आप का होना

Sunday, December 29, 2013

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अरविंद केजरीवाल-सीएम

दिवाकर मुक्तिबोध
सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीतिक बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है. चूंकि वे सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश की जनता की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लिहाजा वे तलवार की धार पर हैं.

अब दिल्ली की राजनीति में घटित होने वाली छोटी से छोटी घटनाओं पर भी देश की निगाहें रहेंगी तथा सवाल उठते रहेंगे. पहला सवाल है क्या अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा को राजनीति में पुनर्स्थापित कर पाएंगे? इसका थोड़ा-बहुत जवाब अगले वर्ष मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव से मिल सकेगा जब केजरीवाल की आम आदमी पार्टी मुम्बई, दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा में जोर-आजमाईश करेगी.

पूरा जवाब पाने के लिए हमें कुछ और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों का इंतजार करना पड़ेगा. क्योंकि आप की राजनीतिक शक्ति का सही-सही आकलन तभी हो पाएगा लेकिन यदि दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनावों को आधार मानकर कोई राय कायम करने की जरूरत महसूस होती हो तो यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि आप ने देश में नई राजनीतिक क्रांति की आधारशिला रख दी है.

दिल्ली चुनावों में चमत्कार की उम्मीद तो ‘आप’ को थी लेकिन चमत्कार इतना विराट होगा, उसकी कल्पना न तो पार्टी के प्रबुद्धजनों को थी और न ही देश की जनता को. लेकिन चमत्कार हुआ, जबर्दस्त हुआ. ‘आप’ ने बरसों से चली आ रही मठाधीशी राजनीति की चूलें हिला दीं. एक वर्ष के अल्प समय में कोई पार्टी एक राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाए, देश के राजनीतिक इतिहास की अनहोनी और हैरतअंगेज घटना है.

प्रादेशिक परिदृश्य से उभरने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियां दशकों से अपने देशव्यापी अस्तित्व के लिए छटपटा रही हैं लेकिन अब तक किसी को भी यह मकाम हासिल नहीं हुआ. बीते तीन दशक को देखें तो केवल कांशीराम ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने दम पर बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया और उसे एक राज्य में सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया लेकिन दिल्ली फिर भी दूर रही. कांशीराम की राजनीति और केजरीवाल की राजनीति में कोई तुलना नहीं हो सकती.

कांशीराम ने जातीयता का विष फैलाकर अपनी राजनीतिक जड़ें कुछ राज्यों विशेषकर उ.प्र. में मजबूत की जबकि केजरीवाल ने जाति और धर्म से परे आम आदमी की पीड़ा को देखा-समझा और उनकी आवाज बनने की कोशिश की. उन्होंने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की तथाकथित लोकशक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती दी और साबित कर दिया कि उनकी राजनीति, जन-आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरती. स्वार्थपरक एवं आत्मकेन्द्रित राजनीति से जनता ऊब चुकी है और अब इन पाटिर्यों से उसका भरोसा टूटता जा रहा है. ‘आप’ ने जनता को इसी असंतोष को समर्थन और विश्वास का बाना पहनाकर अपने कंधे पर बैठा लिया है. दिल्ली के नतीजे इसका प्रमाण हैं.

आम आदमी पार्टी परंपरागत राजनीति के चरित्र और प्रकृति से हटकर है. वह अपने नए और अद्भुत राजनीतिक प्रयोगों के लिए मशहूर है. दिल्ली में सरकार बनाने के पूर्व उसने जनता से रायशुमारी की. यह अनूठी घटना है क्योंकि इसके पूर्व सरकार बनाने के लिए ऐसी पहल किसी पार्टी ने नहीं की और न ही इस बारे में कभी सोचा जबकि केन्द्र एवं राज्यों में अल्पसंख्यक सरकारें बनी-बिगड़ी हैं. ‘आप’ ने राजनीति में स्थापित मान्यताओं को न केवल ध्वस्त किया वरन् नई राह बनाई जो सीधे आम आदमी के दरवाजे तक जाती है. उसने आम आदमी की वे समस्याएं उठाई जिनसे उनका रोजाना साबका पड़ता है यानी सड़क, नाली, बिजली, पानी और स्थानीय प्रशासन से जुड़े अन्य काम. वस्तुत: ये समस्याएं समूचे देश की समस्याएं हैं तथा आमतौर पर इन्हें नगरीय संस्थाओं के चुनाव से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन यदि कोई राजनीतिक पार्टी इन्हीं मुद्दों पर राज्य विधानसभा का चुनाव जीत जाए तो यकीनन अनहोनी घटना है.

हालांकि दिल्ली में आप की जीत के पीछे अन्य कई कारण हैं. राजनीति की विद्रूपताओं से तंगहाल जनता बदलाव चाहती थी, उसे बेहतर विकल्प की तलाश थी जो ‘आप’ के रूप में पूरी हुई. उसे ‘आप’ में अपना अक्स नज़र आया. ‘आप’ की सफलता का यही सबसे बड़ा कारण बना. चूंकि ‘आप’ ने अब लोकसभा चुनाव लड़ने का भी इरादा जाहिर कर लिया है तब यह सवाल उठता है कि क्या आम चुनाव में भी उसे ‘दिल्ली’ जैसी सफलता मिल पाएगी? लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में क्या स्थानीय मुद्दे इतने प्रभावी होंगे कि उसे चुनाव जीता दें? क्या राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक मुद्दे परिदृश्य से बाहर चले जाएंगे या गौण हो जाएंगे? देश की जनता क्या सोचकर ‘आप’ को वोट करेगी? इन सवालों का लोकसभा चुनावों में जवाब तो मिल जाएगा लेकिन क्या अभी इस बारे में कोई दावा किया जा सकता है कि ‘आप’ देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल देगी? हां और ना के बीच देश की राजनीति में यह सवाल गूंजने लगा है.

बहरहाल ‘आप’ ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है. उसके नेता आम बने रहने की कोशिश कर रहे हैं. केजरीवाल का सरकारी आवास एवं विशेष सुरक्षा को ठुकराना व अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार करना एक आम आदमी की सोच को दर्शाता है. उनका सहज, सरल व्यक्तित्व तथा ईमानदार राजनीति पर चलने का संकल्प यद्यपि देश की जनता को लुभाता है लेकिन यह देखने की बात है कि ‘आप’ के प्रयासों से राजनीति का शुद्धिकरण कितना हो पाएगा?

बड़े ओहदों पर रहने के बावजूद आमजनों के बीच घुल-मिलकर रहने वाले सादगी पसंद नेताओं की देश में कमी नहीं है. कई नाम गिनाए जा सकते हैं. मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार, प.बंगाल की ममता बेनर्जी, गोवा के मनोहर पर्रिकर, प.बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, केन्द्रीय मंत्री ए.के.एंटनी आदि. लेकिन ये नेता राजनीति की धारा को नहीं बदल पाए. गंदगी साफ नहीं कर पाए. अब केजरीवाल कितना कुछ कर पाते हैं, यह दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से स्पष्ट हो जाएगा.

*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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