अमित शाह बने भाजपा के बादशाह

Wednesday, July 9, 2014

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अमित शाह

नई दिल्ली | संवाददाता: अमित शाह को भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया है. अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाये जाने की अटकलें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही शुरु हो गई थी. माना जा रहा था कि अगर अमित शाह को सरकार में कोई पद नहीं मिला तो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर उनकी ताजपोशी की जाएगी.

गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह ने भी आज कहा कि अमित शाह के नाम की घोषणा केवल औपचारिकता भर है. अमित शाह की ताजपोशी के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के अधिकांश शीर्ष नेता उपस्थित थे.

बीबीसी के अनुसार अमित शाह की ज़िंदगी तीन शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती है- मोदी, एनकाउंटर और यूपी, लेकिन उनके क़रीबी लोग बताते हैं कि चुनौतियों और अवसरों को पहचानने में शाह का जवाब नहीं है.

एक स्टॉक ब्रोकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य अमित शाह आज भाजपा में किसी का भी स्टॉक ऊपर ले जा सकते हैं और किसी को भी सियासी दौड़ से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं. गुजरात की राजनीति में ऐसा कम ही है, जब किसी व्यापारी के बेटे ने सियासी दांवपेंच में माहिर होने की शोहरत हासिल की हो.

व्यापारी अनिलचंद्र शाह के यहां जन्मे अमित शाह आज भाजपा के सेनापति बन चुके हैं. साइंस स्नातक कॉलेज में छात्र नेता रहे अमित शाह, संघ की शाखाओं में बचपन से ही जाते थे और राजनीति में आने से पहले एक स्टॉक ब्रोकर थे.

शाह के क़रीबी कहते हैं कि उन्होंने धीरूभाई अंबानी और अन्य धनी व्यापारियों से प्रेरित होकर प्लास्टिक का धंधा शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उन्हें लगने लगा कि बिना सरकारी मदद के कोई भी बड़ा उद्योग खड़ा करना मुश्किल है.

एक वरिष्ठ संघ प्रचारक ने 26 वर्ष के युवा शाह को उस समय तक संघ और भाजपा में अपनी पैठ बना चुके 41 वर्षीय नरेंद्र मोदी से मिलवाया था. मोदी उन दिनों अपनी टीम बना रहे थे और उन्हें युवा शाह के आत्मविश्वास ने काफ़ी प्रभावित किया.

शाह ने मोदी से लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रचार संभालने की इच्छा जताई.

शाह ने कहा कि उनके पिता माणसा, जो गांधीनगर लोकसभा क्षत्र में आता है, के एक प्रतिष्ठित व्यापारी रहे हैं और वह गांधीनगर के राजनीतिक समीकरणों से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं. आडवाणी के उस चुनाव के बाद शाह ने पार्टी में अच्छी पहचान बना ली. भाजपा और गुजरात की राजनीति को क़रीब से देखने वाले कई लोग मोदी और शाह के रिश्ते को 1980 और 1990 में आडवाणी और मोदी के रिश्ते जैसा बताते हैं.

शायद यही कारण है कि मोदी को शाह में अपने उस युवा जोश की झलक दिखी और उन्होंने अपना अभिन्न सहयोगी बना लिया.

साल 2001 में जब केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उससे पहले ही उन्होंने अमित शाह को एक कद्दावर नेता बना दिया था. शाह 1995 में गुजरात स्टेट फाइनेंसियल कारपोरेशन के चेयरमैन बनाए गए. इस पद पर रहते हुए वो कुछ खास असर नहीं दिखा पाए, लेकिन यहां रहते हुए उनकी नज़र गुजरात के कोऑपरेटिव बैंक सेक्टर पर पड़ी. बस कुछ दिनों में वो अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक के मुखिया बन गए.

उन्हीं दिनों गुजरात में मोदी का बढ़ता विरोध देखकर पार्टी ने उन्हें दिल्ली बुला लिया. लेकिन गुजरात में रहते हुए शाह मोदी के आँख-कान बने रहे और गुजरात की राजनीति की पल-पल की ख़बर उन्हें पहुँचाते रहे.

शाह ने इस दौरान गुजरात के कोऑपरेटिव बैंक और मंडलियों पर, जिस पर वर्षों से कांग्रेस का क़ब्ज़ा था, अपनी पकड़ मज़बूत करनी शुरू कर दी. साल 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की दोबारा सरकार बनी तो क्षमता, सूझबूझ और वफ़ादारी देखते हुए सरकार में सबसे कम उम्र के शाह को गृहराज्य मंत्री बनाया गया.

