किसकी शह, किसकी मात

Thursday, October 24, 2013

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अजीत जोगी

दिवाकर मुक्तिबोध
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने पत्ते फेंटने में माहिर हैं. पिछले डेढ़-दो महीनों के घटनाक्रम को देखें तो उनकी कूटनीतिक विद्वत्ता का अहसास हो जाता है. एक वह समय था, जब वे बगावत की मुद्रा में आ गए थे और अब वे पुन: प्रदेश कांग्रेस की राजनीति की धुरी बन गए हैं.

संगठन में अपनी उपेक्षा से आहत अजीत जोगी ने अपने विरोधियों पर काबू पाने बहुत संयत चालें चलीं. प्रारंभ में संगठन खेमे ने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के मौन समर्थन से शह और मात का खेल शुरू किया. खेमे ने अजीत जोगी एवं उनके समर्थकों को अपनी कार्रवाइयों एवं बयानों के जरिए इतना उत्तेजित किया कि उनका गुट अलग-थलग पड़ गया और स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगा. लेकिन अजीत जोगी बौखलाए नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति के तहत उन्होंने ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू किया.

संगठन खेमा भी यही चाहता था कि जोगी गलतियां करें ताकि हाईकमान के सामने उनके अनुशासनहीन आचरण की दुहाई दी जा सके. संगठन खेमे ने ऐसा किया भी क्योंकि अजीत जोगी विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी भड़ास निकाल रहे थे तथा संगठन खेमे के नेताओं पर अप्रत्यक्ष हमले कर रहे थे.

घटनाएं इस तेजी से शक्ल बदल रही थीं कि यह अहसास होने लगा कि अजीत जोगी बगावत करेंगे तथा नई पार्टी खड़ी करेंगे. हालांकि वे इसका लगातार खंडन करते रहे लेकिन इसके बावजूद संगठन खेमे के प्रति उनके रवैये में कोई फर्क नहीं आया तथा ऐसा लगने लगा कि वे या तो पार्टी छोड़ेंगे या पार्टी ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएगी. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

ज्वालामुखी के फूटने के पूर्व ही उसे शांत कर दिया गया. जोगी के मन की मुराद पूरी हुई.

दरअसल जोगी एक सोची-समझी रणनीति के तहत माहौल बना रहे थे. उन्हें अहसास था कि पार्टी छोडऩे से उनका राजनीतिक भविष्य चौपट हो सकता है. अतीत में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि पार्टी छोडऩे अथवा नई पार्टी बनाने से राजनीतिक हैसियत में कितना बड़ा फर्क आ जाता है. इसलिए जोगी ऐसी गलती नहीं कर सकते थे.

वे चाह रहे थे कि लोहा इतना गर्म हो जाए कि चोट करने में आसानी हो. इसलिए एक तरफ वे पार्टी अनुशासन की सीमाएं लांघ रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी के प्रति अपनी निष्ठा भी व्यक्त करते थे. यह दोहरी चाल थी. कांग्रेस हाईकमान के सामने भी विकट स्थिति थी क्योंकि जोगी को खोने का अर्थ क्या हो सकता है, यह उनके सामने बहुत स्पष्ट था. इसीलिए जोगी को मनाने, उन्हें संतुष्ट करने की कोशिशें शुरू हुईं. जोगी यही चाहते थे.

जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, जोगी अपने तेवर ढीले करते चले गए और अंतत: वे यह संदेश देने में सफल रहे कि उनके पार्टी छोडऩे या बगावत करने की बातें मात्र अफवाह थीं. वे पार्टी अनुशासन से बंधे हुए हैं तथा पार्टी नेतृत्व के प्रति उनकी अटूट निष्ठा है.

यह जोगी की रणनीति की बड़ी सफलता थी. प्रदेश कांग्रेस में उनकी हैसियत को प्रदेश का कोई नेता चुनौती नहीं दे सकता, उन्होंने साबित कर दिया. उनकी ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि विधानसभा चुनाव के टिकटों के वितरण में भी उन्होंने बड़ी संख्या में अपने समर्थकों को टिकटें दिलवाईं. और तो और वे अपने बेटे अमित जोगी को भी मरवाही से प्रत्याशी बनाने में सफल रहे.

ऐसा करके उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव में स्वयं की उम्मीदवारी भी सुरक्षित कर ली. राजनीति में उनका यह गणितीय कौशल अद्भुत ही कहा जाएगा क्योंकि पार्टी में परिवार के वर्चस्व को बनाए रखने में वे कामयाब हैं.

वर्चस्व की राजनीति में जोगी के दबदबे की झलक चुनाव प्रचार अभियान समिति के गठन से भी मिलती है. संगठन के साथ तनातनी के दौर में यह कहा जा रहा था कि उन्हें प्रचार अभियान समिति से दूर रखा जाएगा जबकि जोगी इसके अध्यक्ष बनना चाहते थे.

खेमे की ओर से यह तर्क दिया था कि सन् 2003 एवं सन् 2008 के चुनाव में प्रचार की कमान जोगी के हाथों में थी किंतु नतीजा क्या निकला? कांग्रेस चुनाव हार गई. लिहाजा 2013 के चुनाव में प्रचार की बागडोर उन्हें कैसे सौंपी जा सकती है? तर्क अपनी जगह ठीक था किंतु इसके बावजूद हाईकमान ने उन्हीं पर भरोसा किया. यद्यपि औपचारिक रूप से कमान वयोवृद्घ नेता मोतीलाल वोरा को सौंपी गई है लेकिन संयोजक जोगी को बना दिया गया है. यानी सूत्र एक तरह से जोगी के हाथ में ही रहेंगे.

इस घटना से भी, जाहिर है प्रदेश कांग्रेस की असली ताकत जोगी में निहित है. यद्यपि 2013 के विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर अभी कोई राय व्यक्त नहीं की जा सकती किंतु यदि पार्टी जीतती है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि सत्ता के संघर्ष में जोगी परिवार की भूमिका कितनी अहम रहेगी.

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