जोगी होने का मतलब-2

Friday, October 17, 2014

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अजीत जोगी दिग्विजय सिंह

दिवाकर मुक्तिबोध
राजीव गांधी से दोस्ती
एक राजनेता के रुप में उनके करियर की शुरुआत जिस तरह हुई, यह विवादास्पद है. जोगी का अपना दावा है कि वे राजनीति में स्वेच्छा से नहीं आए, वे लाए गए. हालांकि राजनीति उन्हें प्रिय थी. कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए रास्ता बनाया गया और माकूल समय सन 1986 में उन्हें राज्यसभा के जरिए राजनीति के समुद्र में तैरने के लिए धकेल दिया गया.

राजीव गांधी से उनके संबंध कितने दृढ़ थे, इस बारे में जोगी का भी कोई दावा नहीं है अलबत्ता सन 1986 में राज्यसभा के लिए उनके नामांकन की बात आई तो प्रधानमंत्री के रुप में राजीव गांधी ने उस पर मोहर लगाई. यह शायद उस परिचय के कारण था जब राजीव पायलट के रुप में इंडियन एयरलाइंस का यात्री विमान दिल्ली से रायपुर लेकर आते थे.

कलेक्टर के रुप में जोगी तत्कालीन उड्डयन मंत्री एवं रायपुर लोकसभा से निर्वाचित सांसद पुरुषोत्तम कौशिक के आग्रह पर उनका खास ध्यान रखते थे. निश्चय ही जोगी को राजनीति में लाने एवं सांसद बनाने का श्रेय अर्जुन सिंह एवं दिग्विजय सिंह को है. आई.ए.एस. की नौकरी छुड़वाकर उन्हें क्यों राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में नामांकित किया गया, तरह-तरह की बातें हैं. खुद जोगी ने उन अफवाहों का जिक्र किया है जो उन्हें लेकर उस दौरान उड़ी.

कोडार कांड का भूत
महासमुंद जिले का कोडार कांड उनका पीछा तो कर ही रहा था, इंदौर के पामोलीव कांड ने उन पर जो कीचड़ उछाला, उससे बचने का एक मात्र उपाय था प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पकड़ना. कोडार कांड से जोगी किसी तरह अपने को बचा ले गए थे. यह अलग बात है आई.ए.एस. कृपाशंकर शर्मा जो कि बाद में म.प्र. के मुख्य सचिव हुए, की एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में उनकी ओर स्पष्ट इशारा किया गया था.

बाद में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की रायपुर इकाई ने अपनी जांच पड़ताल के बाद राज्य शासन को भेजी गई रिपोर्ट में जोगी को दोषी करार दिया था. हालांकि राजनीतिक दबाव के चलते अंतत: इस रिपोर्ट से जोगी का नाम हटा दिया गया जबकि 14 आरोपियों की सूची में वह प्रथम स्थान पर था.

उन दिनों सन 1986 में मैं दैनिक अमृत-संदेश में था. हमारे संपादक थे श्री गोविंदलाल वोरा. मोतीलाल वोरा जो उस समय म.प्र. के मुख्यमंत्री थे, के अनुज गोविंदलाल जी ने जोगी के आनन-फानन में राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित हो जाने के संदर्भ में हमें बताया था कि मोतीलाल जी, जोगी के अनुनयन विनय के आगे पिघल गए और उन्होंने अपनी ओर से उनके नाम को हरी झंडी दे दी. पर बात तय मानी जा रही थी कि जोगी यदि राजनीति में नहीं आते तो भ्रष्टाचार के प्रकरणों से उनका बच पाना कठिन था.

यह भी स्पष्ट है कि वे राजनीति में लाए नहीं गए थे, उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था, जैसा कि वे दावा करते हैं. यकीनन उन्होंने इसके लिए अथक प्रयास किया था, अपने लिए राह बनाई थी. हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस को भी उनकी जरुरत थी. जोगी के चयन के पीछे एक बड़ा कारण उनका आदिवासी होना भी था.

एक ऐसा पढ़ा लिखा, बुद्धिमान एवं चतुर आदिवासी युवा जिसे तगड़ा प्रशासनिक अनुभव हो, कांग्रेस की राजनीति में आदिवासी मतदाताओं को लुभाने की दृष्टि से मुफीद सिद्ध हो सकता था. लिहाजा जोगी का प्रवेश पार्टी के दीर्घकालीन राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए हुआ. यह अलग बात है कि उनकी जाति पर बाद में सवाल खड़े किए गए और मामला अदालत तक पहुंच गया जिस पर अभी भी फैसला होना बाकी है.

शुरुआत
बहरहाल राजनयिक के रुप में उनकी पारी की शुरुआत धुधांधार हुई. एक ऐसे व्यक्ति को जो किसी भी राजनीतिक पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी न हो, सीधे राज्यसभा का टिकट थमा देना, उस दौर में कम अचरज की बात नहीं थी. इसलिए जब जोगी के प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने एवं राज्यसभा के लिए कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में नामांकित होने की खबर बिजली की तरह फैली, राजनीतिज्ञ एवं गैर राजनीतिक क्षेत्रों में बहस के लिए नया विषय मिल गया.

बहरहाल वे लगातार तीन बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए, दो बार वे लोकसभा में पहुंचे, एक लोकसभा चुनाव उन्होंने हारा और कुल मिलाकर लगभग 25 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में जो अभी जारी है उन्होंने अपना विशेष स्थान बना लिया. वे एक ऐसे विवादित नेता हैं जिन्हें अखबार की सुर्खियों में बने रहना खूब अच्छी तरह आता है.

संसद सदस्य के रूप में जोगी ने विशेष छाप छोड़ी. छत्तीसगढ़ के मामले में वे ज्यादा मुखर थे तथा उन्होंने इस अंचल के मुद्दे जोर-शोर से उठाए भी. कांग्रेस प्रवक्ता के रुप में उन्होंने मीडिया का सामना बेहतर ढंग से किया. एक लेखक के बतौर भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई. समय-समय पर विभिन्न अखबारों में सम-सामायिक विषयों पर उनकी लिखी टिप्पणियां ध्यानपूर्वक पढ़ी जाती थीं.

जोगी के राजनीतिक जीवन के दो हिस्से हैं. एक संसदीय राजनीति के जोगी, दूसरे प्रदेश के मुखिया जोगी. उनकी संसदीय यात्रा के दौरान कोई ऐसी घटना नहीं हुई जो उनके स्वभाव एवं चरित्र के विपरीत मानी जाए.

वे एक निर्मल जोगी थे, तिकड़मों से दूर, स्वस्थ्य राजनीति के प्रतीक लेकिन प्रदेश के मुखिया के रुप में एक दूसरे जोगी सामने आए, पहले से ठीक उलटे, चालाक, खूंखार और कुटिल राजनीति के पक्षधर. जोगी के ये दो चेहरे, उनका दुहरा व्यक्तित्व. कैसे थे ये जोगी, देखे जरा.
जारी..
*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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