख्ती से अमल में लाया जाता है.

सूबे के यदु समाज का मानना है कि वे गौ माता की सेवा करते हैं न कि मुर्गा-मुर्गियों की. मुर्गा पालने पर ध्यान उसी ओर चला जाता है और इससे गाय की ओर ध्यान कम हो जाता है. कांकेर और नारायणपुर जिलों के आरमेटा, करलखा, धनोरा, कन्हारगांव, चिल्हाटी, तालाकुर्रा, कोटा आदि गांवों में यह प्रथा आज भी प्रचलन में है.

करलखा गांव के शेषलाल यदु भी इसी समाज से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने बताया कि समाज के लोगों को अर्थदंड देने में कोई परेशानी नहीं होती है लेकिन दंड देना वे अपनी बेइज्जती समझते हैं इसलिए मुर्गा नहीं पालते हैं.

अबुझमाड़ के कुंदला, किहकाड़, बेचा, हुकपाड़ समेत कई गांवों में कुछ ठेठवार परिवार रहते हैं जिनके लिए मुर्गा पालना मजबूरी है. वे इसे गांव के सिरहा को विशेष अवसरों पर देते हैं लेकिन जब कभी समाज के पदाधिकारी गांव में जाते हैं तो वे मुर्गे-मुर्गियों को छिपा देते हैं.

जन्म और मृत्यु संस्कार भी ठेठवार समाज के कुछ भिन्न हैं. बच्चा पैदा होने पर छठी का कार्यक्रम होता है. इसमें महिलाओं को आमंत्रित किया जाता है और एक बार भोज दिया जाता है. यह भोज शाकाहारी होता है. इसके अलावा नाऊ-धोबी को भी भोजन कराया जाता है.

इस समाज में शादी की रस्म दो से तीन दिनों तक चलती है. इसमें भी शाकाहारी भोज होता है लेकिन कभी-कभार खुशी से कुछ सामाजिक बंधुओं को मुर्गा खिलाया जाता है. मृत्यु हो जाने की दशा में समाज के लोग दस दिनों तक तालाब में नहाने जाते हैं. इसके बाद भोज होता है.

समाज में अंतरजातीय विवाह पर सख्ती है. इसमें युवक-युवती को घर से निकाल दिया जाता है. उन्हें किसी भी दशा में समाज में रहने की इजाजत नहीं होती है. शराब पर भी पाबंदी है. कोई व्यक्ति शराब पीते पाया गया तो उस पर एक हजार रुपए का जुमार्ना किया जाता है.

कांकेर जिले के कोरर के समीप जंजालीपारा में साल में एक बार ठेठवार समाज की बैठक होती है. यह बैठक फागुन मेले के बाद होती है. इसमें निर्णय लिए जाते हैं और सामाजिक गतिविधियों पर चर्चा होती है.

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