मुल्क की सेहत सुधारने हड़ताल

Wednesday, August 31, 2016

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हड़ताल

बादल सरोज
2 सितंबर की आम हड़ताल दरअसल देश की सेहत सुधारने के लिये किया जा रहा है. 2 सितम्बर की मांगों पर सरसरी निगाह डालकर अर्थशास्त्र की बारहवीं कक्षा का छात्र भी समझ सकता है कि यहां सवाल वेतन-भत्ते बढ़वाने के माइक्रो-इकोनॉमिक्स का नहीं, समूचे मुल्क की सेहत सुधारने वाले मैक्रो-इकोनॉमिक्स का है. और मैक्रो इकोनॉमिक्स के बड़े सवाल जोर से बोलकर और अपनी हठ पर अड़कर नहीं, धीमे और मजबूती से उपाय उठाके, रास्ता बदलकर हल किये जाते हैं.

अगले दो दिन में सरकारी और कारपोरेट मीडिया के हमलेवाराना प्रचार के जरिये 2 सितम्बर की अखिल भारतीय हड़ताल के बारे में मुमकिन है कि प्रधानमंत्री मोदी के रणनीतिज्ञ हजार गलतफहमियां फैला ले. मोर्चा जीतने का भ्रम पाल ले. मगर इस विराट विरोध कार्यवाही के मुद्दों की अनदेखी करके यह मुल्क जरूर युध्द हारने की कगार पर पहुँच सकता है.

वित्तमंत्री ने मंगलवार की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में आभासीय दस्तरखान पर जिन ख्याली पुलावों की प्लेटें सजा रहे थे, श्रमिक संगठनों द्वारा उसे ठुकराया जाना स्वाभाविक था क्योंकि, उनमे चावल से दिखते कंकरों के सिवा कुछ नहीं था. जेटली की उक्तियों में गोयबल्स सशरीर उपलब्ध थे, अपनी उक्ति “झूठ जितना बड़ा होगा उतना ज्यादा स्वीकार्य होगा” के साथ.

यह कहना बिलकुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 2 सितम्बर की हड़ताल, हाल के दौर की, सबसे मुखर देशभक्तिपूर्ण कार्यवाही है. देश नदी, पहाड़, जंगल, खँडहर मंदिर, वीरान मस्जिद, कपोल कल्पनाओं, पवित्र और अपवित्र जानवरों का समुच्चय नहीं होता. ऐसा होता तो पृथ्वी का सबसे बड़ा देश अंटार्कटिका, सौरमंडल का सबसे विराट देश जुपिटर को होना चाहिए था. देश होता है उस भूगोल पर बसी जनता, भारत देश के शक्तिशाली होने का अर्थ है 120+ करोड़ जनता का पुष्ट, स्वस्थ और कार्यक्षम होना. 2 सितम्बर की 12 मांगें इसी स्थिति को हासिल करने की मांगें हैं.

आंकड़ों के बोझ के बिना भी देखा और समझा जा सकता है कि रोजगार विहीन विकास रोजगारछीन विकास बन कर रह गयी है. नोटों की गड्डी मोटी होने के बावजूद वास्तविक आय घट गयी है. मतलब उन नोटों की खरीदने की ताकत सिकुड़ गयी है. गाँव में रहने वाले 70 फीसद और शहर में रहने वाले 65 फीसद हिन्दुस्तानी आज से 40 वर्ष पहले जितना खाते थे, अब उससे काफी कम खा पा रहे हैं. यह असाधारण और चिंताजनक गिरावट है. हड़ताली मजदूर संगठन इसके समाधान के लिए मार्क्स से सीखने की नहीं 1930 में पूंजीवाद को पुनर्जीवन देने वाले अर्थशास्त्र कीन्स के पुनर्पाठ की सलाह लेकर आये हैं. जिसने रोजगारसृजन और आमदनी वृध्दि को अर्थव्यवस्था की संजीवनी बताया था.

एफडीआई, चौतरफा विदेशी निवेश पर मयूरनृत्य कर रहे हुक्मरानों को लातिनी अमरीकी देशों के विकल्प को समझाना तनिक दूर की बात होगी. मगर यहां चाणक्य उर्फ़ कौटिल्य बाबा की हिदायत याद दिलाने में हर्ज़ नहीं है जिन्होंने कहा था कि राज्य के बाहर के व्यापारियों को शह देना खुद अपनी नींव को कमजोर करना होता है.

