काली लड़की नहीं बनोगी एयर होस्टेस

Tuesday, September 16, 2014

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रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ की बेटियों के एयर होस्टेस बनने के सपने हवा में बिखर गये. रमन सिंह सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत इन बेटियों ने हवा में उड़ने और अपने घर-परिवार की मुश्किलें आसान करने के लिये साल भर तक प्रशिक्षण लिया लेकिन प्रशिक्षण ले चुकी सैकड़ों युवतियों को सिर्फ इसलिए नौकरी नहीं मिली कि वे गोरी-चिट्टी न होकर सांवली और काली हैं.

सरकारी महकमा इससे अनजान रहा. अब-जब सैकड़ों युवतियां प्रशिक्षित हो चुकी हैं, उन्हें एयर होस्टेस के बजाय होटलों में मामूली नौकरियां दिलाई जा रही हैं. सरकारी बेपरवाही का नतीजा रहा कि सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च होने पर भी युवतियों को रोजगार नहीं मिला.

छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की युवतियों को स्वावलंबी बनाने की मंशा से एयर होस्टेस डिप्लोमा कोर्स की शुरूआत की थी. वर्ष 2006-07 से शुरू हुई योजना से अब तक प्रदेश की सैकड़ों युवतियां बतौर एयर होस्टेस तैयार हो चुकी हैं. लेकिन रोजगार के नाम पर सबके हिस्से केवल निराशा ही हाथ आई.

आदिवासी विकास विभाग के उपायुक्त जितेंद्र गुप्ता भी मानते हैं कि प्रशिक्षण प्राप्त युवतियों में से किसी को भी एयर होस्टेस की नौकरी नहीं मिली है. वे सरकारी गलतियों को मानने से इंकार करते हैं और कहते हैं कि युवतियों को हॉटल मैनेजमेंट का भी प्रशिक्षण दिया गया था. वे न सिर्फ प्रदेश बल्कि मुंबई जैसे महानगरों के होटलों में नौकरी कर रही हैं.

रंग सांवला है तो हमारी क्या गलती
एयर होस्टेस का प्रशिक्षण हासिल कर चुकी बस्तर की रुखमणि (परिवर्तित नाम) रायपुर के एक तीसरे दर्जे के होटल में वेटर का काम कर रही है. वह अपने हाल के लिए सरकार को कोसते नहीं थकती.

वे कहती हैं- सरकार ने तो हमें ऐसा सब्जबाग दिखाया कि मेरे बैच की 40 युवतियों को सपनों के पर लग गए. सभी आसमान में उड़ रहे थे. लेकिन हमें नीचे आने में भी देर न लगी. अगस्त 2013 में प्रशिक्षण पूरा हुआ. एयरवेज कंपनियां सलेक्शन के लिए आईं. मेरे जैसे दर्जन भर युवतियों को इसलिए नौकरी नहीं दी गई कि हम सब उनके हिसाब से खूबसूरत नहीं हैं. अब हम बस्तर की लड़कियां गोरापन और मेट्रो की लड़कियों जैसी देह कहां से लाएं?

सरकार ने तो हमारे दो साल बरबाद कर दिए
बिलासपुर की रिंकी (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि सरकारी प्रशिक्षण का तो मतलब ही नहीं है. एयर होस्टेस हमारे लिए नया फील्ड था, इसलिए प्रशिक्षण को तैयार हुए. एयर होस्टेस के साथ ही हॉटल मैनेजमेंट का प्रशिक्षण जबर्दस्ती दिया गया. प्रशिक्षण जैसे ही पूरा हुआ रायपुर और केरल के हॉटलों में भेजा जाने लगा. हमें हॉस्पिटालिटी में जाना ही नहीं था. हम अभी भी बेरोजगार हैं और प्रशिक्षण का मतलब भी नहीं रहा. प्रशिक्षण अगस्त से शुरू होकर अगस्त में समाप्त हुआ. इस तरह हमारे दो शैक्षणिक सत्र बरबाद हुए.

मुख्यमंत्री ने भी नहीं सुनी
प्रशिक्षित युवतियों का एक दल मुख्यमंत्री रमन सिंह से अगस्त 2013 में मिला. युवतियों ने सीएम को बताया कि प्रशिक्षण का लाभ ही नहीं मिल रहा है. प्रशिक्षण निजी संस्था दे रही है, जो कि कागजों में संख्या दर्शाकर सरकार का खजाना खाली कर रही है. प्रशिक्षण संस्थान में 30 से 40 युवतियां होती हैं, जबकि सरकारी रिकार्ड में सैकड़ों को प्रशिक्षण लेना बताया जाता है.

एयरवेज कंपनियां ग्रेजुएट और गोरी-चिट्टी लड़कियों को पसंद करती हैं. आदिवासी युवतियां तो सांवली होती हैं. ऐसा प्रशिक्षण दिया ही क्यों गया और अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें एयर होस्टेस की नौकरी दिलाए. युवतियों का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने तमाम बातों की अनसुनी की.

अब सिर्फ होटल मैनेजमेंट

सरकार को योजना शुरू होने के 6 साल बाद ध्यान आया कि एयर होस्टेस का प्रशिक्षण कारगर नहीं है. आदिवासी विकास विभाग ने इस वर्ष से एयर होस्टेस का प्रशिक्षण बंद कर दिया. अब हॉस्पिटालिटी, होटल मैनेजमेंट का ही डिप्लोमा कार्स चलाया जा रहा है. सवाल उन सैकड़ों युवतियों का है, जो प्रशिक्षित हैं. लेकिन ये युवतियां किसी की चिंता में शामिल नहीं हैं.

प्रमुख बातें
योजना 2006-07 से शुरू है.
अनुसूचित जाति और जनजाति की सैकड़ों युवतियों को हर साल प्रशिक्षित करने का दावा.
प्रशिक्षण का खर्च सरकार उठाती है और हरेक युवती पर सालाना 80 हजार रुपए खर्च करती है.

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