Brexit: खुले बाजार के खिलाफ़

Thursday, June 30, 2016

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ब्रिटेन

नंदकुमार कश्यप
आखिरकार 23 जून को ब्रिटेन की 52 फीसद जनता ने यूरोपियन यूनियन से अलग होने मत दिया, इस फैसले ने दुनियाभर में न सिर्फ शेयर बाजारों में हड़कंप मचा दिया वरन् एक तीखी बहस शुरु कर दिया. आखिर ऐसा क्या है कि एक देश द्वारा 28 देशों के एक समूह को छोड़ देने को इतनी गंभीर घटना बना दिया. इसके लिए हमें इतिहास की कुछ गहराइयों में जाना होगा क्योंकि जिस गौरव के सवाल पर अलग होने वोट मांगे गए वो वहीं मिलेंगे.

अठारहवीं सदी तक यूरोप में रूस और फ्रांस बड़ी ताकतें थीं, वहीं रोमन साम्राज्य अपनी यादों को बनाए रखने की कवायद में था. फ्रांस की क्रांति जिसने दुनिया को स्वतंत्रता समानता और भाईचारे (freedom, equality & fraternity) नारा दिया. आधुनिक नवजागरण की शुरुआत की जिसकी विफलता के बाद नेपोलियन की सत्ता स्थापित हुई. अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए वह लगातार युद्ध करते हुए लगभग पूरे पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन को छोड़कर ) पर अपना प्रभुत्व कायम कर चुका था. रूस पर हमले में मुंह की खाने के बाद पुनः पश्चिम का रुख किया और 21 अक्टूबर 1805 को ट्राफलगार में स्पेनिश नेवी के साथ मिलकर पूरे यूरोप की नेवी को नष्ट कर डाला. नतीजा अब ब्रिटेन की रायल नेवी बेहद मजबूत बन गई और अततः 18 जून 1815 को बेल्जियम में वाटरलू के युद्ध में फ्रांस (नेपोलियन) की इंग्लैंड से हार हुई.

इस तरह इंग्लैंड न सिर्फ सैनिक एवं राजनैतिक रूप से मजबूत हुआ वरन् औद्योगिक क्रांति का अगुआ बन गया. नेपोलियन द्वारा बर्बाद यूरोप और अपेक्षाकृत कमजोर अमरीका ने ब्रिटेन को वैश्विक ताकत बनने का सुनहरा अवसर दिया और उसके बाद 250 वर्षो तक ब्रिटेन का सूरज नहीं डूबा. यद्यपि जर्मनी के कारण हुए प्रथम विश्वयुध्द के समय हुए रूसी क्रांति से ब्रिटिश साम्राज्य को बहुत असर नहीं हुआ परंतु पुनः जर्मनी के कारण हुए दूसरे विश्वयुध्द ने ब्रिटेन की रीढ़ की हड्डी तोड़ दिया और उसका साम्राज्य ढह गया साथ ही अमरीका विश्व शक्ति बनकर उभरा.

लगातार युद्धग्रस्त यूरोप को एक ऐसे फोरम की जरूरत थी जो आपसी भाईचारे के साथ आर्थिक अंतर-निर्भरता को भी बनाए रखे. इसी उद्देश्य से 1957 में EEC यूरोपियन इकानामिक काउंसिल का गठन हुआ. इसमें फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम प्रमुख थे.1973 में इसमें ब्रिटेन का प्रवेश हुआ. 1993 में इसके विस्तार हुआ जिसमें पूर्वी यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों की सदस्यता के साथ ही नाम भी बदलकर यूरोपीय यूनियन किया गया और एक करंसी मुक्त सीमाएं यूरोपियन संसद को मंजूरी मिली.

पूर्वी यूरोप के अपेक्षाकृत गरीब नागरिकों के पश्चिम में आगमन ने शुरू में तो इन देशों को सस्ता श्रमिक दिया और उनके विकासदर को बढ़ाया परंतु 2005 के बाद शुरू हुए आर्थिक संकट और 2007 के ‘सब प्राईम संकट’ ने फिर मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया के युध्द से उपजे शरणार्थी संकट ने दक्षिणपंथी नस्लवादी विचारों को पुनर्जीवित कर दिया. मंहगाई, बेरोजगारी, प्राकृतिक लूट से पैदा हुए असमानता तथा वैश्विक आर्थिक मंचों यथा विश्वबैंक-आईएमएफ आदि की लोककल्याण के खर्चों में कटौती की नीतियों ने एक बार फिर से मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बना दिया.

आर्थिक संकट के कारण फ्रांस, ग्रीस, ब्रिटेन, स्पेन आदि देशों में श्रमिकों के साथ ही जनता भी लोककल्याण के योजनाओं में कटौती और घटते वेतन, जीवनस्तर के लिये यूरोपीय यूनियन को जिम्मेदार मानने लगी है. ब्रिटेन में तो राष्ट्रवादी उभार ने नारा ही दिया पुराना गौरव लाओ. इस अभियान में लेबर पार्टी की सांसद जो काक्स को एक अंध-राष्ट्रवादी के हाथों अपनी जान भी गंवानी पड़ी.

ब्रिटेन के इस कदम ने कितने ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यूरोप में एक बार फिर जर्मनी का वर्चस्व होगा क्या तीसरे विश्व युध्द का केन्द्र फिर यूरोप होगा. क्या वैश्विक आर्थिक संकट आपसी सहयोग की संस्थाओं को तोड़ देगा क्या भारत जैसे विशाल विकासशील देश भी इसकी चपेट में आएगा. क्या इस परिघटना के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो जाएगी या ब्रिटेन उसे बहुध्रुवीय बनाएगा. क्या ब्रिक्स और सार्क जैसे आपसी सहयोग के मंचों को खत्म होंगे या उनके मजबूत होने के रास्ते बनेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है अभी किसी भी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी.

लेकिन इतना तय है पूरी दुनिया में वैचारिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है और वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के खिलाफ व्यापक गुस्सा उभरा है. सेंटर फार इकानामिक एण्ड पालिसी रिसर्च वाशिंगटन के सह निर्देशक डीन बेकर का मानना है कि इस घटना के बाद सरकारें रोजगार पैदा करने को संतुलित बजट पर तरजीह देंगी जिससे लोगों के जीवनस्तर में सुधार के साथ विषमता में कमी आएगी. वहीं सीआईए के पूर्व कार्यकारी निर्देशक और जान हापकिन्स स्कूल आँफ एडवांस स्टडीज में विश्लेषक और भारत में अमरीकी राजदूत रहे जाँन मेकलिघन का मानना है इससे रूस खुश होगा और जर्मनी जो अभी भी इस महाद्वीप में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है उसका वर्चस्व फिर से हो जाएगा.

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