शाह को सबसे अधिक दस मंत्रालय दिए गए और उन्हें दर्जनों कैबिनेट समितियों का सदस्य बनाया गया. उन दिनों यह चर्चा थी कि शाह पर ये मेहरबानियां केशुभाई को हटाने में मदद करने के इनाम के रूप में की गई थीं.साल 2002 में अमित शाह को पार्टी ने सरखेज विधानसभा से टिकट दिया. चुनाव में वह रिकॉर्ड एक लाख 60 हजार मतों से जीत कर आए. जीत का यह आंकड़ा नरेंद्र मोदी की चुनावी जीत से भी बड़ा था. यह 2007 में जाकर 2 लाख 35 हजार पर पहुंच गया.

मोदी शाह के चुनावी दांवपेंच के प्रशंसक बन गए थे. मोदी मंत्रिमंडल में अमित शाह जल्द ही सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे. फिर क्या था ‘जो हुकुम मेरे आका’ के तर्ज पर शाह मोदी के हर मंसूबे को अंजाम तक पहुँचाते रहे.

चाहे गुजरात की कोऑपरेटिव मंडली हो या सरकारी-निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की यूनियन, शाह ने भाजपा का झंडा हर जगह लहराया. शाह मोदी के कवच बन चुके थे और और फिर चाहे पुलिस अफ़सर हों या विपक्ष के नेता या गुजरात भाजपा में मोदी विरोधी, शाह ने सभी को मोदी के आदेश मानने को मजबूर कर दिया.

राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि शाह जैसी माइक्रो मैनेजमेंट और चुनाव के वक़्त बूथ मैनेजमेंट की क्षमता कम ही लोगों में है.

एक बार मोदी ने शाह से गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन में कांग्रेस की पकड़ के बारे में चिंता जताई. फिर क्या था, शाह ने 2009 में मोदी को जन्मदिन के तोहफ़े के रूप में एसोसिएशन का अध्यक्ष पद दिया और ख़ुद उपाध्यक्ष बन गए.

हालांकि शाह और मोदी के एसोसिएशन में आने से क्रिकेट का माहौल बिगड़ सा गया और राज्य का एक भी नया खिलाड़ी टीम इंडिया में अपनी जगह नहीं बना पाया. मोदी मानते थे कि जब तक पुलिस और सरकारी अधिकारी उनके साथ नहीं होंगे वह राज्य में लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे.

एक पुलिस अधिकारी का कहना है, “शाह और मोदी ने 2005-06 से भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की जानकारी इकट्ठी करनी शुरू कर दी थी और इसके लिए सरकारी और निजी साइबर क्राइम एक्सपर्ट्स की भी मदद ली गई थी.”

अमित शाह और नरेंद्र मोदी के जीवन में कई समानता है. दोनों ने क्लिक करें आरएसएस की शाखाओं में जाना बचपन से शुरू कर दिया था और दोनों ने अपनी जवानी में अपने जोश और कुशलता से वरिष्ठ नेताओं को प्रभावित किया था.

हालांकि शाह और मोदी के जीवन में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया जब उन्हें गुजरात से बाहर निकला गया.

जहां मोदी को गुजरात में उनके ख़िलाफ़ बढ़ते विरोध के चलते निकाला गया, वहीं, शाह को सोहराबुद्दीन शेख फ़र्जी एनकाउंटर केस में आरोप लगने के बाद कोर्ट के आदेश पर तड़ीपार किया गया.

अमित शाह अभी उस केस में ज़मानत पर चल रहे हैं. इसी मामले में पकड़े गए गुजरात के दर्ज़नों पुलिस अधिकारी जेल में हैं. शाह को जब गुजरात से निकाला गया, तब उन्होंने अपना डेरा दिल्ली में स्थित गुजरात भवन में डाला. यहां रहते हुए वह भाजपा के बड़े नेताओं के क़रीब आते गए और मोदी के लिए दिल्ली आने के रास्ते बनाते गए.

जब भाजपा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बना रही थी, तब मोदी और शाह जानते थे कि यूपी जीते बिना दिल्ली की कुर्सी पाना नामुमकिन जैसा है. तब शाह यूपी जाना नहीं चाहते थे, पर गुजरात में आनंदीबेन पटेल और अन्य खेमों की गुजरात भाजपा में बढ़ती पकड़ देख उन्होंने यह चुनौती स्वीकार कर ली.

पार्टी की यूपी की कमान संभालते ही शाह एक राज्य के नेता से राष्ट्रीय नेता बन गए. हालांकि, शाह के गुजरात से बाहर रहने के दौरान उनके पुत्र जय पार्टी के भीतर और बाहर अपनी जगह बना रहे हैं. जय हाल ही में गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी बने हैं और टीम के चुनाव में बेहद दिलचस्पी रखते हैं, जिससे वरिष्ठ खिलाड़ी ख़ासे नाराज़ भी हैं.

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