बैगा जनजाति का पट्टा सत्याग्रह जारी

Monday, December 30, 2013

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बैगा आदिवासी महिला

मंडला | एजेंसी: मध्य प्रदेश में होने वाले सत्याग्रहों की श्रृंखला में अब ‘पट्टा सत्याग्रह’ भी जुड़ गया है. यह सत्याग्रह खेती के लिए जमीन का पट्टा पाने के लिए समाज का सबसे कमजोर वर्ग बैगा जनजाति कर कर है. बीते 15 माह से पट्टा सत्याग्रह कर रहे जनजातीय वर्ग को अब तक राज्य सरकार से सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है.

देश की जनजातियों में सबसे पुरातन जनजाति में से एक है बैगा, इस जनजाति का अस्तित्व खतरे में होने के कारण केंद्र सरकार ने इसे सुरक्षित रखने के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं और इसीलिए इस जनजाति के लोगों को राष्ट्रीय मानव घोषित किया है.

इसके विपरीत इस जनजाति के परिवार इन दिनों मध्य प्रदेश के मंडला जिले में गंभीर संकट से गुजर रहे हैं, क्योंकि उन्हें वन भूमि पर खेती करने की इजाजत नहीं मिल रही है.

बैगा जनजाति वर्ग के लोग वन भूमि पर अलग तरह से खेती करते हैं. वे जमीन जोतने के लिए हल आदि का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि वे धरती को मां मानते हैं और उनकी नजर में हल चलाना मां के सीने पर चाकू चलाने जैसा है. लिहाजा, हर वर्ष उनका खेती का क्षेत्र बदलता रहता है.

मंडला के वन विभाग ने जनजाति के जंगल में खेती करने पर रोक लगा दी. इसके चलते यह परिवार अपनी परंपरागत खेती से वंचित हो गए हैं. इस कार्यवाही के विरोध में और भूमि अधिकार पाने के लिए मथना गांव के लगभग 40 परिवारों के 140 लोग अगस्त 2012 से ही पट्टा सत्याग्रह कर रहे हैं. इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

पट्टा सत्याग्रह कर रही सुशीला बाई का कहना है कि प्रशासन ने न केवल उन्हें वन भूमि पर खेती करने से रोका है, बल्कि उनकी खड़ी फसल को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया है. उनका आरोप है कि वन अमले ने उच्च वर्ग के कुछ लोगों के इशारे पर जानवरों के जरिए उनकी फसल नष्ट कराई है.

सत्याग्रह कर रहे परिवार दिन मंे एक बार भोजन करते हैं और अपने परिवार के सदस्यों के साथ न्याय हासिल करने जंगल की उसी जमीन पर रातें बिता रहे हैं, जहां पर उगी उनकी फसल को नष्ट किया गया है.

विभिन्न वन कानून के तहत वन विभाग ने वन भूमि पर खेती करने से जनजाति वर्ग को रोक दिया है. आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्होंने प्रशासन से जमीन का पट्टा मांगा है, ताकि वे खेती कर अपना और परिवार का पेट भर सकें, मगर उनकी नहीं सुनी गई.

बैगा जनजाति के मुखिया कारेलाल का कहना है कि ग्रामसभा ने उन्हें पट्टा देने का प्रस्ताव पारित किया है. इसके बावजूद उनकी मांग अनसुनी की जा रही है. भोपाल के जम्बूरी मैदान में आयोजित पंचायत में वे अपनी मांग से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी अवगत करा चुके हैं, मगर मांग अब भी पूरी नहीं हुई है.

कारेलाल का आरोप है कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद भी उन्हें पट्टा नहीं दिया गया और उन्हें उनके घरों से बाहर कर दिया गया है. उनका कहना है कि वे भूमि अधिकार मांग रहे हैं और प्रशासन उन्हें सामुदायिक भूमि अधिकार दे रहा है. इस स्थिति में उनका जीवन ही संकट में पड़ गया है, लिहाजा उनके लिए सत्याग्रह करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. जब तक न्याय नहीं मिलेगा तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा.

महत्वपूर्ण बात यह है कि जनजाति वर्ग जंगल में रहता है और उसका समाज के अन्य वर्गो से कोई जुड़ाव नहीं होता. लिहाजा, उनकी आवाज सुनने को कोई तैयार नहीं होता. सत्याग्रह कर रही राधा बाई का कहना है कि वे इस जंगल से बाहर नहीं जाएंगी, भले ही मर जाएं.

मंडला के जिलाधिकारी लोकेश जाटव का कहना है कि प्रशासन ने बैगा जनजाति को सामुदायिक भूमि अधिकार दे दिया है, इसमें उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. जिला प्रशासन के इस फैसले को सत्याग्रह कर रहे परिवार नाकाफी मान रहे हैं.

राज्य में हक की लड़ाई के लिए अब तक हुए जन सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, चिता सत्याग्रह के बाद हो रहा पट्टा सत्याग्रह राज्य सरकार को नई चुनौती पेश कर सकता है. अब देखना है कि जनजाति के इस सत्याग्रह का सरकार पर कितना असर होता है.

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