छत्तीसगढ़ में विस्थापन पर एमनेस्टी नाराज़

Friday, September 5, 2014

A A

कोल ब्लॉक विस्थापन

रायपुर | संवाददाता: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छत्तीसगढ़ में कोयला खदानों से विस्थापित आदिवासियों को लेकर चिंता जताई है. एमनेस्टी ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में राज्य के स्वामित्व वाली कोयले की खान के पास रहने वाले अधिकारहीन समुदाय के हज़ारों लोगों पर जबरन बेदखल करने का खतरा मंडरा रहा है.

संगठन ने कहा है कि 28 अगस्त 2014 को अधिकारियों ने कोरबा के पूरनी गांव में घर गिराने का काम शुरू किया. ये प्रक्रिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खनन कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा गेवरा की खदान के विस्तार के लिए किए जा रहे प्रयासों का हिस्सा है. 28 अगस्त को दो घर गिरा दिए गए और आगे और लोगों को बेदखल किए जाने की आशंका है.

एमनेस्टी ने अपने बयान में कहा है कि अधिकारियों ने एसईसीएल की कोरबा स्थित उसकी कोयले की खान में उत्पादन 35 एमटीपीए से 40 एमटीपीए बढ़ाने तक के लिए स्वीकृति दे दी है, जिससे कोरबा के 18 से अधिक गांवों में 5000 से अधिक लोगों को उनके घरों व ज़मीनों से बेदखल किया जा सकता है. जो लोग बेदखल किए जा सकते हैं, उनमें कंवर, गोंड, कोरवा आदिवासी और दलित परिवार शामिल हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की व्यापार एवं मानव अधिकार शोधकर्ता अरुणा चंद्रशेखर ने कहा, “28 अगस्त को जिन लोगों को बेदखल किया गया है, वो नियमत: परामर्श, पर्याप्त नोटिस या मुआवज़े या पर्याप्त वैकल्पिक आवास की व्यवस्था के बिना किया गया है. ज़बरन लोगों को बेदखल किया गया, जो कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत निषिद्ध है.”

चश्मदीद गवाहों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया कि एसईसीएल के सुरक्षा कर्मियों और पुलिसकर्मियों ने हरदीबाजार पुलिस चौकी के अंतर्गत ग्राम पोड़ी में 28 अगस्त को लोगों को सामान निकालने का पर्याप्त समय दिए बिना ही उनके घरों से ज़बरन बेदखल कर दिया. इस अवसर पर राज्य और एसईसीएल के अधिकारी, पुलिस समेत मौके पर मौजूद थे.

एक 27 वर्षीय महिला बबीता आदिले, जिसका घर गिरा दिया गया, ने कहा, “हम अपने रिश्तेदारों के साथ तीज मना रहे थे. जब मैं बाहर निकली मैंने देखा कि बहुत सारे पुलिसवालों ने मेरा घर घेर लिया है. मुझे एक दिन का नोटिस भी नहीं दिया गया. जब मैंने विरोध किया और बेदखल करने का नोटिस दिखाने के लिए कहा तो पुलिस ने मुझे घसीटकर एक तरफ कर दिया. घर के अंदर रखी हमारी कुछ चीज़ें नष्ट हो गई.”

उनके पड़ोस में रहने वाले राम प्रसाद, जिनका घर भी गिरा दिया गया, ने कहा, “जब बबीता को पीटा जा रहा था और पुलिस उसके घर में घुस रही थी, तब हम डर गए. हम अपना जो भी सामान उठा सकते थे, हमने उठाया और अपने घर से बाहर भागे.”

दूसरे गांववालों ने भी कहा कि उन्हें बेदखली का कोई नोटिस नहीं मिला. स्थानीय सरकारी अधिकारियों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया कि उन्हें नहीं मालूम कि बेदखली से संबंधित कोई ख़ास नोटिस भेजा गया था या नहीं.

भारत की सबसे बड़ी खुली खुदाई वाली कोयला खानों में से एक गेवरा खान का विस्तार, आगे हज़ारों परिवारों को प्रभावित करेगा, जो पहले से ही वायु प्रदूषण, अपने जल संसाधनों की कमी और सार्वजनिक ज़मीन की क्षति से प्रभावित हैं. भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कोरबा को देश के सबसे गंभीर प्रदूषित क्षेत्रों में स्थान दिया हुआ है.

कोरबा ज़िले को भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘अनुसूचित क्षेत्र’के रूप में संरक्षित किया गया है, जहां आदिवासी समुदाय रहते हैं. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) अधिनियम के अंतर्गत, इन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के पास विकास परियोजनाओं हेतु जमीन के अधिग्रहण या लोगों के पुनर्वास से पहले जनसुनवाई करने का अधिकार प्राप्त है. राज्य के अधिकारियों ने इस तरह की जनसुनवाई ही नहीं की.

अधिकारी यह सुनिश्चित करने में भी असफल रहे कि खान के विस्तार के लिए निकासी से पहले सार्वजनिक ज़मीन पर स्थानीय समुदायों के वैध दावे स्वीकृत किए गए थे या गैर वन उद्देश्यों के लिए वन का इस्तेमाल करने से पहले समुदायों की सहमति मांगी गई या नहीं, जैसा कि भारतीय वन अधिकार अधिनियम के लिए आवश्यक है.

कोरबा के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी चौहान ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया “कोरबा के एक संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद, समुदायों के अधिकारों का सम्मान किए बिना ही उन्हें बेदखल किया जा रहा है. कानून का पालन करने के बजाय एसईसीएल ये दावा कर रहा है कि पेसा ऐक्ट उन पर लागू नहीं होता.”

एमनेस्टी की अरुणा चंद्रशेखन ने कहा, “छत्तीसगढ़ सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन्हें जबरन बेदखल किया गया है, उन्हें प्रभावी सहायता मिले और उनकी हानिपूर्ति हो. सरकार को ज़बरदस्ती बेदखली करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करनी चाहिए. जब तक कि समुदायों को जनसुनवाई के अधिकार और मुफ्त, पूर्व व सूचित सहमति का सम्मान न किया जाए, तब तक और बेदखली नहीं होनी चाहिए.”

Tags: , , , , , , , , , , ,