3 शिक्षक और 616 बच्चें

Tuesday, December 13, 2016

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बिहार

पटना | मोहम्मद रशीद: वो दोपहर लगभग 12 बजे का समय था जब मैं स्कूल के पास पहुँचा. जैसे जैसे स्कूल की तरफ बढ़ रहा था स्कूल की दयनीय स्थिति साफ होती जा रही थी. कुछ आगे बढ़ने पर गाय- भैंस के दर्शन भी हो गए जो स्कूल परिसर में ही बंधी थी और बार-बार आवाज पर आवाज लगा रही थी. क्या मालुम स्कूल के बच्चो को बुला रही थी या शिक्षको को, तभी अचानक स्कूल के बोर्ड पर नजर पड़ी जहां लिखा था “उत्क्रमित मध्य विद्धालय कुशैल”.

ये बिहार के जिला सीतामढ़ी मुख्यालाय से लगभग 31 किलोमीटर दूर पूरब में पुपरी अंचल के भिट्ठा धरमपुर पंचायत के कुशैल गांव के वार्ड नंबर 14 में स्थित है. लगभग 6 कट्ठे में फैले दो मंजिल विशाल इमारत को देख कर ही लग रहा था कि यहां सब कुछ विशेष होगा. इसी विशेषता को जानने की उत्सुकता लेकर विद्धालय में प्रवेश किया. सबसे पहले मेरी मुलाकात विद्धालय की प्रधान अध्यापक श्रीमती मंजू कुमारी से हुई.

विद्धालय की जानकारी लेते हुए मैंने पूछा विद्धालय की हालत ऐसी क्यों दिख रही है. क्या आप लोगों को इससे परेशानी नहीं होती? थोड़े गुस्से और थोड़ी विनम्रता के साथ उन्होने जवाब दिया “वो तो होगी ही आप ही देखिये विद्धालय के चारों ओर दीवार नही है. इसका अपना रास्ता भी नहीं है जिससे बारिश के मौसम में हम लोगों को आने जाने में बहुत दिक्कत होती है. 616 बच्चों पर सिर्फ दो हैंडपंप लगा हैं जिसमें से एक खराब है. 7 कमरे हैं एक कमरे को हम ऑफिस की तरह इस्तेमाल करते हैं”.

स्कूल का अपना ऑफिस नहीं है क्या? पूछने पर मंजू कुमारी कहती हैं “होता तो हम ऐसा क्यों करते”. अच्छा कितने शिक्षक हैं यहां. “सिर्फ तीन एक मैं, दूसरे शिक्षक राजेश दास जो आजकल अपनी ड्यूटी बीईओ के कार्य़ालय में दे रहे हैं. जबकि तीसरी शिक्षिका शीला कुमारी आज नही आई हैं”. मंजु कुमारी ने जवाब दिया.

बच्चें 616 और शिक्षक सिर्फ तीन? चौंक कर मैने ये सवाल किया. “नहीं नहीं रोज सारे बच्चे थोड़े आते है कम ज्यादा तो होते ही रहता है”. घबराते हुए मंजु कुमारी ने कहा.

तब भी बच्चों को संभालना मुश्किल तो होता होगा? पूछने पर बताया हां ऑफिस से जब लोग आए थें तो बोले थें कि और शिक्षक सब आएगा लेकिन अभी तक कोई आया नही ता हम का करें. जब भी बीईओ के ऑफिस से कोई आता है तब हम सारी समस्याओं को बताते हैं लेकिन कोई कुछ कर ही नही रहा है. ओह और बच्चों का वजन और लंबाई तो बराबर चेक होता होगा ? “हां हर तीन महिने पर तौल लेते हैं अब सभी काम का हम हीं लोग करेंगें”.

फिर स्कूल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए कुछ बच्चों से बात की. जब चौथी कक्षा के सुनील कुमार से पूछा कि “आज कौन सा दिन है” तो वो गुरुवार को शनिवार कह रहा था. दूसरे छात्र ईद मुबारक हुसैन ने बताया कि “यहां पर पढ़ाई ठीक से नहीं होती है. हम लोगों का अलग-अलग क्लास रुम नही है. जो स्कूल नही आता है उसकी भी हाजिरी बन जाती है”.

