बस्तर के भी अच्छे दिन आएंगे ?

Sunday, May 18, 2014

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छत्तीसगढ़ आदिवासी

सुरेश महापात्र
अगर नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री चाहें तो बस्तर के सपनों को पूरा कर छह दशक के अविकसित क्षेत्र के अभिशाप से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं. शायद तभी बस्तरिया कह सकेगा अच्छे दिन आ गए!

केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के शपथ लेने की पूरी तैयारी हो चुकी है. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद छत्तीसगढ़ की उम्मीदों की झोली के भरने का इंतजार भी शुरू हो चुका है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के कार्यकाल में देश के तीन बड़े राज्यों को काटकर तीन छोटे राज्यों का गठन किया गया. जिसमें उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड, बिहार से झारखंड और मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ का निर्माण किया गया. इन तीनों राज्यों में सबसे ज्यादा संसाधनों से समृद्ध छत्तीसगढ़ के हिस्से में कांग्रेस की सरकार आई. पहले मुख्यमंत्री अजित जोगी ने इस धरा के लिए अमीर धरती के गरीब लोग जैसा नारा भी बुलंद किया.
1 नवंबर 2000 से लेकर 16 मई 2014 तक केंद्र और राज्य के बीच असंतुलन की स्थिति का नुकसान भी प्रदेश को उठाना पड़ा.

राज्य बनने के बाद पहले तीन बरस जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार काबिज रही उस दौरान केंद्र में भाजपा की सरकार थी. इसके बाद 2003 के चुनाव में प्रदेश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत देकर एक प्रकार से अटल जी के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की. इसके बाद 2004 के लोक सभा चुनाव में छत्तीसगढ़ ने प्रदेश की 11 में से १० सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों को चुनकर भेजा. यह भी केंद्र की भाजपा सरकार के प्रति छत्तीसगढिय़ों की कृतज्ञता ही थी. दुर्भाग्य से 2004 में केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए 1 ने सत्ता संभाली.

केंद्र सरकार में मंत्रीपद त्याग कर छत्तीसगढ़ में पार्टी की कमान संभालने वाले डा. रमन सिंह की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि पहले तो दस बरस के पराजय के दंश से पार्टी को बाहर निकाला जाए. इसके बाद पूरे प्रदेश में संगठन को मजबूत कर चुनाव मैदान में उतरने लायक सेना तैयार की थी. परिणाम सकारात्मक निकला. भाजपा ने प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभाल ली.

तब का दिन है और आज तक प्रदेश में भाजपा की सत्ता बनी हुई है. संसद में भाजपा का प्रतिनिधित्व भी जस का तस बना हुआ है. इसके विपरित कई मामलों में प्रदेश उन्नति की ओर अग्रसर हुआ तो कई मामलों में पिछडऩे का दाग भी लगा. विशेषकर नक्सल मोर्चे पर प्रदेश सरकार की विफलता लोगों को परेशान करती दिख रही है. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच सामन्जस्य का अभाव, संसाधनों की उपलब्धता को लेकर केंद्र और राज्य के बीच विवाद, केंद्र और राज्य सरकार की वैचारिक दूरी का सीधा नकारात्मक प्रभाव छत्तीसगढ़ के हिस्से में देखने को मिला.

देश की जितनी भी बड़ी नक्सली हिंसा की घटनाएं बीते 10 बरसों में देखने में आईं हैं. सभी छत्तीसगढ़ के हिस्से में हैं. देश में नक्सल प्रभावित राज्यों की संख्या 9 है. जिसमें पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ प्रमुख हैं. इनमें से केवल छत्तीसगढ़ बड़े हमलों का केंद्र रहा. और तो और इसी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफिले पर नक्सलियों ने हमला कर 32 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. इसमें पीसीसी अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा प्रमुख रूप से गिने जाते हैं.

कांग्रेस ने नक्सली हमले में मारे गए सभी नेताओं को शहीद का दर्जा दिया. केंद्र की कांग्रेस सरकार अपने नेताओं की हत्या का साहसिक विरोध तक दर्ज ना करवा सकी. इसके अलावा सैकड़ों हमले और हजारों मौतों के आंकड़ों को अलग-अलग गिना व बताया नहीं जा सकता. यानी हर हमले के बाद लोगों के हिस्से में राज्य और केंद्र सरकार के बीच विवाद के सिवाए नतीजा कुछ नही निकल सका.

अब यहां के लोगों को उम्मीद है कि केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार आने के बाद छत्तीसगढ़ में माओवादियों से निपटने में दोनों सरकारों के बीच ताल-मेल का फायदा मिलना चाहिए. कम से कम अगली बार विधानसभा चुनाव 2018 में जनादेश पाने के लिए माओवादी मोर्चे पर मिलने वाली असफलता को केंद्र की झोली में डालने से काम नहीं चलने वाला.

वैसे भी माओवादी हिंसा का सीधा प्रभाव छत्तीसगढ़ के बस्तर वाले हिस्से में ही ज्यादा पड़ा है. यहां औद्योगिक विकास की गति थम गई है. सिवाए एनएमडीसी कोई दूसरी बड़ी परियोजना के सक्रिय नहीं होने के कारण यहां के खनिज संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है. राज्य सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में बस्तर में उद्योग लगाने के लिए टाटा और एस्सार के साथ एमओयू साइन किया था. यहां के लोगों को लगता है कि इन परियोजनाओं को हकीकत में बदलने में माओवादी बड़ा रोड़ा बनते रहे हैं. यही स्थिति दल्लीराजहरा-जगदलपुर रेल लाइन के मसले को लेकर भी है. करीब 3 दशक से यह मांग हर चुनाव में मुद्दा रही है पर नतीजा सिफर रहा है. रेल मार्ग मांगने पर सर्वे तक का सफर पूरा हो सका है.

समूचे बस्तर को रेल मार्ग से जोड़कर विकास की दिशा निर्धारित की जा सकती है. दंतेवाड़ा से बीजापुर होकर महाराष्ट्र, दंतेवाड़ा से सुकमा-कोंटा होकर आंध्र प्रदेश, जगदलुपर से दल्ली राजहरा होकर छत्तीसगढ़ से सीधा रेल संपर्क स्थापित किया जा सकता है. भारत के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे बस्तर का दौरा किया है. वे दस बरस के भाजपा सरकार के कार्यकाल में कई मौकों पर बीजापुर से कांकेर तक सभाओं को संबोधित कर चुके हैं. उन्होंने इस इलाके को बेहतर तरीके से जानने का दावा भी अपनी सभाओं में किया है.

यह बड़ी उपलब्धि है कि पहली बार ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री का पद मिला है, जो यहां की परिस्थितियों से सीधे तौर पर वाकिफ हैं. अगर नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री चाहें तो बस्तर के सपनों को पूरा कर छह दशक के अविकसित क्षेत्र के अभिशाप से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं. शायद तभी बस्तरिया कह सकेगा- अच्छे दिन आ गए !
*लेखक दंतेवाड़ा से प्रकाशित बस्तर इंपैक्ट के संपादक हैं.

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