चेंदरू को जानती है दिल्ली ?

Sunday, September 22, 2013

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चेंदरू

केवल कृष्ण
अखबारनवीस हूं तब भी कभी-कभी भीतर से कविता झर जाती है- फूल/ खिल सकता था/ किसी शाही बागीचे में/ इठला सकता था/ अपनी खुशबू औ खूबसूरती पर/ झूम सकता था/ खुद पर लिखी कविताओं पर/ पर वह खिला – दूर, बहुत दूर, घने जंगल के बेहद भीतर/ अपनी पूरी खुशबू और खूबसूरती के साथ/ एक रोज / गुमनाम सा मर गया/ जंगल में अब तक मौजूद है उसकी खूशबू/ जंगल जानता है/ बिखरने से पहले/ फूल कुछ बीज छोड़ गया है.

किसी पत्रकार का कवि की तरह सोचना खबरों के लिए खतरनाक हो सकता है. लेकिन उससे ज्यादा खतरनाक कवि की तरह न सोचना भी तो हो सकता है. चेंदरू की मौत की खबर पर मैं कवि की तरह सोच रहा हूं.

बरसों पहले, चेंदरू पर न्यूज-फीचर लिखने के बाद मैंने सोचा था कि अब उस पर कभी नहीं लिखूंगा. मैंने कभी नहीं लिखा, लेकिन आज जब चेंदरू नहीं है तब बेहद इच्छा हो रही है कि लिखूं.

एक बेहद सफल, बेहद चर्चित अंतरराष्ट्रीय फिल्म के हीरो चेंदरू की जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुमनामी में बिता. कोई नहीं जानता था कि बस्तर के घने जंगल के बहुत छोटे से किसी गांव की झोपड़ी में वह हस्ती रहती है, जिसके लिए दुनिया के बड़े-बड़े शहरों ने अपनी बांहें पसार रखी थीं. उन बांहों को झटककर चेंदरू ने गढ़बेंगाल की ऊंगलियां थाम ली थी. उसने ठीक किया, बिलकुल ठीक किया, वह अपने घर पर अपनों के बीच मरा, वरना चेंदरू जैसे लोग तो अक्सर फुटपाथ पर भी मर जाया करते हैं.

च्वींगम का स्वाद जब चला जाए और चबा-चबाकर मसूड़े थक जाएं तो दुनिया उसे थूक देती है. थूके जाने से पहले चेंदरू अपने गांव लौट आया था. गांव च्वींगम नहीं खाया करते, जो उपजाते हैं उसे आत्मसात कर लिया करते हैं. गढ़बेंगाल में चेंदरू विलीन हो गया, अपनी खूशबू और खूबसूरती के साथ.

बरसों पहले, जब चेंदरू को कोई नहीं जानता था, उस पर लिखा न्यूज फीचर जबर्दस्त हिट हुआ. शीर्षक था-एक टार्जन की कहानी. इस न्यूज फीचर के लिए गढ़बेंगाल जाकर मैं जब लौटा था तो मुझे चेंदरू का किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म का हीरो होना उतना प्रभावित नहीं कर रहा था, जितनी उसकी सहजता कर रही थी. मैं यह सोच-सोच कर रोमांचित हो रहा था कि चकाचौंध को लात मारने के लिए चेंदरू को पांव उठाने ही नहीं पड़े होंगे. वह तो उसकी ठोकर से ही दरकिनार हो गई होगी. उसने अपनी शोहरत को अपनी सहज जिंदगी के रास्ते से ठीक उसी तरह उठाकर फेंक दिया होगा, जैसे जंगल की पगडंडी पर चलते हुए बस्तर के लोग पांव तले आ रहे कांटों को बिनते-फेंकते रहते हैं.

न्यूज फीचर के प्रकाशन के बाद चेंदरू पर खूब लिखा जाने लगा. मुझे सुकून मिलता, लोग गढ़बेंगाल पहुंचते, चेंदरू से उनकी मुलाकातें होतीं…पता नहीं चेंदरू तब क्या सोचता और महसूस करता था. पहली मुलाकात के थोड़े ही दिनों बाद जब मैं दोबारा चेंदरू के घर गया था तब उसकी मां ने मुझसे पूछा था-हमारे बारे में लिखकर तो तुम लोगों ने पैसा कमा लिया, हमें क्या मिला. तरह-तरह के पत्रकारों से मिलते हुए जाने वह कैसा महसूस करती रही होगी. अचानक ‘पीपली लाइव’ का वह परिवार याद आ रहा है, जो अपनी झोपड़ी के बाहर बकरियों को गोद में लिए कैमरों की ओर भौंचक देख रहा है.

…लेकिन चेंदरू को जैसा भी लगे, उस पर लिखा जाना चाहिए था, खूब लिखा जाना चाहिए था. जहां भी उसके बारे में मैं पढ़ता, रोमांचित हो उठता. मैं खुद भी कई बार उस पर लिखने की कोशिश करता लेकिन हर बार अंतरात्मा कहती-अब की बार तुम चेंदरू के लिए नहीं, अपने लिए लिखना चाहते हो. चेंदरू की लघुता की विशालकाय परछाईं में बैठकर अपने शरीर की नाप लेने की हिम्मत मैं नहीं कर पाता था. और अब भी ये सब कहते हुए मुझे कितना संकोच हो रहा है, लग रहा है कि वही कर रहा हूं, जिससे बचने की कोशिश करता रहा.

