बिहार: कौन बनेगा गोप का ‘पोप’?

Tuesday, August 25, 2015

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पटना | समाचार डेस्क: बिहार में अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनाव में यादव (गोप) जाति का रुख किस ओर रहेगा, यह सवाल राजनीति से जुड़े लोगों को अभी से मथने लगा है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जहां राष्ट्रीय जनता दल के पारंपरिक यादव मतदाताओं के वोट में सेंध लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है, वहीं वह ऐसे नेताओं की पीठ भी थपथपा रही है, जिसमें यादव मतदाताओं को आकर्षित करने की क्षमता हो.

वैसे इस चुनाव का परिणाम यह तय जरूर करेगा कि क्या लालू प्रसाद पहले की तरह यादवों के वोटों को लेकर महाबली हैं? वैसे कई यादव बिरादरी के नवयुवक अपनी गंवई छवि को तोड़कर लालू को परास्त करने की जुगाड़ में दिख रहे हैं.

बिहार का चुनाव पहले से ही जातीय आधार पर लड़े जाते रहे हैं, और आगामी चुनाव भी इससे भिन्न नहीं होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

पिछले लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पुत्री मीसा भारती भले ही पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार गई हों, लेकिन उस चुनाव में अपनी बिरादरी से मिले समर्थन को आगामी चुनाव में बरकरार रखने को लेकर राजद में ही बहस हो रही है. अगर उन्हें बिरादरी का समर्थन मिलता है तो राजनीति का नक्शा कुछ दूसरा होगा. अगर नहीं, तो यादव राजनीति नए ठौर की तलाश में क्षेत्रीय क्षत्रपों को चुनेगी.

राजनीति के जानकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि आगामी चुनाव में यादव मतों का विभाजन तय नजर आ रहा है. पढ़े-लिखे और यादव बिरादरी के युवा मतदाता लालू से अलग राह अपनाएंगे. अब इनका मत राजग में ही जाएगा या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.

लालू प्रसाद भी अब इस बात को समझने लगे हैं. यही कारण है कि पिछले दिनों अपने ‘दरबार’ में उन्होंने अपने अंदाज में कहा था, “ई झोला में लैपटॉप ले के घूमे वाला लइकन आजकल हमर बाते नइखन सुनत. इनकर आपन दुनिया हो गइल बा.” उनका इशारा साफ तौर पर यादव बिरादरी के पढ़े-लिखे युवकों की ओर था.

इधर, अगर ऐसा है तो यह तय है कि यादव बिरादरी नए नेतृत्व की खोज कर रही है. यदि ऐसा है तो गोप का पोप कौन होगा? यह सवाल हर किसी के लिए दिलचस्प बना हुआ है.

बिहार की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर मानते हैं कि सभी राजनीति दल अब विकास की बात कर रहे हैं, ऐसे में पीछे लौटना किसी भी जाति या बिरादरी के लिए मुश्किल है. अब युवा मतदाता भी विकास को देख रहा है. सीधा और सरल अर्थ यही है कि अब यादव समुदाय आंख बंद कर किसी के पीछे चलने को तैयार नहीं है.

इस बात पर चारों तरफ बहस हो रही है. विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर यादव नेताओं के टूटने, छूटने और जुड़ने का सिलसिला जारी है. साथ ही पर्दे के पीछे जातीय आधार पर चुनावी व्यूह रचना हो रही है.

पिछले दिनों जनता दल युनाइटेड के विधायक अनंत सिंह की गिरफ्तारी को भी लालू का दबाव माना जा रहा है. इसके पीछे माना जाता है कि अनंत सिंह के समर्थन से कहीं बड़ा काम फिलहाल यादव वोटों को एकजुट करना है. महागठबंधन की तरफ से यादव मतदाताओं को एकजुट करने की मुहिम में जुटे लालू प्रसाद को हालांकि विधान परिषद के चुनाव में आशानुरूप सफलता नहीं मिली है.

लालू के ‘हनुमान’ माने जाने वाले रामपाल यादव अब भाजपा में हैं. लालू के साले साधु यादव खुद की पार्टी बनाकर अलग मोर्चा तैयार करने में जुटे हैं. कभी लालू के प्यारे रहे पप्पू यादव फिर से अपनी पार्टी बना चुके हैं.

माना जा रहा है कि अपनी ही बिरादरी में लालू का तिलिस्म बिखरता नजर आ रहा है और उन्हीं के कभी ‘अपने’ रहे नेता अब यादव मतदाताओं पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव कहते हैं, “दुनिया कहां से कहां निकल आई है, लेकिन लालू प्रसाद अब भी गोबर और लाठी की बात करते हैं. उन्हें इस समाज के नवयुवकों के भविष्य की चिंता नहीं है. वे नवयुवकों को इसी लाठी और गोबर में उलझाए रखना चाहते हैं. उन्हें जाति की नहीं, परिवार की चिंता है.”

हालांकि, बिहार के ग्रामीण इलाकों में जिनके घर फूस के हैं और जिनके लिए पटना दुनिया के खूबसूरत शहरों में एक है, उनके नेता अब भी लालू प्रसाद हैं. पर, उनके कई समर्थक इस बात से नाराज हैं कि लालू ने नीतीश कुमार के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है. इससे वे दुविधा की स्थिति में हैं.

इधर, भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद हुकुमदेव नारायण यादव कहते हैं, “जिस पार्टी ने बिहार में लालू प्रसाद का समर्थन किया, प्रदेश में उसकी जमीन सिमटती चली गई. वह कांग्रेस पार्टी हो या वामदल.”

बिहार की राजनीति के जानकार पटना विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य नवल किशोर चौधरी भी मानते हैं कि केवल यादवों में ही नहीं, सभी जातियों के युवा अब पुराने नेताओं के तिलिस्म को तोड़ने के लिए एक नए ‘जादूगर’ की तलाश में हैं, जो न केवल क्षेत्र का विकास करे, बल्कि उनके सपने को भी पूरा करे. पिछले साल के लोकसभा चुनाव परिणामों में इस बात के संकेत मिले हैं.

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