लेखक की जाति

Tuesday, April 16, 2013

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कनक तिवारी

कनक तिवारी

छत्तीसगढ़ के एक लेखक बहुत दिनों से साहित्य को लेकर जातीय विमर्श के गंभीर आलोचक और आविष्कारक बने घूम रहे हैं. चेहरे पर सद्भावना का वर्क चढ़ाए वे तथाकथित उच्च वर्गों, जिन्हें कानून अब डर के मारे ‘अनारक्षित वर्ग‘ कहता है; के लेखकों के जातीय उद्भव, विकास और अवधारणाओं को लेकर बेहद उत्तेजित हैं. उनकी समझ है कि लेखन में भी जातीय आग्रह विलुप्त नहीं होते. इसलिए वे उच्च वर्गों द्वारा रचित पूरे साहित्य को खारिज करते चलते हैं.

उनके लिए निराला, पंत, माधवराव सप्रे, मुकुटधर पांडेय, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बलदेव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध, सत्यदेव दुबे, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, विद्यानिवास मिश्र, प्रयाग शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी वगैरह ब्राह्मण ज्यादा हैं, लेखक कम. यदि ये ब्राह्मण नहीं होते तो जो कुछ भी उन्होंने लिखा है, उसके आधार पर उन्हें बड़ा लेखक माना जा सकता था.

उनकी यह भी थीसिस है कि साहित्य के अखाड़े में विवेकानन्द से लेकर प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, कमलेश्वर, दुष्यंत कुमार, श्रीकांत वर्मा, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी‘, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, बेढब बनारसी, निर्मल वर्मा, प्रमोद वर्मा, हरिवंश राय बच्चन वगैरह भी कायस्थ कुलोद्भव होने के कारण कलम रगड़ने को अपना धर्म समझते रहे. इसलिए उन्हें लेखक मान लिया गया होगा.

अद्भुत मित्र की स्थापनाएं हैं कि जिस पिछड़े कुल गोत्र में वे खुद पैदा हुए हैं, उसके लेखन की ओर कुलीन वर्गों ने कभी ध्यान नहीं दिया है. उन्हें तुलसीदास तक से शिकायत है जिन्होंने ब्राह्मण होने के कारण ताड़न के अधिकारी वाली एक खतरनाक चौपाई लिख दी थी. वे क्षत्रिय लेखकों से भी खार खाते हैं. मसलन रामधारी सिंह दिनकर, शमशेर बहादुर सिंह, ठाकुर जगमोहन सिंह, केदारनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, नामवर सिंह, विजय मोहन सिंह, सुभद्राकुमारी चौहान, उदयप्रकाश और विजय बहादुर सिंह आदि आदि. आरोप यही है कि इन लेखकों से क्षत्रियत्व ज्यादा झरता है, बनिस्बत कलाम के.

ऐसी ही तोहमत वे वैश्य कुलदीपकों पर भी लगाने में चूकते नहीं हैं. उनके लेखे गांधी और लोहिया जैसे वणिक और केदारनाथ अग्रवाल या शंभुनाथ गुप्त और भैरवप्रसाद गुप्त आदि आदि दर्जनों लेखक जयशंकर प्रसाद के जमाने से लक्ष्मी-पुत्र होने के कारण अपनी माता की बहन सरस्वती को पटाकर लेखक-वेखक मशहूर हो गए हैं.

उनकी अगुआई में महान लेखकों की बहार आई है. उन्हें कंधे पर झोला लटकाकर खुद का खरीदा गया शॉल, श्रीफल तथा अपनी पुस्तकों सहित देखा जा सकता है. यह साजोसामान वे किसी मंत्री या अधिकारी के बंगले पर जाकर अपनी पुस्तक के विमोचन के नाम पर सौंप देते हैं.

एक ज़माने में बड़े पत्रकारों ने पर्याप्त साहित्य सृजन किया और बड़े लेखक अखबारों के संपादक भी रहे. यह रिवाज तो पूरी दुनिया में रहा है. हिन्दी में भी अज्ञेय, विष्णु खरे, नरेश मेहता, मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय जैसे बीसियों उदाहरण मिलेंगे. फिलहाल देश में कुछ पत्रकार साहित्य संस्थाओं की बड़ी सरकारी कुर्सियों पर लेखक बनाकर फिट कर दिए जाते हैं. कहीं-कहीं हंसोड़ किस्म की तुकबंदियों के सर्जक मुख्यमंत्रियों तक के बगलगीर होकर लेखक कहे जा रहे हैं.

सरकार से पद्म पुरस्कार प्राप्त करने के लिए खुद आवेदन करना होता है. साथ में अपनी प्रतिभा के झूठे प्रमाण पत्र भी नत्थी करने होते हैं. जाहिर है, बड़े लेखक ऐसा नहीं कर पाते. इसलिए उनका नाम चाटुकारिता के सरकारी इतिहास में लिखा ही नहीं जा सकता.

कुछ महान लेखक सरकार को यह कहने मजबूर करते हैं कि वे कालजयी लेखक हैं. इसलिए उनके द्वारा संपादित तथा थैले में लाकर बेची जा रही पुस्तकों में सरकारी विज्ञापन देना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है. विधायकों और मंत्रियों को ये लेखक समझाते हैं कि सत्ताधारी लोग नए मुगल सम्राट अकबर हैं और वे ही लेखक आइने-अकबरी की तरह उनका अमर इतिहास लिखने में समर्थ हैं.

बकौल शरद जोशी अमरता के अहसास की एक न एक भयानक रात हर नेता के जीवन में आती है. वह लेखकीय मकड़जाले में महत्वाकांक्षाओं के कारण मक्खी की तरह फंस जाता है. पूरी दुनिया में मानद उपाधियां देने का चलन अब भी है. कई डी. लिट् और पद्मश्री उन्हें अर्जित उपाधियों को नाम के साथ जोड़कर लिखते हैं यद्यपि उन्होंने थीसिस नहीं लिखी हो.

पहले मुख्यमंत्री तक अपनी नाक साहित्यकार के चरणों पर रखकर उन्हें डी लिट् उपाधि प्रदान करते हैं. नाक और चरण तो अब भी हैं. केवल पोज़ उल्टा हो जाता है. साहित्य सत्कर्म है, कुकर्म नहीं. उसे सत्संगी लोग समझ सकते हैं, साहित्य-कुकर्मी नहीं. ज्योतिबा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कबीर, रसखान, मलिक मोहम्मद जायसी, रहीम, संत विठोबा, काज़ी नज़रुल इस्लाम, चैतन्य महाप्रभु, तिरुवल्लुवर, गुरु घासीदास आदि के नाम क्या समानार्थी नहीं हैं?

फ्रांस के एक लेखक ने अद्भुत बात कही है कि लेखकों का एक ही गोत्र होता है और वह है सरस्वती गोत्र. दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, पिछड़ा वर्ग विमर्श, ब्राह्मण विमर्श, वैश्य विमर्श, क्षत्रिय विमर्श जैसी अभिव्यक्तियां पानी के ऊपर लकीर खींचने जैसी हैं. सभी तरह के पिछड़े वर्गों का आर्थिक, बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक शोषण किया तो गया है. भले ही संविधान सभी को समान अवसर और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देता रहे. वर्णाश्रम व्यवस्था तो कूढ़मगजता है. जाति, धर्म, प्रदेश वगैरह से परे साहित्य का स्वप्निल मनुष्य लोक सदैव रहेगा.

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