सांतवी मे पढ़ने वाले सतीश कुमार कहता है “स्कूल मे पहले तीन शिक्षक थें अब दो ही हैं शिक्षक की कमी के कारण सब बच्चों को किसी तरह दो ही क्लास मे पढ़ाया जाता है. इससे हमें बहुत परेशानी होती है. बाकी का कमरा खाली पड़ा है. जिसमें गंदगी के सिवा कुछ भी नही है. विद्धालय परिसर में बहुत कूड़ा कचरा पड़ा रहता है. विद्धालय के चारों ओर दीवार भी नही है जिस कारण सुरक्षा तो दूर की बात है आस-पास के लोग गाय-भैंस को लाकर विद्धालय परिसर में बांध देते हैं, और गंदगी होती है”.

सांतवी कक्षा मे पढ़ने वाली करिशमा कुमारी जिसकी उम्र 14 वर्ष है कहती हैं “यहां लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है. हमें बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. एक ही शौचालय है लेकिन उसमें पानी ले जाने के लिए न तो बाल्टी है न ही मटका. शौचालय से आने के बाद हाथ धोने के लिए साबुन भी नही है”.

13 वर्ष के पप्पू ने बताया “स्कूल में बिजली है, सब कमरें में वाईरिंग भी है लेकिन सिर्फ ऑफिस मे पंखा और बल्ब लगा हुआ है.“

मधु कुमारी कक्षा आठ की छात्रा उम्र 14 वर्ष कहती है “मैडम छोटे बच्चों को तो पढ़ाती ही नहीं और बड़े बच्चों को थोड़ा बहुत पढ़ाती है होम वर्क देने के बाद 6-7 दिनों के बाद ही चेक करती है. रोज रोज नही करती”.

विद्धार्थी संजीव कुमार ने बताया “दो वर्षो में मुश्किल से हम लोगों का वजन तौला जाता है. विनोद, रिंकु कुमारी ने भी यही बताया कि “वजन सही से नही तौला जाता. रिंकु ने ये भी कहा कि “हम लोगो को मिड डे मील रुटीन के हिसाब से नही मिलता है. जिस जिन दाल, चावल, सब्जी बनाना होता है उस दिन चोखा खिचड़ी बनता है. और खाना भी भर पेट नही दिया जाता है. दाल भी बहुत पतली होती है जो खाने में अच्छा नही लगता. सब्जी भी सही से नही बनती है. चावल से कभी कभी बदबू आती है”.

उशा कुमारी चौथी की छात्रा कहती है कि “मीड डे मील सही से नही मिलता खाना अच्छा नही लगता. प्लेट इतना गंदा होता है कि हम लंच के समय घर से ही प्लेट ले आते हैं. स्कूल में साफ सफाई भी नही रहता है बरसात के मौसम में बहुत बदबू आती है”.

पता करने पर पाया कि विद्धालय में खाना बनाने के लिए पांच रसोईयों की नियुक्ति की गई थी. जिसमें से दो रसोईयां ही उपस्थित थें. उन्होने कहा कि “स्कूल की हेडमास्टर स्कूल से घर चली जाती हैं और हमलोग चार बजे तक रहते हैं”.

60 वर्ष के लक्षमण महतो कहते हैं “हमारे तीन बच्चें पढ़ने जाते हैं लेकिन पढ़ाई नही होती. 45 वर्षिय राखी देवी कहती हैं “मास्टर है ही नही है तो पढ़ाई कैसे होगा. मेरे पोते राहुल, और सूरज वहीं पढ़ने जाते हैं. और पोती कहती है कि दादी हम खुद से ही प्लेट धोते हैं”.

भिट्ठा धरमपुर पंचायत के उपमुखिया राम नाथ यादव ने कहा कि “अभी शिक्षक की कमी है उसी हिसाब से पढ़ाई होती है”.

प्रधान अध्यापक की बातें और छात्रों की बातों के बीच का अंतर ये समझने के से काफी है कि स्कूल की वास्तविक स्थिति क्या है.

यूं तो देश के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉक्टर ए.पी.जे अबदुल कलाम आजाद ने सोचा था कि हमारे देश का हर एक नागरिक शिक्षित बने पर “उत्क्रमित मध्य विद्धालय कुशैल” का हाल देखकर ऐसा लगता है कि ये सपना उस समय तक पूरा नही हो सकता जबतक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा हर एक व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार न बन जाये.

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