चेंदरू पर लिखते हुए अनेक लोगों ने मुझे भी याद किया. मैं आभारी हूं. यह भी लिखा गया कि चेंदरू की खोज मैंने की. उन्होंने सही लिखा होगा, लेकिन मुझे ऐसा सोचते हुए कितना बचकाना लगता है. खोज चेंदरू की नहीं थी, अपनी अज्ञानता की थी. अपने जैसे लोगों की नासमझी की थी. चेंदरू तो गढ़बेंगाल में ही था, हम ही उस तक नहीं पहुंच पा रहे थे. उसकी खबरें ही हम तक नहीं पहुंच पा रही थीं. हम ही अनुमान नहीं लगा पाते थे कि दुनिया के सुदूर इलाकों में चेंदरू के बारे में कितना सोचा जाता होगा, जब लोगों के हाथों में वह रंगीन किताब आती होगी जिसके रंगीन पन्नों पर चेंदरू, उसका दोस्त बाघ तंबू और बस्तर की हरियाली बिखरी हुई है. जब चंद्रू पर बनी वह फिल्म प्रोजेक्टर पर चढ़ती होगी तो कितनी ही आंखों से चेंदरू उनके जेहन में समा जाता रहा होगा. मैं, बस्तर और छत्तीसगढ़ के बहुत से लोग, मध्यप्रदेश की सरकार बेसुध थी.

न्यूज फीचर के प्रकाशन के बाद बहुत-सी बातें और भी मालूम हुई. यह कि इस फीचर के लिखे जाने से पहले 80 के दशक में किसी ने किसी किताब में भी चेंदरू का जिक्र किया था. यह कि किसी ने कोई डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई थी. यह कि मध्यप्रदेश के तत्कालीन जनसंपर्क विभाग ने अपनी किसी प्रदर्शनी में चेंदरू की तस्वीरें भी लगाई थीं. लेकिन इन सबके बावजूद आलोक पुतुल ने जब मुझे बस्तर में किसी टार्जन जैसी फिल्म के नायक के होने की सूचना दी थी तो वहां भी इससे ज्यादा कोई सूत्र नहीं था.

बस्तर के दिग्गज पत्रकार स्व.बसंत अवस्थी को ऐसी किसी फिल्म की शूटिंग को याद करने के लिए अपने दिमाग पर बहुत जोर लगाना पड़ा था. विदेशी पर्यटकों के गाइड के रूप में काम करते हुए अपना पूरा जीवन गुजार देने वाले इकबालजी की यादों में दृश्य धुंधले हो चुके थे-उन्होंने ही मुझे बताया था कि फिल्म का नाम टार्जन ट्रुफ था. यह नाम गलत निकला. लेकिन गढ़बेंगाल में महमहा रहे चेंदरू की खुशबू वहां से रिस तो रही थी…हम ही सूंघ नहीं पा रहे थे.

चेंदरू की कहानी को छपे डेढ़ दशक हो चुके हैं. लगभग. इस कहानी को राजीवरंजन और हेमंत पाणिग्रही जैसे संवेदनशील लेखकों ने हवा में बनाए रखा. ग्रामीण पत्रकारों ने सरकारों को खूब झिंझोड़ा. इन कोशिशों से पूरा छत्तीसगढ़ तो चेंदरू से जुड़ गया, प्रशासन बेसुध ही रहा. लाला जगदलपुरी की बदहाली और दयनीय मौत के बाद भी.
मौतें तो दुखद हुआ ही करती हैं, लेकिन कई मौतें ऐसी भी होती हैं, जिनके साथ दयनीय लिखना ठीक लगता है, खासकर तब जब मरने वाला दया की परवाह किए बिना स्वाभिमान की मौत मर रहा हो. और कई बार उन जिंदगियों को भी दयनीय लिखने की इच्छा होती है जो इन मौतों को नहीं समझ पाते.

नारायणपुर के साथी विनय राय ने खबर दी है कि चेंदरू के अंतिम संस्कार के मौके पर कोई नहीं आया. न नेता, न अफसर. न सरकार, न प्रशासन. गांव के ही लोगों से उसे विदाई दी. चेंदरू ने चकाचौंध को बिन कर फेंकते हुए कितना सही फैसला लिया होगा. जिन लोगों पर उसे सबसे ज्यादा भरोसा था, उसने अपनी जिंदगी उन्हीं लोगों के बीच बिताई. आखिरकार वे ही काम आए.

इस वक्त मैं नई दिल्ली में हूं. बरसों पहले जिस टीम ने न्यूज फीचर प्लान किया था उसके एक नेतृत्वकर्ता सुदीप ठाकुर भी यहीं है. विनोद वर्मा यहां हैं. आलोक पुतुल से फोन पर बातें हो रही हैं. राजीव रंजन का आलेख पढ़ रहा हूं. हेमंत पाणिग्रही के साथ लगातार बातें हो रही हैं. हम सब खंगाल रहे हैं कि दिल्ली के अखबारों में क्या कहीं चेंदरू की मौत के बारे में कुछ छपा है. मुझे यहां से पूरा छत्तीसगढ़ गढ़बेंगाल जैसा नजर आ रहा है. एक और आलेख लिखने की इच्छा हो रही है, शीर्षक देना चाहता हूं-तू चेंदरू को जानती है दिल्ली ?

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