बात-बात में रणभेरी फूंकते, झाँझ मंजीरे लिए घूमते इन स्वयम्भू राष्ट्रभक्तों ने पता नहीं मैकियावली पढ़ा है कि नहीं जिसके मुताबिक़ असली युध्द शांतिकाल में, खेतों, उद्योगों और आर्थिक संस्थानों में लड़ा जाता है. जो आतंरिक शक्ति की मजबूती के मोर्चे की अनदेखी कर देते हैं वे युध्द के एलान से पहले ही राज्य को हार की कगार पर पहुँचा देते हैं. इस लिहाज से 2 सितम्बर की हड़ताल एक प्रकार से एक पखवाड़े बाद पड़ने वाला 15 अगस्त है, जिस दिन देश का मजदूर लालकिले की जगह जनपथ पर सलामी लेकर मुल्क को बचाने की शपथ लेगा.

1991 में, यही श्रम संगठन थे जिन्होंने कहा था कि सारे खजाने और नवरत्नों को हथिया कर, आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्लूटीओ के ठग जिस सबसे सुन्दर और महंगे परिधान को बनाने का दावा कर रहे हैं, उसे पहनकर राजा निर्वस्त्र और नग्न ही दिखेगा. आज वह आशंका मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात, कृषि, रोजगार सृजन, ग्रीन फील्ड विदेशी निवेश यहां तक कि सटोरिया मार्केट तक में पूंजी आगमन में सतत गिरावट के रूप में जाहिर उजागर हो कर दिखाई दे रही है. जरूरत इस फिसलन को थामने की है न कि लगातार हारते जुआरी की तरह ब्लाइंड पर ब्लाइंड खेलने की.

आभासीय आंकड़ों से गढ़ी जीडीपी की झीनी चदरिया से यह नग्नता नहीं ढंकेगी, डॉलर अरबपतियों की कुकुरमुत्ता बागवानी से सवा सौ करोड़ आबादी हरियाली चादर नहीं ओढ़ सकेगी. जरूरी है झटके के साथ कुमार्ग को छोड़ राह पर आना. 15 से 20 करोड़ मजदूर कर्मचारी 2 सितम्बर को ऐसे ही ट्रैफिक हवलदार की भूमिका निबाहेंगे.

समाजवाद ने भले उसे उसके सच्चे शीर्ष पर पहुंचाया हो मगर सभ्य समाज में लोकतंत्र पूंजीवाद अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए लाया था. उन्हें पता था कि गुलामी के अहसास से थके मांदे शरीर और मस्तिष्क न रचनात्मक सृजन कर सकते हैं न गुणवत्ता दे सकते हैं. नतीजे में श्रम आंदोलन ने अनगिनत अधिकार जीते, श्रम अधिनियम अस्तित्व में आये. उदारीकरण के शाप से मन्त्रबिद्द सरकारें इन्हें काँटछांट कर छीनने पर आमादा है.

गुलाम आबादियों के कन्धों पर न तो विकास की मीनारें तनती है और न नये समाज खड़े होते हैं. भारत की आज़ादी की लड़ाई इस शर्त से वाकिफ थी. भगत सिंह ने असेम्बली पर बम फैंकने का दिन वही चुना था जिस दिन मजदूरों के हकों को कुचलने वाला ट्रेड डिस्प्यूट बिल और लोकतांत्रिक विरोध पर अंकुश लगाने वाला पब्लिक सेफ्टी बिल रखा जा रहा था.

2 सितम्बर इसी तरह की ज्यादा बड़ी कार्यवाही है. जो दीवार पर लिखी इबारत पढ़ लेते हैं वे मील के पत्थरोँ के रूप में याद किये जाते हैं. जो नहीं पढ़ते उन्हें इतिहास टनों मिट्टी धूल के नीचे दफ़्न कर देता है. यह हुक्मरानों को चुनना है कि वे इतिहास के किस पन्ने पर रहना चाहते हैं?

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